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सनातन परंपरा में भगवान शिव की पूजा को श्रद्धा, भक्ति और आत्मिक शांति से जोड़ा जाता है। भगवान शिव को महादेव, शंकर और भोलेनाथ के रूप में पूजा जाता है। शिव पूजा में जलाभिषेक, बेलपत्र, धतूरा, मंत्र-जप और स्तोत्र पाठ का विशेष महत्व माना गया है। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक शिव आराधना करने से मन को शांति, आत्मबल और सकारात्मकता प्राप्त होती है।
लिंगाष्टकम्
ब्रह्ममुरारिसुरार्चितलिङ्गं
निर्मलभासितशोभितलिङ्गम्।
जन्मजदुःखविनाशकलिङ्गं
तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्॥१॥
देवमुनिप्रवरार्चितलिङ्गं
कामदहं करुणाकरलिङ्गम्।
रावणदर्पविनाशनलिङ्गं
तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्॥२॥
सर्वसुगन्धिसुलेपितलिङ्गं
बुद्धिविवर्धनकारणलिङ्गम्।
सिद्धसुरासुरवन्दितलिङ्गं
तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्॥३॥
कनकमहामणिभूषितलिङ्गं
फणिपतिवेष्टितशोभितलिङ्गम्।
दक्षसुयज्ञविनाशनलिङ्गं
तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्॥४॥
कुङ्कुमचन्दनलेपितलिङ्गं
पङ्कजहारसुशोभितलिङ्गम्।
सञ्चितपापविनाशनलिङ्गं
तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्॥५॥
देवगणार्चितसेवितलिङ्गं
भावैर्भक्तिभिरेव च लिङ्गम्।
दिनकरकोटिप्रभाकरलिङ्गं
तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्॥६॥
अष्टदलोपरिवेष्टितलिङ्गं
सर्वसमुद्भवकारणलिङ्गम्।
अष्टदरिद्रविनाशितलिङ्गं
तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्॥७॥
सुरगुरुसुरवरपूजितलिङ्गं
सुरवनपुष्पसदार्चितलिङ्गम्।
परात्परं परमात्मकलिङ्गं
तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्॥८॥
लिङ्गाष्टकमिदं पुण्यं
यः पठेत् शिवसन्निधौ।
शिवलोकमवाप्नोति
शिवेन सह मोदते॥
लिङ्गाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेश्शिव सन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥
पहला श्लोक: जिस सदाशिव लिंग की ब्रह्मा, विष्णु और देवताओं द्वारा पूजा की जाती है तथा जो जन्म-मरण के दुखों का नाश करने वाला माना गया है, मैं उस शिवलिंग को प्रणाम करता हूँ।
दूसरा श्लोक: जिसकी देवताओं और मुनियों द्वारा पूजा की जाती है, जो कामदेव का दहन करने वाले और करुणामय भगवान शिव का स्वरूप है तथा रावण के अहंकार का नाश करने वाला माना गया है, उस सदाशिव लिंग को प्रणाम है।
तीसरा श्लोक: जो सुगंधित द्रव्यों से पूजित है, बुद्धि को विकसित करने वाला माना गया है तथा सिद्धों, देवताओं और असुरों द्वारा वंदित है, उस सदाशिव लिंग को प्रणाम है।
चौथा श्लोक: जो स्वर्ण और दिव्य रत्नों से सुशोभित तथा सर्पराज से अलंकृत है और दक्ष के यज्ञ के विनाश से संबंधित भगवान शिव के स्वरूप का स्मरण कराता है, उस सदाशिव लिंग को प्रणाम है।
पाँचवाँ श्लोक: जो कुंकुम और चंदन से पूजित तथा कमल के हार से सुशोभित है और संचित पापों के विनाश से संबंधित माना जाता है, उस सदाशिव लिंग को प्रणाम है।
छठा श्लोक: जिसकी देवगण श्रद्धा और भक्ति से पूजा करते हैं तथा जिसकी प्रभा करोड़ों सूर्यों के समान बताई गई है, उस सदाशिव लिंग को प्रणाम है।
सातवाँ श्लोक: जो अष्टदल से घिरा हुआ और समस्त सृष्टि के उद्गम का कारण माना गया है तथा आठ प्रकार के दरिद्रता-दोषों के निवारण से संबंधित माना जाता है, उस सदाशिव लिंग को प्रणाम है।
आठवाँ श्लोक: जिसकी देवगुरु और श्रेष्ठ देवताओं द्वारा पूजा की जाती है तथा देववन के पुष्पों से अर्चना की जाती है, जो परम से भी परे परमात्मा का स्वरूप माना गया है, उस सदाशिव लिंग को प्रणाम है।
अंतिम श्लोक: लिंगाष्टकम् को पुण्यदायक स्तोत्र बताया गया है। परंपरागत मान्यता के अनुसार शिव के सन्निधि में इसका पाठ करने वाला शिवलोक को प्राप्त होता है और भगवान शिव के साथ आनंद करता है।
शिव तांडव स्तोत्र
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥
जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-
विलो लवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥
धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥
जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि॥
सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर
प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः।
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः
श्रिये चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः॥
ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा
निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपाली सम्पदे शिरो जटालमस्तु नः॥
करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-
द्धनञ्जयाधरीकृतप्रचण्डपञ्चसायके।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम॥
नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत्-
कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबन्धुकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः॥
प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा-
वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम्।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे॥
अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी
रसप्रवाहमाधुरी विजृम्भणामधुव्रतम्।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे॥
जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस-
द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धिमिद्ध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल
ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः॥
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्-
गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे॥
कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन्।
विमुक्तलोललोचनो ललाटफाललग्नकः
शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम्॥
निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-
निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं
परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥
प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी
महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः
शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम् ॥
इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसन्ततम्।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम्॥
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं
यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः॥
दारिद्र्यदहन शिव स्तोत्र
भगवान शिव की उपासना में दारिद्र्यदहन शिव स्तोत्र का विशेष महत्व माना जाता है। इस स्तोत्र में भगवान शिव को संसार के दुखों और अभावों का निवारण करने वाले करुणामय देव के रूप में स्मरण किया गया है। श्रद्धा और भक्ति से इसका पाठ करने की परंपरा है। “दारिद्र्य” का अर्थ केवल धन की कमी नहीं, बल्कि जीवन में उपस्थित विभिन्न प्रकार के अभावों और कष्टों से भी जोड़ा जाता है।
विश्वेश्वराय नरकार्णवतारणाय
कर्णामृताय शशिशेखरभूषणाय।
कर्पूरकान्तिधवलाय जटाधराय
दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय॥१॥
गौरीप्रियाय रजनीशकलाधराय
कालान्तकाय भुजगाधिपकङ्कणाय।
गङ्गाधराय गजराजविमर्दनाय
दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय॥२॥
भक्तिप्रियाय भवरोगभयापहाय
उग्राय दुर्गभवसागरारणाय।
ज्योतिर्मयाय गुणनामसुनृत्यकाय
दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय॥३॥
चर्माम्बराय शवभस्मविलेपनाय
भालेक्षणाय मणिकुण्डलमण्डिताय।
मञ्जीरपादयुगलाय जटाधराय
दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय॥४॥
पञ्चाननाय फणिराजविभूषणाय
हेमांशुकाय भुवनत्रयमण्डिताय।
आनन्दभूमिवरदाय तमोहराय
दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय॥५॥
भानुप्रियाय भवसागरतोरणाय
कालान्तकाय कमलासनपूजिताय।
नेत्रत्रयाय शुभलक्षणलक्षिताय
दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय॥६॥
रामप्रियाय रघुनाथवरप्रदाय
नागप्रियाय नरकार्णवतारणाय।
पुण्याय पुण्यभरिताय सुरार्चिताय
दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय॥७॥
मुक्तेश्वराय फलदाय गणेश्वराय
गीतप्रियाय वृषभेश्वरवाहनाय।
मातङ्गचर्मवसनाय महेश्वराय
दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय॥८॥
वसिष्ठेन कृतं स्तोत्रं सर्वरोगनिवारणं ।
सर्वसंपत्करं शीघ्रं पुत्रपौत्रादिवर्धनम् ।
त्रिसंध्यं यः पठेन्नित्यं स हि स्वर्गमवाप्नुयात् ॥
॥ इति वसिष्ठ विरचितं दारिद्र्यदहनशिवस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
पहला श्लोक: विश्व के ईश्वर, नरक रूपी संसार-सागर से तारने वाले, चंद्रमा को मस्तक पर धारण करने वाले, कपूर के समान उज्ज्वल और जटाधारी भगवान शिव को प्रणाम है, जो दारिद्र्य और दुखों का दहन करने वाले माने गए हैं।
दूसरा श्लोक: माता गौरी के प्रिय, मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाले, काल का भी अंत करने वाले, सर्प को आभूषण के रूप में धारण करने वाले, गंगा को जटाओं में धारण करने वाले भगवान शिव को प्रणाम है।
तीसरा श्लोक: भक्तों को प्रिय, संसार के रोग और भय को दूर करने वाले, तेजस्वी और गुणों से युक्त भगवान शिव को प्रणाम है।
चौथा श्लोक: चर्म धारण करने वाले, शरीर पर भस्म लगाने वाले, मस्तक पर तीसरा नेत्र धारण करने वाले, मणियों से सुशोभित और जटाधारी भगवान शिव को प्रणाम है।
पाँचवाँ श्लोक: पंचमुखी स्वरूप वाले, सर्पराज को आभूषण की तरह धारण करने वाले, तीनों लोकों में पूजित और अज्ञानरूपी अंधकार को दूर करने वाले भगवान शिव को प्रणाम है।
छठा श्लोक: भगवान सूर्य को प्रिय, संसार-सागर से पार कराने वाले, काल का अंत करने वाले, कमलासन ब्रह्मा द्वारा पूजित और तीन नेत्रों वाले भगवान शिव को प्रणाम है।
सातवाँ श्लोक: श्रीराम को प्रिय, रघुनाथ को वर प्रदान करने वाले, नागों को प्रिय, पुण्यस्वरूप और देवताओं द्वारा पूजित भगवान शिव को प्रणाम है।
आठवाँ श्लोक: मुक्ति प्रदान करने वाले, फल देने वाले, गणों के स्वामी, संगीत को प्रिय, नंदी को वाहन के रूप में धारण करने वाले और गजचर्म धारण करने वाले महेश्वर को प्रणाम है।
सार: इस स्तोत्र में भगवान शिव के अनेक दिव्य स्वरूपों का स्मरण करते हुए उनसे दारिद्र्य, दुख और जीवन के अभावों से मुक्ति की प्रार्थना की गई है। परंपरागत रूप से श्रद्धा और भक्ति के साथ इसके पाठ को शिव आराधना का एक माध्यम माना जाता है।
रुद्राष्टकम्
भगवान शिव की उपासना में रुद्राष्टकम् का विशेष स्थान माना जाता है। यह भगवान शिव के निराकार, निर्गुण, सर्वव्यापक और करुणामय स्वरूप की स्तुति करता है। श्रद्धा और भक्ति से रुद्राष्टकम् का पाठ भगवान शिव की आराधना के लिए किया जाता है।
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं
चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम्॥१॥
निराकारमोङ्कारमूलं तुरीयं
गिरा ज्ञान गोतीतमिशं गिरीशम्।
करालं महाकालकालं कृपालं
गुणागार संसारपारं नतोऽहम्॥२॥
तुषाराद्रिसंकाश गौरं गभीरं
मनोभूतकोटिप्रभा श्री शरीरम्।
स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा
लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा॥३॥
चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं
प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं
प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि॥४॥
प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं
अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम्।
त्रयःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिं
भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम्॥५॥
कलातीतकल्याणकल्पान्तकारी
सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी।
चिदानन्दसन्दोहमोहापहारी
प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥६॥
न यावद् उमानाथ पादारविन्दं
भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं
प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम्॥७॥
न जानामि योगं जपं नैव पूजां
नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम्।
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं
प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो॥८॥
रूद्राष्टकं इदं प्रोक्तं विप्रेण हर्षोतये
ये पठन्ति नरा भक्तयां तेषां शंभो प्रसीदति।।
पहला श्लोक: मैं भगवान शिव को प्रणाम करता हूँ, जो निर्वाण स्वरूप, सर्वव्यापक, ब्रह्म और वेदों के स्वरूप, निर्गुण तथा चिदाकाश रूप माने गए हैं।
दूसरा श्लोक: भगवान शिव निराकार, ॐ के मूल, परम अवस्था के स्वरूप और ज्ञान-वाणी से परे हैं। वे महाकाल के भी काल, करुणामय और संसार से पार ले जाने वाले हैं।
तीसरा श्लोक: भगवान शिव हिमालय के समान गौर वर्ण वाले, गंभीर और करोड़ों कामदेवों के समान तेजस्वी बताए गए हैं। उनकी जटाओं में गंगा, मस्तक पर चंद्रमा और कंठ में सर्प सुशोभित है।
चौथा श्लोक: भगवान शिव के कानों में कुंडल, विशाल तीसरा नेत्र और प्रसन्न मुख है। वे नीलकंठ, दयालु, व्याघ्रचर्म धारण करने वाले और सभी के स्वामी हैं।
पाँचवाँ श्लोक: भगवान शिव प्रचंड, श्रेष्ठ, अजन्मा और करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशमान हैं। वे त्रिविध ताप का नाश करने वाले और त्रिशूल धारण करने वाले भवानीपति हैं।
छठा श्लोक: भगवान शिव समय से परे, कल्याणकारी और प्रलय के अधिपति हैं। वे सज्जनों को आनंद देने वाले तथा मोह का नाश करने वाले हैं। भक्त उनसे प्रसन्न होने की प्रार्थना करता है।
सातवाँ श्लोक: जब तक मनुष्य भगवान शिव के चरण-कमलों का भजन नहीं करता, तब तक उसे वास्तविक सुख, शांति और संताप से मुक्ति प्राप्त नहीं होती—ऐसी स्तुति में प्रार्थना की गई है।
आठवाँ श्लोक: भक्त कहता है कि मुझे योग, जप या पूजा की विधि का ज्ञान नहीं है; मैं सदैव भगवान शम्भु को नमन करता हूँ। जन्म, बुढ़ापे और दुखों से पीड़ित भक्त भगवान शिव से अपनी रक्षा की प्रार्थना करता है।
अमोघ सदाशिवकवचम् {हिन्दीअर्थ सहित}
अमोघ शिवकवच बहुत की कल्याणकारी कवच है, इस कल्याणकारी एवं अति शीघ्र फल प्रदान करने वाले कवच का कोई दूसरा सार ही नहीं है ।
किसी भी प्रकार के शारीरिक ,मानसिक ,आर्थिक और सामाजिक कष्टों से मुक्ति दिलाने में ये कवच अपना विशेष प्रभाव रखता है।कवच का अर्थ होता है सुरक्षा, अर्थात जिस प्रकार युद्ध के समय योद्धा एवं राजा रणभूमि में जाने से पहले अपने शरीर की सुरक्षा हेतु लौह कवच धारण करते थे|
ठीक उसी प्रकार हमारे ऋषि मुनि भी अपने आपको सांसारिक कष्टों एवं दैहिक ,दैविक एवं भौतिक सभी प्रकार की व्याधियों से खुद को सुरक्षित रखने के लिए इन मान्त्रिक कवचों की रचना किया करते थे ,जो युगों -युगों से प्रत्येक मानव सभ्यता के लिए उपयोगी सिद्ध होते आयें है ।
इस अमोघ शिव कवच का नियमित पाठ करने वाले उपासक को अकाल मृत्यु , बीमारी ,एवं भयानक से भी भयानक विपत्तियों को भी बिफल कर देता है !
इस कवच का पाठ करने वाले साधक के शरीर के आस – पास एक सुरक्षा घेरा सा बना रहता हैं जिससे किसी भी तरह की नकारात्मक शक्तियों का असर साधक या साधक के परिवार पर कदापि नहीं होता ।
यह अमोघ शिवकवच परम गोपनीय, अत्यन्त आदरणीय, सब पापों को दूर करनेवाला, सारे अमंगलों को, विघ्न-बाधाओं को हरनेवाला, परम पवित्र, जयप्रद और सम्पूर्ण विपत्तियों का नाशक माना गया है। यह परम हितकारी है और सब भयों को दूर करता है।
इसके प्रभाव से क्षीणायु, मृत्यु के समीप पहुँचा हुआ महान् रोगी मनुष्य भी शीघ्र नीरोगता को प्राप्त करता है और उसकी दीर्घायु हो जाती है। अर्थाभाव से पीड़ित मनुष्य की सारी दरिद्रता दूर हो जाती है और उसको सुख-वैभव की प्राप्ति होती है। पापी महापातक से छूट जाता है और इसका भक्ति श्रद्धापूर्वक धारण करनेवाला निष्काम पुरुष देहान्त के बाद दुर्लभ मोक्षपद को प्राप्त होता है।
महर्षि ऋषभ ने इसका उपदेश करके एक संकटग्रस्त राजा को दुःखमुक्त किया था। यह कवच श्रीस्कन्दपुराण के ब्राह्म-खण्ड के ब्रह्मोत्तर-खण्ड (अध्याय 12/1-33) में पाया जाता है।
पहले विनियोग, ऋष्यादिन्यास, करन्यास और हृदयादि अंगन्यास करके भगवान् शिव शंकर का ध्यान करें। तदनन्तर कवच का पाठ करें।
अमोघ सदाशिव कवचम
विनियोगः- अस्य श्री-शिव-कवच-स्तोत्र मन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीसदाशिवरुद्रो देवता, ह्रीं शक्तिः, वं कीलकम्, श्रीं ह्रीं क्लीं बीजम्, सदाशिव-प्रीत्यर्थे शिवकवच-स्तोत्र-जपे विनियोगः॥
ऋष्यादिन्यासः
ॐ ब्रह्मर्षये नमः, शिरसि।
अनुष्टुप् छन्दसे नमः, मुखे।
श्रीसदाशिव-रुद्रदेवतायै नमः, हृदि।
ह्रीं शक्तये नमः, पादयोः।
वं कीलकाय नमः, नाभौ।
श्रीं ह्रीं क्लीमिति बीजाय नमः, गुह्ये।
विनियोगाय नमः, सर्वांगे।
अथ करन्यासः
ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ ह्रीं रां सर्वशक्ति-धाम्ने ईशानात्मने अंगुष्ठाभ्यां नमः।
ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ नं रीं नित्य-तृप्ति-धाम्ने तत्पुरुषात्मने तर्जनीभ्यां नमः।
ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ मं रूं अनादि-शक्ति-धाम्ने अघोरात्मने मध्यमाभ्यां नमः।
ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ शिं रैं स्वतन्त्र-शक्ति-धाम्ने वाम-देवात्मने अनामिकाभ्यां नमः।
ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ वां रौं अलुप्त-शक्ति-धाम्ने सद्योजातात्मने कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ यं रः अनादि-शक्ति-धाम्ने सर्वात्मने कर-तल-कर-पृष्ठाभ्यां नमः।
हृदयादि अंगन्यास!!
ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ ह्रीं रां सर्व-शक्ति-धाम्ने ईशानात्मने हृदयाय नमः।
ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ नं रीं नित्य-तृप्ति-धाम्ने तत्पुरुषात्मने शिरसे स्वाहा।
ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ मं रूं अनादि-शक्ति-धाम्ने अघोरात्मने शिखायै वषट्।
ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ शिं रैं स्वतन्त्र-शक्ति-धाम्ने वामदेवात्मने कवचाय हुम्।
ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ वां रौं अलुप्त-शक्ति-धाम्ने सद्यो-जातात्मने नेत्र-त्रायाय वौषट्।
ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वालामालिने
ॐ यं रः अनादि-शक्ति-धाम्ने सर्वात्मने अस्त्राय फट्।
अथ ध्यानम्!!
वज्र-दंष्द्रं त्रिनयनं काल-कण्ठम-रिंदमम् ।
सहस्रकर-मप्युग्रं वन्दे शम्भुं-उमापतिम् ॥
ध्यान भावार्थ —जिनकी दाढ़ें वज्र के समान हैं, जो तीन नेत्र धरण करते हैं, जिनके कण्ठ में हलाहल पान का नील चिह्न सुशोभित होता है, जो शत्रुभाव रखनेवालों का दमन करते हैं, जिनके सहस्रों कर (हाथ अथवा किरणें) हैं तथा जो अभक्तों के लिये अत्यन्त उग्र हैं, उन उमापति शम्भु को मैं प्रणाम करता हूँ।
ऋषभ उवाच-
अथापरं सर्व-पुराण-गुह्यं निःशेष-पापौघहरं पवित्रम्।
जयप्रदं सर्व-विपद्विमोचनं वक्ष्यामि शैवं कवचं हिताय ते ॥
नमस्कृत्य महादेवं विश्व-व्यापिन-मीश्वरम् ।
वक्ष्ये शिवमयं वर्म सर्व-रक्षाकरं नृणाम् ॥1॥
अथ कवच
ऋषभ जी कहते हैं:- जो सम्पूर्ण पुराणों में गोपनीय कहा गया है, समस्त पापों को हर लेनेवाला है, पवित्र, जयदायक तथा सम्पूर्ण विपत्तियों से छुटकारा दिलानेवाला है, उस सर्वश्रेष्ठ शिवकवच का मैं तुम्हारे हित के लिये उपदेश करूँगा। मैं विश्वव्यापी ईश्वर महादेवजी को नमस्कार करके मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करने वाले इस शिवस्वरूप कवच का वर्णन करता हूँ ॥1॥
शुचौ देशे समासीनो यथा-वत्कल्पिता-सनः।
जितेन्द्रियो जित-प्राणश्चिन्तयेच्-छिव-मव्ययम् ॥2॥
पवित्रा स्थान में यथायोग्य आसन बिछाकर बैठे। इन्द्रियों को अपने वश में करके प्राणायाम-पूर्वक अविनाशी भगवान् शिव जी का चिन्तन करें ॥2॥
हृत्पुण्डरी-कान्तरसन्निविष्टं
स्वतेजसा व्याप्तनभो-ऽवकाशम् ।
अतीन्द्रियं सूक्ष्म-मनन्त-माद्यं
ध्यायेत् परानन्द-मयं महेशम् ॥3॥
परमानन्दमय भगवान महेश्वर हृदय-कमल के भीतर की कर्णिका में विराजमान हैं, उन्होंने अपने तेज से आकाश मण्डल को व्याप्त कर रखा है। वे इन्द्रियातीत, सूक्ष्म, अनन्त एवं सबके आदिकारण हैं।’ इस तरह उनका चिन्तन करे ॥3॥
ध्याना-वधूताखिल-कर्म-बन्धश्-
चिरं चिदानन्दनि-मग्नचेताः ।
षडक्षरन्यास-समाहित-आत्मा
शैवेन कुर्यात् कवचेन रक्षाम् ॥4॥
इस प्रकार ध्यान के द्वारा समस्त कर्मबन्ध्न का नाश करके चिदानन्दमय भगवान् सदाशिव में अपने चित्त को चिरकाल तक लगाये रहे। फिर षडक्षरन्यास के द्वारा अपने मन को एकाग्र करके मनुष्य निम्नांकित शिवकवच के द्वारा अपनी रक्षा करें ॥4॥
!!मूल कवच पाठ!!
मां पातु देवो-ऽखिल-देवतात्मा संसारकूपे पतितं गभीरे ।
तन्नाम दिव्यं वरमन्त्र-मूलं धुनोतु मे सर्वमघं हृदिस्थम् ॥5॥
सर्वदेवमय महादेवजी गहरे संसार-कूप में गिरे हुए मुझ असहाय की रक्षा करें। उनका दिव्य नाम जो उनके श्रेष्ठ मन्त्रा का मूल है, मेरे हृदय स्थित समस्त पापों का नाश करे ॥5॥
सर्वत्र मां रक्षतु विश्वमूर्तिर्-ज्योतिर्मयानन्द-घनश्चिदात्मा ।
अणो-रणी-या-नुरुशक्ति-रेकः स ईश्वरः पातु भयाद-शेषात् ॥6॥
सम्पूर्ण विश्व जिनकी मूर्ति है, जो ज्योतिर्मय आनन्दघनस्वरूप चिदात्मा हैं वे भगवान् शिव मेरी सर्वत्र रक्षा करें। जो सूक्ष्म से भी अत्यन्त सूक्ष्म हैं, महान् शक्ति से सम्पन्न हैं, वे अद्वितीय ‘ईश्वर’ महादेवजी सम्पूर्ण भयों से मेरी रक्षा करें ॥6॥
यो भूस्वरूपेण बिभर्ति विश्वं पायात्
स भूमेर्गिरिशो-ऽष्टमूर्तिः ।
योऽपां स्वरूपेण नृणां करोति संजीवनं सोऽवतु मां जलेभ्यः ॥7॥
जिन्होंने पृथ्वीरूप से इस विश्व को धारण कर रखा है, वे अष्टमूर्ति ‘गिरिश’ पृथ्वी से मेरी रक्षा करें। जो जलरूप से जीवों को जीवन-दान दे रहे हैं, वे ‘शिव’ जल से मेरी रक्षा करें ॥7॥
कल्पा-वसाने भुवनानि दग्ध्वा सर्वाणि यो नृत्यति भूरिलीलः ।
स कालरुद्रोऽवतु मां दवाग्नेर्-वात्यादि-भीतेर-खिलाच्च तापात् ॥8॥
जो विशद लीलाविहारी ‘शिव’ कल्प के अन्त में समस्त भुवनों को दग्ध करके (आनन्द से) नृत्य करते हैं, वे ‘कालरुद्र’ भगवान् दावानल से, आँधी-तूफान के भय से और समस्त तापों से मेरी रक्षा करें ॥8॥
प्रदीप्त-विद्युत्-कनकावभासो विद्या-वरा-भीति-कुठार-पाणिः ।
चतुर्मुखस्तत्पुरुष-स्त्रिनेत्रः प्राच्यां स्थितं रक्षतु मामजस्रम् ॥9॥
प्रदीप्त विद्युत् एवं स्वर्ण के सदृश जिनकी कान्ति है, विद्या, वर और अभय (मुद्राएँ) तथा कुल्हाड़ी जिनके कर-कमलों में सुशोभित हैं, चतुर्मुख त्रिलोचन हैं, वे भगवान् ‘तत्पुरुष’ पूर्व दिशा में निरन्तर मेरी रक्षा करें ॥9॥
कुठार-वेदांकुश-पाशशूल-कपाल-ढक्काक्ष-गुणान् दधानः ।
चतुर्मुखो नील-रुचि-स्त्रिनेत्रः पायादघोरो दिशि दक्षिणस्याम् ॥10॥
जिन्होंने अपने हाथों में कुल्हाड़ी, वेद, अंकुश, फंदा, त्रिशूल, कपाल, डमरू और रुद्राक्ष की माला को धरण कर रखा है तथा जो चतुर्मुख हैं, वे नीलकान्ति त्रिनेत्राधरी भगवान् ‘अघोर’ दक्षिण दिशा में मेरी रक्षा करें ॥10॥
कुन्देन्दुशंख-स्फटिका-वभासो वेदाक्षमाला-वरदाभयांकः ।
त्र्यक्षश्चतुर्वक्त्र उरुप्रभावः सद्यो-ऽधिजातो-ऽवतु मां प्रतीच्याम् ॥11॥
कुन्द, चन्द्रमा, शंख और स्फटिक के समान जिनकी उज्ज्वल कान्ति है वेद, रुद्राक्षमाला, वरद और अभय (मुद्राओं) से जो सुशोभित हैं वे महाप्रभावशाली चतुरानन एवं त्रिलोचन भगवान् ‘सद्योजात’ पश्चिम दिशा में मेरी रक्षा करें ॥11॥
वराक्षमाला-भयटंक-हस्तः सरोज-किञ्जल्क-समानवर्णः ।
त्रिलोचनश्चारु-चतुर्मुखो मां पाया-दुदीच्यां दिशि वामदेवः ॥12॥
जिनके हाथों में वर एवं अभय (मुद्राएँ), रुद्राक्षमाला और टाँकी विराजमान हैं तथा कमल किंजल्क के सदृश जिनका गौर वर्ण है, वे सुन्दर चार मुखवाले त्रिनेत्राधरी भगवान् ‘वामदेव’ उत्तर दिशा में मेरी रक्षा करें ॥12॥
वेदाभ्येष्टांकुश-पाश-टंक-कपाल-ढक्काक्षक-शूलपाणि: ।
सितद्युति: पंचमुखो-ऽवतान्म-आमीशान ऊर्ध्वं परमप्रकाश: ॥13॥
जिनके कर-कमलों में वेद, अभय और वर (मुद्राएँ), अंकुश, टाँकी, फंदा, कपाल, डमरू, रुद्राक्षमाला और त्रिशूल सुशोभित हैं, जो श्वेत आभा से युक्त हैं, वे परम प्रकाशरूप पंचमुख भगवान् ‘ईशान’ मेरी ऊपर से रक्षा करें ॥13॥
मूर्द्धान-मव्यान्-मम चंद्रमौलिर् भालं ममाव्यादथ भालनेत्र: ।
नेत्रे ममाव्याद् भगनेत्रहारी नासां सदा रक्षतु विश्वनाथ: ॥14॥
भगवान् ‘चन्द्रमौलि’ मेरे सिर की, ‘भालनेत्र’ मेरे ललाट की, ‘भगनेत्राहारी’ मेरे नेत्रों की और ‘विश्वनाथ’ मेरी नासिका की सदा रक्षा करें ॥14॥
पायाच्छ्रुती मे श्रुतिगीतकीर्ति: कपोलमव्यात् सततं कपाली ।
वक्त्रं सदा रक्षतु पंचवक्त्रो जिह्वां सदा रक्षतु वेदजिह्व: ॥15॥
श्रुतिगीतकीर्ति’ मेरे कानों की, ‘कपाली’ निरन्तर मेरे कपोलों की, ‘पंचमुख’ मुख की तथा ‘वेदजिह्व’ जीभ की रक्षा करें ॥15॥
कण्ठं गिरीशोऽवतु नीलकण्ठ: पाणिद्वयं पातु पिनाकपाणि: ।
दोर्मूल-मव्यान्मम धर्मबाहुर्-वक्ष:स्थलं दक्ष-मखान्तकोऽव्यात् ॥16॥
‘नीलकण्ठ’ महादेव मेरे गले की, ‘पिनाकपाणि’ मेरे दोनों हाथों की, ‘धर्मबाहु’ दोनों कंधों की तथा ‘दक्षयज्ञविध्वंसी’ मेरे वक्षःस्थल की रक्षा करें ॥16॥
ममोदरं पातु गिरींद्रधन्वा मध्यं ममाव्यान्-मदनांतकारी ।
हेरम्बतातो मम पातु नाभिं पायात्कटि धूर्जटिरीश्वरो मे ॥17॥
गिरीन्द्रधन्वा’ मेरे पेट की, ‘कामदेव के नाशक’ मध्यदेश की, ‘गणेशजी के पिता’ मेरी नाभि की तथा ‘धूर्जटि’ मेरी कटि की रक्षा करें ॥17॥
ऊरुद्वयं पातु कुबेरमित्रो जानुद्वयं मे जगदीश्वरो-ऽव्यात् ।
जंघायुगं पुंग-वकेतु-रव्यात् पादौ ममाव्यत् सुर-वंद्यपाद: ॥18॥
कुबेरमित्र’ मेरी दोनों जाँघों की, ‘जगदीश्वर’ दोनों घुटनों की, ‘पुंगवकेतु’ दोनों पिंडलियों की और ‘सुरवन्द्यचरण’ मेरे पैरों की सदैव रक्षा करें ॥18॥
महेश्वर: पातु दिनादियामे मां मध्य-यामेऽवतु वामदेव:।
त्र्यम्बकः पातु तृतीय-यामे वृषध्वज: पातु दिनांत्य-यामे ॥19॥
महेश्वर’ दिन के पहले पहर में मेरी रक्षा करें। ‘वामदेव’ मध्य पहर में मेरी रक्षा करें। ‘त्रयम्बक’ तीसरे पहर में और ‘वृषभध्वज’ दिन के अन्तवाले पहर में मेरी रक्षा करें ॥19॥
पायान्नि-शादौ शशि-शेखरो-मां गंगाधरो रक्षतु मां निशीथे।
गौरीपति: पातु निशा-वसाने मृत्युञ्जयो रक्षतु सर्वकालम् ॥20॥
शशिशेखर’ रात्रि के आरम्भ में, ‘गंगाधर’ अर्धरात्रि में, ‘गौरीपति’ रात्रि के अन्त में और ‘मृत्युंजय’ सर्वकाल में मेरी रक्षा करें ॥20॥
अन्त: स्थितं रक्षतु शंकरो मां स्थाणु: सदा पातु बहि: स्थितम् माम् ।
तदंतरे पातु पति: पशूनां सदाशिवो रक्षतु मां समन्तात् ॥21॥
शंकर’ घर के भीतर रहने पर मेरी रक्षा करें। ‘स्थाणु’ बाहर रहने पर मेरी रक्षा करें। ‘पशुपति’ बीच में मेरी रक्षा करें और ‘सदाशिव’ सब ओर मेरी रक्षा करें ॥21॥
तिष्ठन्त-मव्याद्-भुवनैक-नाथ: पायाद् व्रजन्तं प्रमथाधिनाथ: ।
वेदांत-वेद्यो-ऽवतु मां निषण्णं मामव्यय: पातु शिव: शयानम् ॥22॥
भुवनैकनाथ’ खड़े होने के समय, ‘प्रमथनाथ’ चलते समय, ‘वेदान्तवेद्य’ बैठे रहने के समय और ‘अविनाशी शिव’ सोते समय मेरी रक्षा करें ॥22॥
मार्गेषु मां रक्षतु नीलकण्ठ: शैलादि-दुर्गेषु पुरत्रयारि: ।
अरण्य-वासादि-महाप्रवासे पायान्मृगव्याध उदारशक्ति: ॥23॥
नीलकण्ठ’ रास्ते में मेरी रक्षा करें। ‘त्रिपुरारि’ शैलादि दुर्गों में और उदारशक्ति ‘मृगव्याध’ वनवासादि महान् प्रवासों में मेरी रक्षा करें ॥23॥
कल्पांत-काटोप-पटुप्रकोपः स्फुटाट्-टहासोच्-चलिताण्डकोश: ।
घोरारि-सेनार्ण-वदुर्निवार-महाभयाद् रक्षतु वीरभद्र: ॥24॥
जिनका प्रबल क्रोध कल्पों का अन्त करने में अत्यन्त पटु है, जिनके प्रचण्ड अट्टहास से ब्रह्माण्ड काँप उठता है, वे ‘वीरभद्रजी’ समुद्र के सदृश भयानक शत्रुसेना के दुर्निवार महान् भय से मेरी रक्षा करें ॥24॥
पत्त्यश्व-मातंग-घटा-वरूथ-सहस्र-लक्षायुत-
कोटि-भीषणम् ।
अक्षौहिणीनां शत-मात-तायिनां छिंद्यान्मृडो घोर-कुठार-धारया ॥25॥
भगवान् ‘मृड’ मुझ पर आततायीरूप से आक्रमण करने वालों की हजारों, दस हजारों, लाखों और करोड़ों पैदलों, घोड़ों और हाथियों से युक्त अति भीषण सैकड़ों अक्षौहिणी सेनाओं का अपनी घोर कुठारधर से भेदन करें ॥25॥
निहंतु दस्यून् प्रलयान-लार्चिर्-ज्वलत त्रिशूलं त्रिपुरांतकस्य ।
शार्दूल-सिंहर्क्ष-वृकादि-हिंस्रान् संत्रास-यत्वीशधनु: पिनाकं ॥26॥
भगवान् ‘त्रिपुरान्तक’ का प्रलयाग्नि के समान ज्वालाओं से युक्त जलता हुआ त्रिशूल मेरे दस्युदल का विनाश कर दे और उनका पिनाक धनुष चीता, सिंह, रीछ, भेड़िया आदि हिंस्र जन्तुओं को संत्रस्त करे ॥26॥
दु:स्वप्न-दुश्शकुन-दुर्गति-दौर्मनस्य-दुर्भिक्ष-दुर्व्यसन
-दुस्सह-दुर्यशांसि ।
उत्पात-ताप-विषभीतिमसद्-ग्रहार्ति व्याधींश्च नाशयतु मे जगतामधीश: ॥27॥
॥ मूल कवच समाप्त ॥
अर्थ –वे जगदीश्वर मेरे बुरे स्वप्न, बुरे शकुन, बुरी गति, मन की दुष्ट भावना, दुर्भिक्ष, दुर्व्यसन, दुस्सह अपयश, उत्पात, संताप, विषभय, दुष्ट ग्रहों की पीड़ा तथा समस्त रोगों का नाश करें ॥27॥
!!मूल कवच समाप्त!!
॥ अमोघ शिवकवच मूलमंत्र ॥
ॐ नमो भगवते सदाशिवाय सकलतत्त्व- आत्मकाय सकल-तत्त्व-विहाराय सकल-लोकै-कर्त्रे सकल-लोकैक-भर्त्रे सकल-लोकैक-हर्त्रे सकललोकैक गुरवे सकल-लोकैकसाक्षिणे सकल-निगम-गुह्याय सकल-वर-प्रदाय सकल-दुरि-तार्ति-भञ्जनाय सकल-जगद भयंकराय सकल-लोकैक-शंकराय शशांक-शेखराय शाश्वत-निजाभासाय निर्गुणाय निरूपमाय निरूपाय निरा-भासाय निरामयाय निष्प्रपञ्चाय निष्कलंकाय
निर्द्वन्द्वाय निस्संगाय निर्मलाय निर्गमाय नित्य-रूप-विभवाय निरुपम-विभवाय निराधाराय नित्य-शुद्ध-बुद्ध-परिपूर्ण-सच्चिदानन्दाद्वयाय परम-शान्त-प्रकाश-तेजो-रूपाय
जय जय महारुद्र महारौद्र भद्रावतार दुःखदावदारण महाभैरव कालभैरव कल्पान्तभैरव कपाल-मालाधर खट्वांग-खड्ग-चर्म-पाशांकुश-डमरु-शूल-चापबाण-गदा-शक्ति-भिन्दिपाल-तोमर-मुसल-मुद्गर-पट्टिश-परशु-परिघ-भुशुण्डी-शतघ्नी-चक्राद्य-आयुध-भीषणकर सहस्र-मुख दंष्ट्रा-कराल विकट-आट्टहास विस्फारित-ब्रह्माण्ड-मण्डल-नागेन्द्र-कुण्डल
नागेन्द्रहार नागेन्द्रवलय नागेन्द्रचर्मधर मृत्युञ्जय त्रयम्बक त्रिपुरान्तक विरूपाक्ष विश्वेश्वर विश्वरूप वृषभवाहन विषभूषण विश्वतोमुख सर्वतो रक्ष रक्ष मां ज्वल ज्वल महामृत्यु-भयमपमृत्यु-भयं नाशय नाशय रोग-भयम-उत्सादयोत्-सादय विष-सर्प-भयं शमय शमय चोरभयं मारय मारय मम शत्रून उच्चाटय-ओच्चाटय शूलेन विदारय विदारय कुठारेण भिन्धि भिन्धि खंगेन छिन्धि छिन्धि खट्वांगेन
विपोथय विपोथय मुसलेन निष्पेषय निष्पेषय बाणैः संताडय संताडय रक्षांसि भीषय भीषय भूतानि विद्रावय विद्रावय कूष्माण्ड-वेताल-मारीगण ब्रह्मराक्षसान् संत्रासय संत्रासय मामभयं कुरु कुरु वित्रस्तं माम-आश्वासय-आश्वासय नरक भयान्मामुद्धारय-ओद्धारय संजीवय संजीवय क्षुत्तृड्भ्यां माम-आप्यायय-आप्यायय दुःखातुरं माम-आनन्दय-आनन्दय शिवकवचेन माम-आच्छादय आच्छादय त्रयम्बक सदाशिव नमस्ते नमस्ते नमस्ते।
अमोघ शिव कवच मूल मंत्र हिन्दी भावार्थ
ॐ जिनका वाचक है, सम्पूर्ण तत्त्व जिनके स्वरूप हैं, जो सम्पूर्ण तत्त्वों में विचरण करनेवाले, समस्त लोकों के एकमात्र कर्ता और सम्पूर्ण विश्व के एकमात्र भरण-पोषण करनेवाले हैं, जो अखिल विश्व के एक ही संहारकारी, सब लोकों के एकमात्र गुरु, समस्त संसार के एक ही साक्षी, सम्पूर्ण वेदों के गूढ़ तत्त्व, सबको वर देनेवाले, समस्त पापों और पीड़ाओं का नाश करनेवाले,
सारे संसार को अभय देनेवाले, सब लोकों के एकमात्र कल्याणकारी, चन्द्रमा का मुकुट धारण करने वाले, अपने सनातन-प्रकाश से प्रकाशित होनेवाले, निर्गुण, उपमारहित, निराकार, निराभास, निरामय, निष्प्रपंच, निष्कलंक, निर्द्वन्द्व, निस्संग, निर्मल, गति-शून्य, नित्यरूप, नित्य-वैभव से सम्पन्न, अनुपम ऐश्वर्य से सुशोभित, आधारशून्य, नित्य-शुद्ध-बुद्ध, परिपूर्ण, सच्चिदानन्दघन, अद्वितीय तथा परम शान्त, प्रकाशमय, तेजःस्वरूप हैं, उन भगवान् सदाशिव को नमस्कार है।
हे महारुद्र, महारौद्र, भद्रावतार, दुःख-दावाग्नि-विदारण, महाभैरव, कालभैरव, कल्पान्तभैरव, कपालमालाधारी! हे खट्वांग, खड्ग, ढाल, फंदा, अंकुश, डमरू, त्रिशूल, धनुष, बाण, गदा, शक्ति, भिन्दिपाल, तोमर, मुसल, मुद्गर, पट्टिश, परशु, परिघ, भुशुण्डी, शतघ्नी और चक्र आदि आयुधों के द्वारा भयंकर हाथोंवाले! हजार मुख और दंष्ट्रों से कराल, विकट अट्टहास से विशाल ब्रह्माण्ड-मण्डल का विस्तार करनेवाले, नागेन्द्र वासुकि को कुण्डल, हार, कंकण तथा ढाल के रूप में धारण करने वाले, मृत्युंजय,
त्रिनेत्र, त्रिपुरनाशक, भयंकर नेत्रोंवाले, विश्वेश्वर, विश्वरूप में प्रकट, बैल पर सवारी करनेवाले, विष को गले में भूषणरूप में धारण करनेवाले तथा सब ओर मुखवाले भगवाल शंकर! आपकी जय हो, जय हो! आप मेरी सब ओर से रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। प्रज्वलित होइये, प्रज्वलित होइये। मेरे महामृत्यु-भय का तथा अपमृत्यु के भय का नाश कीजिये, नाश कीजिये। (बाहरी और भीतरी) रोग-भय को जड़ से मिटा दीजिये, जड़ से मिटा दीजिये। विष और सर्प के भय को शान्त कीजिये, शान्त कीजिये। चोरभय को मार डालिये, मार डालिये।
फलश्रुति
ऋषभ उवाच:-
इत्ये-तत्कवचं शैवं वरदं व्याहृतं मया ।
सर्व-बाधा-प्रशमनं रहस्यं सर्व-देहिनाम् ॥28॥
ऋषभ जी कहते हैं:-
इस प्रकार यह वरदायक शिवकवच मैंने कहा है। यह सम्पूर्ण बाधाओं को शान्त करनेवाला तथा समस्त देहधारियों के लिये गोपनीय रहस्य हैं ॥28॥
य: सदा धारयेन्मर्त्य: शैवं कवचमुत्तमम् ।
न तस्य जायते क्वापि भयं शंभो-रनु-ग्रहात् ॥29॥
जो मनुष्य इस उत्तम शिवकवच को सदा धारण करता है, उसे भगवान् शिव के अनुग्रह से कभी और कहीं भी भय नहीं होता ॥29॥
क्षीणायुर्-मृत्यु-मापन्नो महारोग-हतोऽपि वा ।
सद्य: सुखम-वाप्नोति दीर्घ-मायुश्च विंदति ॥30॥
जिसकी आयु क्षीण हो चली है, जो मरणासन्न हो गया है अथवा जिसे महान् रोगों ने मृतक-सा कर दिया है, वह भी इस कवच के प्रभाव से तत्काल सुखी हो जाता और दीर्घायु प्राप्त कर लेता है ॥30॥
सर्व-दारिद्र्य-शमनं सौमंगल्य-विवर्धनम् ।
यो धत्ते कवचं शैवं स देवैरपि पूज्यते ॥31॥
शिवकवच समस्त दरिद्रता का शमन करनेवाला और सौमंगल्य को बढ़ाने वाला है, जो इसे धरण करता है, वह देवताओं से भी पूजित होता है ॥31॥
महापातक-संघातैर्मुच्यते चोपपातकै: ।
देहांते शिवमाप्नोति शिव-वर्मानुभावत: ॥32॥
इस शिवकवच के प्रभाव से मनुष्य महापातकों के समूहों और उपपातकों से भी छुटकारा पा जाता है तथा शरीर का अन्त होने पर भगवान शिव को पा लेता है ॥32॥
त्वमपि श्रद्धया वत्स शैवं कवचमुत्तमम् ।
धारयस्व मया दत्तं सद्य: श्रेयो ह्यवाप्स्यसि ॥33॥
वत्स! तुम भी मेरे दिये हुए इस उत्तम शिवकवच को श्रद्धापूर्वक धारण करो, इससे तुम शीघ्र और निश्चय ही कल्याण के भागी होओगे ॥33॥
इति श्रीस्कांदे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां तृतीये ब्रह्मोत्तर खंडे सीमंति-नीमाहात्म्ये भद्रायू-पाख्याने शिवकवच-कथनं नाम द्वादशो-ऽध्यायः ॥
शिव मानस पूजा
भगवान शिव की पूजा में भाव और श्रद्धा का विशेष महत्व माना गया है। शिव मानस पूजा में भक्त अपने मन में भगवान शिव की पूजा की कल्पना करता है और मानसिक रूप से उन्हें स्नान, वस्त्र, चंदन, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करता है। यह स्तोत्र भगवान शिव के प्रति प्रेम, समर्पण और भक्ति की भावना को व्यक्त करता है।
रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं
नानारत्नविभूषितं मृगमदामोदाङ्कितं चन्दनम्।
जातीचम्पकबिल्वपत्ररचितं पुष्पं च धूपं तथा
दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितं गृह्यताम्॥
सौवर्णे नवरत्नखण्डरचिते पात्रे घृतं पायसं
भक्ष्यं पञ्चविधं पयोदधियुतं रम्भाफलं पानकम्।
शाकानामयुतं जलं रुचिकरं कर्पूरखण्डोज्ज्वलं
ताम्बूलं मनसा मया विरचितं भक्त्या प्रभो स्वीकुरु॥
छत्रं चामरयोर्युगं व्यजनकं चादर्शकं निर्मलं
वीणाभेरिमृदङ्गकाहलकला गीतं च नृत्यं तथा।
साष्टाङ्गं प्रणतिः स्तुतिर्बहुविधा ह्येतत्समस्तं मया
सङ्कल्पेन समर्पितं तव विभो पूजां गृहाण प्रभो॥
आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं
पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः।
सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम्॥
हे दयालु भगवान शिव, मैंने अपने मन में आपके लिए रत्नों से बना सुंदर आसन, हिम के समान शीतल जल से स्नान, दिव्य वस्त्र, आभूषण और सुगंधित चंदन की कल्पना की है। मैंने मन ही मन फूल, धूप और दीप भी अर्पित किए हैं। हे पशुपति, मेरी यह मानसिक पूजा स्वीकार करें।
मैंने अपने मन में स्वर्ण और रत्नों से सजे पात्र में घी, खीर, विभिन्न प्रकार के भोजन, दूध, दही, फल, पेय और स्वादिष्ट शाक आदि का नैवेद्य तैयार किया है। हे प्रभु, भक्तिभाव से अर्पित यह मानसिक भोग स्वीकार करें।
मैं आपको छत्र, चंवर, पंखा और निर्मल दर्पण अर्पित करता हूँ। वीणा, मृदंग और अन्य वाद्यों के संगीत तथा नृत्य की भी मन में कल्पना करके आपको समर्पित करता हूँ। मेरे द्वारा की गई प्रणाम, स्तुति और यह संपूर्ण मानसिक पूजा आप स्वीकार करें।
हे शम्भो, मेरी आत्मा ही आप हैं, मेरी बुद्धि माता पार्वती के समान है, मेरे प्राण आपके गण हैं और मेरा शरीर आपका मंदिर है। विषयों का उचित उपयोग आपकी पूजा है और मेरी निद्रा समाधि के समान है। मेरे पैरों से होने वाला प्रत्येक संचरण आपकी प्रदक्षिणा है और मेरे मुख से निकले सभी शब्द आपकी स्तुति हैं।
मैं जो भी कर्म करता हूँ, वह सब हे शम्भो, आपकी आराधना के रूप में आपको समर्पित है।
शिव पंचाक्षर स्तोत्रम्
भगवान शिव की उपासना में “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का विशेष महत्व माना जाता है। शिव पंचाक्षर स्तोत्रम् में भगवान शिव के स्वरूप की स्तुति न, म, शि, वा और य इन पाँच अक्षरों के माध्यम से की गई है। श्रद्धा और भक्ति से इसका पाठ भगवान शिव की आराधना और स्मरण के लिए किया जाता है।
नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय
तस्मै नकाराय नमः शिवाय॥१॥
मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय
नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय।
मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय
तस्मै मकाराय नमः शिवाय॥२॥
शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द-
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय
तस्मै शिकाराय नमः शिवाय॥३॥
वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य-
मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय
तस्मै वकाराय नमः शिवाय॥४॥
यक्षस्वरूपाय जटाधराय
पिनाकहस्ताय सनातनाय।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय
तस्मै यकाराय नमः शिवाय॥५॥
पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं
यः पठेच्छिवसन्निधौ।
शिवलोकमवाप्नोति
शिवेन सह मोदते॥
पहला श्लोक — “न”
जो नागराज को हार के रूप में धारण करते हैं, तीन नेत्रों वाले हैं, जिनके शरीर पर भस्म सुशोभित है, जो नित्य, पवित्र और दिगंबर स्वरूप हैं, उन महेश्वर भगवान शिव को “न” अक्षर के रूप में प्रणाम है।
दूसरा श्लोक — “म”
जिनका गंगाजल और चंदन से अभिषेक किया जाता है, जो नंदी और शिवगणों के स्वामी हैं तथा मंदार और अनेक पुष्पों से पूजित हैं, उन भगवान शिव को “म” अक्षर के रूप में प्रणाम है।
तीसरा श्लोक — “शि”
जो स्वयं कल्याणस्वरूप शिव हैं, जिनका तेज माता गौरी के मुख-कमल के लिए सूर्य के समान है, जिन्होंने दक्ष के यज्ञ का विनाश किया और जिनका कंठ नीलवर्ण है, उन वृषभध्वज भगवान शिव को “शि” अक्षर के रूप में प्रणाम है।
चौथा श्लोक — “वा”
जिनकी पूजा वसिष्ठ, अगस्त्य, गौतम जैसे महान ऋषियों और देवताओं द्वारा की जाती है तथा जिनके तीन नेत्रों में चंद्रमा, सूर्य और अग्नि का तेज माना गया है, उन भगवान शिव को “वा” अक्षर के रूप में प्रणाम है।
पाँचवाँ श्लोक — “य”
जो यक्ष स्वरूप, जटाधारी, हाथ में पिनाक धनुष धारण करने वाले, सनातन, दिव्य और देवस्वरूप हैं, उन भगवान शिव को “य” अक्षर के रूप में प्रणाम है।
अंतिम श्लोक:
यह पाँच अक्षरों से युक्त पवित्र स्तोत्र है। परंपरागत मान्यता के अनुसार जो व्यक्ति शिव के सन्निधि में इसका पाठ करता है, वह शिवलोक को प्राप्त करता है और भगवान शिव के साथ आनंद करता है।
बिल्वाष्टकम्
भगवान शिव की पूजा में बिल्वपत्र का विशेष महत्व माना गया है। बिल्वाष्टकम् में भगवान शिव को बिल्वपत्र अर्पित करने की महिमा का वर्णन किया गया है। श्रद्धा से बिल्वपत्र अर्पित करते हुए इस स्तोत्र का पाठ भगवान शिव की आराधना के रूप में किया जाता है।
त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रियायुधम्।
त्रिजन्मपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम्॥१॥
त्रिशाखैर्बिल्वपत्रैश्च ह्यच्छिद्रैः कोमलैः शुभैः।
तव पूजां करिष्यामि एकबिल्वं शिवार्पणम्॥२॥
कोटिकन्यासदानेन अश्वमेधशतेन च।
महादेवस्य पूजां च एकबिल्वं शिवार्पणम्॥३॥
काशीक्षेत्रनिवासेन कालभैरवदर्शनात्।
प्रयागे माधवं दृष्ट्वा एकबिल्वं शिवार्पणम्॥४॥
उमया सहितं देवं नन्दिवाहनमेव च।
भस्मलेपनसंयुक्तं एकबिल्वं शिवार्पणम्॥५॥
दन्तिकोटिसहस्राणि वाजपेयशतानि च।
कोटिकन्याप्रदानेन एकबिल्वं शिवार्पणम्॥६॥
लक्ष्म्या स्तनुत उत्पन्नं महादेवस्य च प्रियम्।
बिल्ववृक्षं प्रयच्छामि एकबिल्वं शिवार्पणम्॥७॥
दर्शनं बिल्ववृक्षस्य स्पर्शनं पापनाशनम्।
अघोरपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम्॥८॥
मूलतो ब्रह्मरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे।
अग्रतः शिवरूपाय एकबिल्वं शिवार्पणम्॥९॥
बिल्वाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत् शिवसन्निधौ।
सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोकमवाप्नुयात्॥
पहला श्लोक: तीन पत्तियों वाला बिल्वपत्र तीन गुणों और भगवान शिव के तीन नेत्रों का स्मरण कराता है। ऐसा बिल्वपत्र अर्पित करने से तीन जन्मों के पापों के नाश की पारंपरिक मान्यता है।
दूसरा श्लोक: कोमल, सुंदर और बिना किसी दोष वाला तीन शाखाओं वाला बिल्वपत्र मैं भगवान शिव की पूजा में अर्पित करता हूँ।
तीसरा श्लोक: स्तोत्र में बिल्वपत्र को अत्यंत पुण्यदायक बताते हुए कहा गया है कि भगवान महादेव को एक बिल्वपत्र अर्पित करना महान धार्मिक पुण्य के समान माना गया है।
चौथा श्लोक: काशी में निवास, कालभैरव के दर्शन और प्रयाग में भगवान माधव के दर्शन जैसी धार्मिक साधनाओं की महिमा का स्मरण करते हुए बिल्वपत्र भगवान शिव को अर्पित किया जाता है।
पाँचवाँ श्लोक: माता पार्वती के साथ विराजमान, नंदी को वाहन के रूप में धारण करने वाले और भस्म से विभूषित भगवान शिव को बिल्वपत्र अर्पित किया जाता है|
छठा श्लोक: विभिन्न महान धार्मिक दानों और यज्ञों के पुण्य का स्मरण करते हुए एक बिल्वपत्र भगवान शिव को समर्पित करने की महिमा बताई गई है।
सातवाँ श्लोक: बिल्ववृक्ष की उत्पत्ति और भगवान महादेव को उसके प्रिय होने का वर्णन करते हुए बिल्वपत्र भगवान शिव को अर्पित किया जाता है।
आठवाँ श्लोक: बिल्ववृक्ष के दर्शन और स्पर्श को पापनाशक माना गया है। भगवान शिव को एक बिल्वपत्र अर्पित करने की महिमा इसमें बताई गई है।
नौवाँ श्लोक: बिल्ववृक्ष की जड़ में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और अग्रभाग में भगवान शिव का स्वरूप माना गया है। इसलिए बिल्वपत्र को भगवान शिव को समर्पित किया जाता है।
अंतिम श्लोक: बिल्वाष्टकम् को पुण्यदायक स्तोत्र बताया गया है। परंपरागत मान्यता के अनुसार शिव के सन्निधि में इसका पाठ करने से पापों से मुक्ति और शिवलोक की प्राप्ति होती है।
शिव महिम्न स्तोत्र
भगवान शिव की उपासना में शिव महिम्न स्तोत्र का विशेष महत्व माना जाता है। इस स्तोत्र में भगवान शिव की अनंत महिमा, करुणा, शक्ति और दिव्य स्वरूप का वर्णन किया गया है। श्रद्धा और भक्ति से इसका पाठ भगवान शिव की आराधना और उनके प्रति समर्पण की भावना से किया जाता है।
महिम्नः पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी
स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः।
अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणन्
ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः॥१॥
अतीतः पन्थानं तव च महिमा वाङ्मनसयोः
अतद्व्यावृत्त्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि।
स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य विषयः
पदे तुर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः॥२॥
मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवता
तव ब्रह्मन् किं वागपि सुरगुरोर्विस्मयपदम्।
मम त्वेतां वाणीं गुणकथनपुण्येन भवतः
पुनामीत्यर्थेऽस्मिन् पुरमथन बुद्धिर्व्यवसिता॥३॥
तवैश्वर्यं यत्तज्जगदुदयरक्षाप्रलयकृत्
त्रयीवस्तु व्यस्तं तिसृषु गुणभिन्नासु तनुषु।
अभव्यानामस्मिन् वरद रमणीयामरमणीं
विहन्तुं व्याक्रोशीं विदधत इहैके जडधियः॥४॥
किमीहः किंकायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनं
किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च।
अतर्क्यैश्वर्ये त्वय्यनवसरदुःस्थो हतधियः
कुतर्कोऽयं कांश्चिन्मुखरयति मोहाय जगतः॥५॥
अजन्मानो लोकाः किमवयववन्तोऽपि जगतां
अधिष्ठातारं किं भवविधिरनादृत्य भवति।
अनीशो वा कुर्याद्भुवनजनने कः परिकरो
यतो मन्दास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे॥६॥
त्रयी सांख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति
प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च।
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषां
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव॥७॥
महोक्षः खट्वाङ्गं परशुरजिनं भस्म फणिनः
कपालं चेतीयत्तव वरद तन्त्रोपकरणम्।
सुरास्तां तामृद्धिं दधति तु भवद्भ्रूप्रणिहितां
न हि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति॥८॥
ध्रुवं कश्चित्सर्वं सकलमपरस्त्वध्रुवमिदं
परो ध्रौव्याध्रौव्ये जगति गदति व्यस्तविषये।
समस्तेऽप्येतस्मिन् पुरमथन तैर्विस्मित इव
स्तुवञ्जिह्रेमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता॥९॥
तवैश्वर्यं यत्नाद्यदुपरि विरिञ्चिर्हरिरधः
परिच्छेतुं यातावनलमनलस्कन्धवपुषः।
ततो भक्तिश्रद्धाभरगुरुगृणद्भ्यां गिरिश यत्
स्वयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति॥१०॥
अयत्नादापाद्य त्रिभुवनमवैरव्यतिकरं
दशास्यो यद्बाहूनभृत रणकण्डूपरवशान्।
शिरःपद्मश्रेणी-रचितचरणाम्भोरुह-बलेः
स्थिरायास्त्वद्भक्तेस्त्रिपुरहर विस्फूर्जितमिदम्॥११॥
अमुष्य त्वत्सेवा-समधिगतसारं भुजवनं
बलात्कैलासेऽपि त्वदधिवसतौ विक्रमयतः।
अलभ्या पातालेऽप्यलसचलिताङ्गुष्ठशिरसि
प्रतिष्ठा त्वय्यासीद्ध्रुवमुपचितो मुह्यति खलः॥१२॥
यदृद्धिं सुत्राम्णो वरद परमोच्चैरपि सतीं
अधश्चक्रे बाणः परिजनविधेयत्रिभुवनः।
न तच्चित्रं तस्मिन् वरिवसितरि त्वच्चरणयोः
न कस्याप्युन्नत्यै भवति शिरसस्त्वय्यवनतिः॥१३॥
अकाण्डब्रह्माण्डक्षयचकितदेवासुरकृपा
विधेयस्यासीत् या त्रिनयन विषं संहृतवतः।
स कल्माषः कण्ठे तव न कुरुते न श्रियमहो
विकारोऽपि श्लाघ्यो भुवनभयभङ्गव्यसनिनः॥१४॥
असितगिरिसमं स्यात्कज्जलं सिन्धुपात्रे
सुरतरुवरशाखा लेखनी पत्रमुर्वी।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं
तदपि तव गुणानामीश पारं न याति॥१५॥
असुरसुरमुनीन्द्रैरर्चितस्येन्दुमौलेः
ग्रथितगुणमहिम्नो निर्गुणस्येश्वरस्य।
सकलगणवरिष्ठः पुष्पदन्ताभिधानः
रुचिरमलघुवृत्तैः स्तोत्रमेतच्चकार॥१६॥
अहरहरनवद्यं धूर्जटेः स्तोत्रमेतत्
पठति परमभक्त्या शुद्धचित्तः पुमान्यः।
स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथात्र
प्रचुरतरधनायुः पुत्रवान्कीर्तिमांश्च॥१७॥
महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः।
अघोरान्नापरो मन्त्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम्॥१८॥
दीक्षा दानं तपस्तीर्थं ज्ञानं यागादिकाः क्रियाः।
महिम्नस्तव पाठस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥१९॥
कुसुमदशननामा सर्वगन्धर्वराजः
शशिधरवरमौलेर्देवदेवस्य दासः।
स खलु निजमहिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात्
स्तवनमिदमकार्षीद्दिव्यदिव्यं महिम्नः॥२०॥
सुरवरमुनिपूज्यं स्वर्गमोक्षैकहेतुं
पठति यदि मनुष्यः प्राञ्जलिर्नान्यचेताः।
व्रजति शिवसमीपं किन्नरैः स्तूयमानः
हे भगवान शिव, आपकी महिमा अनंत है। ब्रह्मा आदि देवता भी आपकी महिमा का पूरा वर्णन नहीं कर सकते। मेरी बुद्धि सीमित है, फिर भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार आपकी स्तुति करना मेरे लिए सौभाग्य की बात है।
हे प्रभु, आपकी महिमा मन और वाणी की सीमा से परे है। वेद भी आपके स्वरूप का वर्णन करते हुए अंततः मौन हो जाते हैं। इसलिए आपकी महिमा को पूरी तरह समझ पाना किसी के लिए संभव नहीं है।
हे भगवान शिव, आपकी स्तुति करने के लिए मेरी वाणी भी पर्याप्त नहीं है। फिर भी आपके गुणों का वर्णन करने से मेरी वाणी और मेरा मन पवित्र होता है, इसलिए मैं श्रद्धापूर्वक आपकी स्तुति करता हूँ।
हे वरदायक भगवान शिव, आप ही सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार के आधार हैं। आपके विभिन्न स्वरूपों को समझना सामान्य बुद्धि के लिए कठिन है, फिर भी कुछ लोग अपनी सीमित समझ के कारण आपके स्वरूप पर तर्क करते हैं
हे प्रभु, यह संसार कैसे बना, इसका आधार क्या है और इसकी रचना किस प्रकार हुई—इन प्रश्नों का पूरा उत्तर मनुष्य की बुद्धि से पाना कठिन है। आपकी दिव्य शक्ति तर्क से परे है, फिर भी मनुष्य अपने सीमित ज्ञान से अनेक प्रकार के तर्क करता है।
हे भगवान शिव, इस संसार की उत्पत्ति के विषय में अलग-अलग विचार हो सकते हैं, लेकिन आपके बिना इस सृष्टि की व्यवस्था को समझना कठिन है। आपकी परम शक्ति के कारण ही यह संसार अस्तित्व में है
सांख्य, योग, पाशुपत और वैष्णव आदि विभिन्न धार्मिक मार्गों का वर्णन किया गया है। मनुष्यों की रुचि और समझ अलग-अलग होने के कारण उनके मार्ग भी अलग हो सकते हैं, लेकिन जैसे अलग-अलग दिशाओं से बहने वाली नदियाँ अंततः समुद्र में मिलती हैं, वैसे ही सभी मार्ग परम सत्य की ओर जा सकते हैं।
हे भगवान शिव, आपका स्वरूप अत्यंत सरल और वैराग्यपूर्ण है। नंदी, खट्वांग, परशु, व्याघ्रचर्म, भस्म, सर्प और कपाल आदि आपके स्वरूप के प्रतीक हैं। आप आत्मस्वरूप में स्थित हैं और सांसारिक विषयों से मोहित नहीं होते।
हे त्रिपुरासुर का संहार करने वाले भगवान शिव, संसार के स्थायी और अस्थायी होने को लेकर विद्वानों के अलग-अलग मत हैं। आपकी अनंत महिमा के सामने मेरी वाणी भी संकोच करती है, फिर भी मैं आपकी स्तुति करने का प्रयास करता हूँ
ब्रह्मा और विष्णु ने आपके अनंत स्वरूप की सीमा जानने का प्रयास किया, लेकिन वे उसे नहीं जान सके। आपकी अनंत शक्ति के सामने उनकी भी सीमा समाप्त हो गई। इससे आपकी महिमा और भक्ति की शक्ति का बोध होता है।
रावण ने अपने बल के अभिमान में कैलास पर्वत को उठाने का प्रयास किया। उसके अहंकार को भगवान शिव ने अपने पैर के अंगूठे मात्र से दबा दिया। यह भगवान शिव की महान शक्ति और अहंकार के विनाश का प्रतीक माना जाता है।
रावण को अपनी शक्ति पर बहुत गर्व था, लेकिन भगवान शिव के सामने उसका अभिमान समाप्त हो गया। यह प्रसंग बताता है कि कितना भी शक्तिशाली व्यक्ति क्यों न हो, भगवान शिव की दिव्य शक्ति के सामने उसका अहंकार टिक नहीं सकता।
भगवान शिव के चरणों में सिर झुकाना किसी भी व्यक्ति के लिए उसके उत्थान का कारण बन सकता है। जो व्यक्ति अहंकार छोड़कर भगवान के चरणों में समर्पित होता है, वह आध्यात्मिक रूप से ऊँचा उठता है।
समुद्र मंथन से निकले विष को देखकर देवताओं और असुरों में भय उत्पन्न हुआ। संसार की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उस विष को अपने कंठ में धारण किया और नीलकंठ कहलाए। उनका यह त्याग और करुणा अत्यंत महान मानी गई है
यदि पूरा पर्वत स्याही बन जाए, समुद्र स्याही रखने का पात्र बन जाए, कल्पवृक्ष की शाखा कलम बन जाए और पूरी पृथ्वी कागज बन जाए, तब भी देवी सरस्वती अनंत काल तक लिखें तो भगवान शिव के गुणों की पूर्ण सीमा नहीं लिखी जा सकती।
यह महान स्तोत्र गंधर्वराज पुष्पदंत द्वारा भगवान शिव की स्तुति में रचा गया माना जाता है। इसमें भगवान शिव के दिव्य गुणों और महानता का सुंदर वर्णन किया गया है।
जो व्यक्ति शुद्ध मन और परम भक्ति से भगवान शिव की इस स्तुति का नियमित पाठ करता है, उसके लिए भगवान शिव की भक्ति और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होने की पारंपरिक मान्यता है।
भगवान शिव से बड़ा कोई देव नहीं और उनकी महिमा से बढ़कर कोई स्तुति नहीं मानी गई है। इसी प्रकार अघोर मंत्र से श्रेष्ठ कोई मंत्र और गुरु-तत्त्व से श्रेष्ठ कोई तत्त्व नहीं बताया गया है।
दीक्षा, दान, तप, तीर्थ, ज्ञान, यज्ञ आदि अनेक धार्मिक कार्यों का महत्व है, लेकिन स्तोत्र में भगवान शिव की महिमा के पाठ को अत्यंत पुण्यदायक बताया गया है
गंधर्वराज पुष्पदंत भगवान शिव के भक्त थे। उनके द्वारा भगवान शिव की महिमा में इस दिव्य स्तोत्र की रचना की गई मानी जाती है। यह स्तोत्र उनकी भक्ति और समर्पण को व्यक्त करता है
जो मनुष्य श्रद्धा और एकाग्रचित्त होकर इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसके लिए इसे भगवान शिव की कृपा और आध्यात्मिक कल्याण का साधन माना गया है। यह स्तोत्र भगवान शिव की महिमा का भक्तिपूर्ण स्मरण कराता है।
महामृत्युंजय मंत्र
भगवान शिव की उपासना में महामृत्युंजय मंत्र का विशेष महत्व माना जाता है। इसे भगवान शिव के त्र्यंबक स्वरूप की स्तुति और प्रार्थना के रूप में जपा जाता है। परंपरा में इस मंत्र का जाप स्वास्थ्य, भय और संकट के समय भगवान शिव की कृपा की प्रार्थना के लिए किया जाता है।
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे
सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्
मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे — हम तीन नेत्रों वाले भगवान शिव की उपासना करते हैं।
सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् — जो दिव्य सुगंध के समान सर्वत्र व्याप्त हैं और जीवन को पोषण एवं शक्ति प्रदान करने वाले हैं।
उर्वारुकमिव बन्धनान् — जैसे पका हुआ फल अपनी बेल के बंधन से सहज रूप से अलग हो जाता है।
मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् — उसी प्रकार हे भगवान शिव, हमें मृत्यु और सांसारिक बंधनों से मुक्त करें तथा अमृत स्वरूप से वंचित न करें।
महामृत्युंजय मंत्र का मूल भाव भगवान शिव से मृत्यु के भय और सांसारिक बंधनों से मुक्ति तथा उनकी कृपा की प्रार्थना करना है। परंपरागत रूप से इसे श्रद्धा और एकाग्रता के साथ जपने की परंपरा रही है।
शिवापराधक्षमापन स्तोत्रम्
भगवान शिव की उपासना में क्षमा प्रार्थना का विशेष महत्व माना गया है। शिवापराधक्षमापन स्तोत्रम् में भक्त भगवान शिव से पूजा में हुई जाने-अनजाने की भूलों और अपराधों के लिए क्षमा मांगता है। यह स्तोत्र भक्त के विनम्र भाव, आत्मसमर्पण और भगवान शिव की करुणा पर विश्वास को व्यक्त करता है।
आदौ कर्मप्रसङ्गात्कलयति कलुषं मातृकुक्षौ स्थितं मां
विण्मूत्रामेध्यपूर्णे क्वथयति सततं जाठरो जातवेदाः।
यद्यद्वै तत्र दुःखं व्यथयति नितरां शक्यते केन वक्तुं
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो॥१॥
बाल्ये दुःखातिरेको मललुलितवपुः स्तन्यपाने पिपासा
नो शक्तश्चेन्द्रियेभ्यो भवगुणजनिता जन्तवो मां तुदन्ति।
नानारोगादिदुःखाद्रुदनपरवशः शङ्करं न स्मरामि
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो॥२॥
प्रौढोऽहं यौवनस्थो विषयविषधरैः पञ्चभिर्मर्मसन्धौ
दष्टो नष्टो विवेकः सुतधनयुवतिस्वादुसौख्ये निषण्णः।
शैवीचिन्ताविहीनं मम हृदयमहो मानगर्वाधिरूढं
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो॥३॥
वार्धक्ये चेन्द्रियाणां विगतगतिमतिश्चाधिदैवादितापैः
पापै रोगैर्वियोगैस्त्वनवसितवपुः प्रौढिहीनं च दीनम्।
मिथ्यामोहाभिलाषैर्भ्रमति मम मनो धूर्जटेर्ध्यानशून्यं
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो॥४॥
स्नात्वा प्रत्युषकाले विधिवशमकरोद् दन्तधावनादिकं वा
पूजां ते नीलकण्ठ त्रिगुणमयतनुं तर्पयित्वा प्रसूनैः।
न त्वां ध्यात्वा न पूजां न च गुणकथनं नापि भक्तिं कृताहं
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो॥५॥
चन्द्रोद्भासितशेखरे स्मरहरे गङ्गाधरे शङ्करे
सर्पैर्भूषितकण्ठकर्णविवरे नेत्रोत्थवैश्वानरे।
दन्तित्वग्वसनाय भस्मविलसद्भाले त्रिशूलाय ते
नमःस्तोत्रमिदं पठेत्प्रतिदिनं नित्यं त्वदर्थं प्रभो॥६॥
त्वत्तो जगज्जायते देव भवता तिष्ठत्येव त्वयि लीयते।
त्वय्येव जगदुद्धृतं हर महेश्वर तस्मान्मयि कृपां कुरु॥
करचरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा
श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधम्।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व
जय जय करुणाब्धे श्रीप्रभो शम्भुमूर्ते॥७॥
कालभैरवाष्टकम्
भगवान शिव के उग्र और रक्षक स्वरूपों में कालभैरव का विशेष महत्व माना जाता है। कालभैरव को भगवान शिव का एक दिव्य स्वरूप माना जाता है और उनकी उपासना में भय, नकारात्मकता तथा बाधाओं से मुक्ति की प्रार्थना की जाती है। श्रद्धा और भक्ति से कालभैरवाष्टकम् का पाठ भगवान शिव के भैरव स्वरूप की आराधना के लिए किया जाता है।
देवराजसेव्यमानपावनाङ्घ्रिपङ्कजं
व्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम्।
नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगम्बरं
काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे॥
भानुकोटिभास्वरं भवाब्धितारकं परं
नीलकण्ठमीप्सितार्थदायकं त्रिलोचनम्।
कालकालमम्बुजाक्षमक्षशूलमक्षरं
काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे॥
शूलटङ्कपाशदण्डपाणिमादिकारणं
श्यामकायमादिदेवमक्षरं निरामयम्।
भीमविक्रमं प्रभुं विचित्रताण्डवप्रियं
काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे॥
भुक्तिमुक्तिदायकं प्रशस्तचारुविग्रहं
भक्तवत्सलं स्थितं समस्तलोकविग्रहम्।
निक्वणन्मनोज्ञहेमकिङ्किणीलसत्कटिं
काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे॥
धर्मसेतुपालकं त्वधर्ममार्गनाशकं
कर्मपाशमोचकं सुशर्मदायकं विभुम्।
स्वर्णवर्णकेशपाशशोभिताङ्गमण्डलं
काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे॥
रत्नपादुकाप्रभाभिरामपादयुग्मकं
नित्यनिर्मलाद्वितीयमिष्टदैवतं प्रभुम्।
मृत्युदर्पनाशनं करालदंष्ट्रमोक्षणं
काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे॥
अट्टहासभिन्नपद्मजाण्डकोशसन्ततिं
दृष्टिपातनष्टपापजालमुग्रशासनम्।
अष्टसिद्धिदायकं कपालमालिकाधरं
काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे॥
भूतसङ्घनायकं विशालकीर्तिदायकं
काशिवासलोकपुण्यपापशोधकं विभुम्।
नीतिमार्गकोविदं पुरातनं जगत्पतिं
काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे॥
भगवान कालभैरव के चरणों की देवता भी पूजा करते हैं। वे गले में सर्प धारण करते हैं और उनके सिर पर चंद्रमा सुशोभित है। वे दयालु और भक्तों पर कृपा करने वाले हैं। मैं काशी के स्वामी भगवान कालभैरव को प्रणाम करता हूँ|
भगवान कालभैरव करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी हैं। वे संसार के दुखों से मुक्ति दिलाने वाले और भक्तों की इच्छाओं को पूरा करने वाले माने जाते हैं। वे तीन नेत्रों वाले हैं और स्वयं काल के भी काल हैं।
भगवान कालभैरव हाथों में त्रिशूल, दंड, पाश आदि धारण करते हैं। वे भगवान शिव के आदि स्वरूप हैं, अत्यंत शक्तिशाली और पराक्रमी हैं तथा शिव के दिव्य तांडव को प्रिय मानते हैं।
भगवान कालभैरव भक्तों को सुख और मुक्ति प्रदान करने वाले माने जाते हैं। वे अपने भक्तों से प्रेम करते हैं और सभी प्राणियों के कल्याणकारी हैं। उनके कमर में बंधी छोटी-छोटी स्वर्ण घंटियाँ मधुर ध्वनि करती हैं
भगवान कालभैरव धर्म की रक्षा करते हैं और अधर्म के मार्ग को नष्ट करने वाले माने जाते हैं। वे मनुष्य को कर्मों के बंधन से मुक्त करने और जीवन में शांति एवं कल्याण प्रदान करने वाले हैं।
भगवान कालभैरव के चरण रत्नों से सुशोभित पादुकाओं से सुंदर दिखाई देते हैं। वे पवित्र और सदैव निर्मल हैं। वे मृत्यु के भय और अहंकार को दूर करने वाले तथा अपने भक्तों की रक्षा करने वाले माने जाते हैं।
भगवान कालभैरव का प्रचंड रूप अत्यंत शक्तिशाली है। उनकी कृपा से पापों का नाश होने की धार्मिक मान्यता है। वे भक्तों को अष्ट सिद्धियाँ प्रदान करने वाले और कपालों की माला धारण करने वाले स्वरूप में वर्णित हैं।
भगवान कालभैरव भूत-प्रेत आदि गणों के स्वामी, महान यश प्रदान करने वाले और काशी के रक्षक माने जाते हैं। वे मनुष्य को सही और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं तथा समस्त संसार के स्वामी हैं।
सार:
कालभैरवाष्टकम् में भगवान शिव के कालभैरव स्वरूप की स्तुति की गई है। इसमें उन्हें धर्म के रक्षक, अधर्म के विनाशक, भय को दूर करने वाले और भक्तों के कल्याणकर्ता के रूप में स्मरण किया गया है।
शिवाष्टकम्
भगवान शिव की पूजा में स्तोत्र पाठ को भक्ति और समर्पण का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है। शिवाष्टकम् में भगवान शिव के दिव्य स्वरूप, उनकी करुणा, शक्ति और भक्तों के प्रति कृपा का वर्णन किया गया है। श्रद्धा से इसका पाठ भगवान शिव के स्मरण और आराधना के लिए किया जाता है।
प्रभुं प्राणनाथं विभुं विश्वनाथं
जगन्नाथनाथं सदानन्दभाजम्।
भवद्भव्यभूतेश्वरं भूतनाथं
शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे॥१॥
गले रुण्डमालं तने सर्पजालं
महाकालकालं गणेशादिपालम्।
जटाजूटगङ्गोत्तरङ्गैर्विशालं
शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे॥२॥
मुदामाकरं मण्डनं मण्डयन्तं
महामण्डलं भस्मभूषाधरन्तम्।
अनादिं ह्यपारं महामोहमारं
शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे॥३॥
वटाधो निवासं महाट्टाट्टहासं
महापापनाशं सदासुप्रकाशम्।
गिरीशं गणेशं सुरेशं महेशं
शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे॥४॥
गिरिन्द्रात्मजासंगृहीतार्धदेहं
गिरौ संस्थितं सर्वदापन्नगेहम्।
परब्रह्म ब्रह्मादिभिर्वन्द्यमानं
शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे॥५॥
कपालं त्रिशूलं कराभ्यां दधानं
पदाम्भोज नम्राय कामं ददानम्।
बलीवर्दयानं सुराणां प्रधानं
शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे॥६॥
शरच्चन्द्रगात्रं गुणानन्तकान्तं
त्रिनेत्रं पवित्रं धनेशस्य मित्रम्।
अपर्णाकलत्रं चरित्रं विचित्रं
शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे॥७॥
हरं सर्पहारं चिता भूपहारं
भवं वेदसारं सदा निर्विकारम्।
श्मशाने वसन्तं मनोजं दहन्तं
शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे॥८॥
मैं भगवान शिव की स्तुति करता हूँ, जो जीवन के स्वामी, पूरे संसार में व्याप्त, विश्व के नाथ और सभी प्राणियों के स्वामी हैं। वे आनंद स्वरूप और कल्याणकारी भगवान शंकर हैं
भगवान शिव गले में मुंडों की माला और शरीर पर सर्प धारण करते हैं। वे स्वयं महाकाल के भी काल हैं और भगवान गणेश सहित सभी गणों के रक्षक हैं। उनकी जटाओं में पवित्र गंगा विराजमान है।
भगवान शिव आनंद देने वाले और भस्म को आभूषण के रूप में धारण करने वाले हैं। वे आदि और अनंत हैं तथा संसार के मोह और अज्ञान को दूर करने वाले माने गए हैं।
भगवान शिव वटवृक्ष के नीचे निवास करने वाले, अपने दिव्य अट्टहास से संसार को प्रभावित करने वाले और महान पापों का नाश करने वाले हैं। वे पर्वतराज के स्वामी, गणों के स्वामी और देवताओं के भी देव हैं
भगवान शिव ने माता पार्वती को अपने आधे शरीर में स्थान दिया है। वे कैलास पर्वत पर निवास करते हैं और संकट में पड़े भक्तों के आश्रय हैं। उन्हें परम ब्रह्म माना गया है और ब्रह्मा आदि देवता भी उनकी वंदना करते हैं।
भगवान शिव हाथों में कपाल और त्रिशूल धारण करते हैं। जो भक्त उनके चरणों में श्रद्धा से झुकता है, उस पर वे कृपा करते हैं। वे नंदी पर विराजमान और देवताओं में श्रेष्ठ माने गए हैं।
भगवान शिव का शरीर शरद ऋतु के चंद्रमा के समान सुंदर और उज्ज्वल बताया गया है। वे अनंत गुणों से युक्त, तीन नेत्रों वाले और पवित्र हैं। माता पार्वती उनकी अर्धांगिनी हैं और उनका चरित्र अद्भुत एवं दिव्य है
भगवान शिव संहारकर्ता हैं, सर्प को हार के रूप में धारण करते हैं और श्मशान में निवास करने वाले माने जाते हैं। वे वेदों के सार और सदैव निर्विकार हैं। उन्होंने कामदेव का दहन किया था।
सार:
शिवाष्टकम् में भगवान शिव को विश्वनाथ, महाकाल, भक्तों के रक्षक, पापों का नाश करने वाले, परम ब्रह्म और कल्याणकारी महादेव के रूप में स्मरण किया गया है। श्रद्धा और भक्ति से इसका पाठ भगवान शिव की आराधना के लिए किया जाता है।
चंद्रशेखराष्टकम्
भगवान शिव के चंद्रशेखर स्वरूप की उपासना में चंद्रशेखराष्टकम् का विशेष महत्व माना जाता है। इस स्तोत्र में भगवान शिव को मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाले, भक्तों के रक्षक और मृत्यु के भय को दूर करने वाले स्वरूप में स्मरण किया गया है। श्रद्धा और भक्ति से इसका पाठ भगवान शिव की आराधना के लिए किया जाता है।
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर पाहि माम्।
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्ष माम्॥
रत्नसानुशरासनं रजताद्रिशृङ्गनिकेतनं
शिञ्जिनीकृतपन्नगेश्वरमच्युतानलसायकम्।
क्षिप्रदग्धपुरत्रयं त्रिदिवालयैरभिवन्दितं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥१॥
पञ्चपादपपुष्पगन्धपदाम्बुजद्वयशोभितं
भाललोचनजातपावकदग्धमन्मथविग्रहम्।
भस्मदिग्धकलेवरं भवनाशनं भवमव्ययं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥२॥
मत्तवारणमुख्यचर्मकृतोत्तरीयमनोहरं
पङ्कजासनपद्मलोचनपूजिताङ्घ्रिसरोरुहम्।
देवसिन्धुतरङ्गशीकरसिक्तशुभ्रजटाधरं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥३॥
यक्षराजसखं भगाक्षहरं भुजङ्गविभूषणं
शैलराजसुतापरिष्कृतचारुवामकलेवरम्।
क्ष्वेलनीलगलं परश्वधधारिणं मृगधारिणं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥४॥
कुण्डलीकृतकुण्डलीश्वरकुण्डलं वृषवाहनं
नारदादिमुनीश्वरस्तुतवैभवं भुवनेश्वरम्।
अन्धकान्तकमाश्रितामरपादपं शमनान्तकं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥५॥
भेषजं भवरोहिणामखिलापदामपहारिणं
दक्षयज्ञविनाशनं त्रिगुणात्मकं त्रिविलोचनम्।
भुक्तिमुक्तिफलप्रदं सकलाघसङ्घनिबर्हणं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥६॥
भक्तवत्सलमर्चितं निधिमक्षयं हरिदम्बरं
सर्वभूतपतिं परात्परमप्रमेयमनुत्तमम्।
सोमवारि-मृगाङ्कशेखरं शिवं करुणाकरं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥७॥
विश्वसृष्टिविधायिनं पुनरेव पालनतत्परं
संहरन्तमथ प्रपञ्चमशेषलोकनिवासिनम्।
क्रीडयन्तमहर्निशं गणनाथयूथसमन्वितं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥८॥
मृत्युभीतमृकण्डुसूनुकृतस्तवं शिवसन्निधौ
यः पठेच्छिवसन्निधौ भवेद् न तस्य मृतिभयम्।
पूर्णमायुररोगितामखिलार्थसम्पदमादरात्
चन्द्रशेखर एव तस्य ददाति मुक्तिमयत्नतः॥
मैं भगवान चंद्रशेखर की शरण लेता हूँ, जो रत्नों से सुशोभित पर्वत पर निवास करते हैं, सर्पों को धारण करते हैं और त्रिपुरासुर के तीनों नगरों का नाश करने वाले हैं। उनकी शरण में रहने वाले भक्त को मृत्यु का भय नहीं रहता—ऐसी धार्मिक मान्यता है।
भगवान शिव के चरण कमल के समान सुंदर हैं। उनके तीसरे नेत्र से निकली अग्नि ने कामदेव का दहन किया। वे शरीर पर भस्म धारण करते हैं और संसार के बंधनों से मुक्ति देने वाले माने जाते हैं
भगवान शिव गजचर्म धारण करते हैं। ब्रह्मा और विष्णु उनके चरणों की पूजा करते हैं। उनकी जटाओं में गंगा की जलधारा सुशोभित है। ऐसे चंद्रशेखर भगवान की शरण लेने वाले को मृत्यु का भय नहीं रहता।
भगवान शिव कुबेर के मित्र, कामदेव का नाश करने वाले और सर्पों को आभूषण के रूप में धारण करने वाले हैं। माता पार्वती उनके शरीर के बाएँ भाग में विराजमान हैं। वे नीलकंठ और हाथ में परशु धारण करने वाले हैं।
भगवान शिव सर्पों को आभूषण के रूप में धारण करते हैं और नंदी को अपना वाहन बनाते हैं। नारद आदि महान ऋषि उनकी स्तुति करते हैं। वे अंधकासुर का नाश करने वाले और मृत्यु पर विजय प्राप्त करने वाले माने गए हैं।
भगवान शिव संसार के दुखों और संकटों के लिए औषधि के समान हैं। उन्होंने दक्ष के यज्ञ का विनाश किया। वे त्रिनेत्रधारी हैं और भक्तों को भोग तथा मोक्ष का फल देने वाले माने जाते हैं।
भगवान शिव अपने भक्तों से प्रेम करने वाले, सभी प्राणियों के स्वामी और परम से भी परे हैं। वे करुणामय हैं और चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण करते हैं। उनकी शरण भक्त के लिए कल्याणकारी मानी गई है।
भगवान शिव सृष्टि की रचना, पालन और संहार करने वाली परम शक्ति के रूप में वर्णित हैं। वे समस्त संसार में निवास करते हैं और अपने गणों के साथ दिव्य लीला करते हैं।
अंतिम प्रार्थना:
परंपरा में कहा गया है कि मृत्यु के भय से पीड़ित भक्त मार्कंडेय ने भगवान शिव की स्तुति की थी। जो व्यक्ति श्रद्धा से चंद्रशेखराष्टकम् का पाठ करता है, उसके लिए भगवान शिव की कृपा से मृत्यु के भय से मुक्ति, दीर्घायु, आरोग्य और कल्याण की प्रार्थना की जाती है।
उमामहेश्वर स्तोत्रम्
भगवान शिव और माता पार्वती की संयुक्त उपासना को सनातन परंपरा में विशेष महत्व दिया गया है। उमामहेश्वर स्तोत्रम् में भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य स्वरूप की स्तुति की गई है। श्रद्धा से इसका पाठ दांपत्य सुख, पारिवारिक शांति और शिव-पार्वती की कृपा की प्रार्थना के लिए किया जाता है।
नमः शिवाभ्यां नवयौवनाभ्यां
परस्पराश्लिष्टवपुर्धराभ्याम्।
नगेन्द्रकन्यावृषकेतुनाथाभ्यां
नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम्॥१॥
नमः शिवाभ्यां सरसोत्सवाभ्यां
नमस्कृताभीष्टवरप्रदाभ्याम्।
नारायणेनार्चितपादुकाभ्यां
नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम्॥२॥
नमः शिवाभ्यां वृषवाहनाभ्यां
विरिञ्चिविष्ण्विन्द्रसुपूजिताभ्याम्।
विभूतिपाटीरविलेपनाभ्यां
नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम्॥३॥
नमः शिवाभ्यां जगदीश्वराभ्यां
जगत्पतिभ्यां जयविग्रहाभ्याम्।
जम्भारिमुख्यैरभिवन्दिताभ्यां
नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम्॥४॥
नमः शिवाभ्यां परमौषधाभ्यां
पञ्चाक्षरीपञ्जररञ्जिताभ्याम्।
प्रपञ्चसृष्टिस्थितिसंहृताभ्यां
नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम्॥५॥
नमः शिवाभ्यामतिसुन्दराभ्यां
अत्यन्तमासक्तहृदम्बुजाभ्याम्।
अशेषलोकैकहितङ्कराभ्यां
नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम्॥६॥
नमः शिवाभ्यां कलिनाशनाभ्यां
कङ्कालकलिताङ्गभूषणाभ्याम्।
कपालमालाङ्कितकन्धराभ्यां
नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम्॥७॥
नमः शिवाभ्यां रथवाहनाभ्यां
रवीन्दुवह्न्यर्कविलोचनाभ्याम्।
विरिञ्चिविष्ण्विन्द्रनुताभ्यां
नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम्॥८॥
नमः शिवाभ्यां जटिलाधराभ्यां
जरामृतिभ्यां च विवर्जिताभ्याम्।
जनार्दनाब्जोद्भवपूजिताभ्यां
नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम्॥९॥
नमः शिवाभ्यां विषमेक्षणाभ्यां
बिल्वच्छदामल्लिकदामभृद्भ्याम्।
शोभातिवाभ्यां शुभलक्षणाभ्यां
नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम्॥१०॥
नमः शिवाभ्यां पशुपालकाभ्यां
जगत्त्रयीरक्षणदीक्षिताभ्याम्।
समस्तदेवासुरपूजिताभ्यां
नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम्॥११॥
नमः शिवाभ्यां पशुपाशमोचकाभ्यां
सदाशिवाभ्यां दयितावराभ्याम्।
मृडाभ्यां शर्वाभ्यां नमो नमः
शङ्करपार्वतीभ्याम्॥१२॥
हे भगवान शिव और माता पार्वती, मैं आप दोनों को बार-बार प्रणाम करता हूँ। आप दोनों एक-दूसरे के प्रेम और एकता के प्रतीक हैं। माता पार्वती हिमालय की पुत्री हैं और भगवान शिव उनके पति हैं।
हे शिव-पार्वती, आप भक्तों को आनंद देने वाले और उनकी इच्छाओं को पूरा करने वाले माने जाते हैं। आपके चरणों की देवताओं द्वारा भी पूजा की जाती है। मैं आप दोनों को श्रद्धापूर्वक प्रणाम करता हूँ।
हे भगवान शिव और माता पार्वती, आप नंदी से जुड़े दिव्य स्वरूप में विराजमान हैं। ब्रह्मा, विष्णु और इंद्र जैसे देवता भी आपकी पूजा करते हैं। भगवान शिव भस्म धारण करते हैं और आपका स्वरूप अत्यंत पवित्र है।
हे शिव-पार्वती, आप पूरे संसार के स्वामी और सभी प्राणियों के कल्याणकर्ता हैं। देवता भी आपकी वंदना करते हैं। आप विजय और मंगल के स्वरूप माने जाते हैं।
हे शिव-पार्वती, आप संसार के दुखों को दूर करने वाली औषधि के समान हैं। पंचाक्षर मंत्र के द्वारा आपकी आराधना की जाती है। आप ही संसार की रचना, पालन और संहार की शक्ति के रूप में माने गए हैं।
आप दोनों अत्यंत सुंदर और एक-दूसरे के प्रति प्रेम से जुड़े हुए हैं। आप संपूर्ण संसार और सभी प्राणियों के हित की कामना करने वाले तथा कल्याण करने वाले हैं।
हे शिव-पार्वती, आप कलियुग के दोषों और नकारात्मक प्रभावों को दूर करने वाले माने जाते हैं। भगवान शिव का वैराग्यपूर्ण स्वरूप और माता पार्वती के साथ उनका दिव्य संबंध इस श्लोक में स्मरण किया गया है।
भगवान शिव के तीन नेत्र सूर्य, चंद्रमा और अग्नि के समान माने गए हैं। ब्रह्मा, विष्णु और इंद्र जैसे देवता भी शिव-पार्वती की स्तुति करते हैं
भगवान शिव जटाधारी हैं और माता पार्वती के साथ दिव्य स्वरूप में विराजमान हैं। उन्हें जन्म और मृत्यु से परे माना गया है। ब्रह्मा और विष्णु भी उनकी पूजा करते हैं।
भगवान शिव और माता पार्वती शुभ और सुंदर स्वरूप वाले हैं। उन्हें बिल्वपत्र और सुगंधित फूलों से पूजा जाता है। उनका स्वरूप भक्तों के लिए मंगलकारी माना गया है।
भगवान शिव सभी जीवों के रक्षक और तीनों लोकों की रक्षा करने वाले माने जाते हैं। देवता और असुर दोनों उनकी पूजा करते हैं।
भगवान शिव जीवों को सांसारिक बंधनों से मुक्त करने वाले हैं और सदैव कल्याण करने वाले माने जाते हैं। भक्त भगवान शिव और माता पार्वती को प्रणाम करके उनकी कृपा और आशीर्वाद की प्रार्थना करता है
सार:
उमामहेश्वर स्तोत्रम् भगवान शिव और माता पार्वती के प्रेम, एकता, शक्ति और कल्याणकारी स्वरूप की स्तुति है। श्रद्धा से इसका पाठ शिव-पार्वती की कृपा और पारिवारिक सुख-शांति की प्रार्थना के भाव से किया जाता है।
सूर्य बारहवें भाव में: प्रभाव, करियर, विदेश योग और अचूक उपाय | Sun in the 12th House

