छठ पूजा 2026 में सूर्यदेव को अर्घ्य देती व्रती महिलाएँ

छठ पूजा 2026: तिथि, अर्घ्य का समय, पजा विधि और धार्मिक महत्व

छठ पूजा का महत्व और इसका प्राचीन इतिहास

सनातन धर्म में ‘छठ पूजा’ (Chhath Puja) केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति, जल और सूर्य के प्रति मानव जाति के असीम प्रेम और कृतज्ञता का सबसे बड़ा प्रतीक है। यह दुनिया का एकमात्र ऐसा पर्व है, जिसमें न केवल उगते हुए सूर्य (Rising Sun) की पूजा की जाती है, बल्कि डूबते हुए सूर्य (Setting Sun) को भी अर्घ्य देकर यह महान संदेश दिया जाता है कि जो जीवन में अस्त हो रहा है (यानी ढल रहा है), उसका भी पूर्ण सम्मान होना चाहिए।

छठ महापर्व का विशेष महत्व:

  • प्रकृति और मानव का सीधा मिलन: यह पर्व पूरी तरह से प्रकृति को समर्पित है। इसमें किसी भी बंद कमरे में मूर्ति की पूजा नहीं होती, बल्कि साक्षात दिखाई देने वाले देवता— भगवान सूर्य देव (Sun God) और जल (नदियों, तालाबों, कुओं) की उपासना की जाती है।
  • सामाजिक समानता का सबसे बड़ा प्रतीक: छठ पूजा ऊंच-नीच, जाति-भेद और अमीरी-गरीबी की सभी दीवारों को पूरी तरह से तोड़ देती है। इस पूजा में किसी पुरोहित (पंडित) के मंत्रोच्चार की अनिवार्यता नहीं होती। एक ही घाट पर, एक ही नदी के जल में खड़े होकर सभी लोग बिना किसी भेदभाव के सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं। बांस के सूप और मिट्टी के बर्तनों का उपयोग समाज के हर वर्ग को जोड़ता है।
  • कठोर शुद्धता और सात्विकता: इस व्रत में शारीरिक और मानसिक पवित्रता (Purity) का इतना गहरा ध्यान रखा जाता है कि प्रसाद बनाने के लिए मिट्टी का नया चूल्हा, आम की सूखी लकड़ी और पीतल या कांसे के विशेष बर्तनों का ही उपयोग होता है।

छठ पूजा का प्राचीन इतिहास और वैदिक काल:

छठ पूजा का इतिहास अत्यंत प्राचीन है और इसके तार सीधे वैदिक काल (Vedic Period) से जुड़े हुए हैं। ऋग्वेद (Rigveda) में सूर्य देव और उनकी स्तुति के कई मंत्रों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। वैदिक आर्य जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य दिया करते थे, जो आज भी छठ पूजा का मुख्य आधार है।

प्राचीन काल में ऋषि-मुनि बिना अन्न-जल ग्रहण किए हफ्तों तक सूर्य की किरणों से ऊर्जा प्राप्त करते थे (जिसे ‘सूर्य त्राटक’ या ‘सोलर प्राणायाम’ कहा जाता था)। छठ का 36 घंटे का कठिन निर्जला व्रत भी उसी प्राचीन योग और तपस्या का एक लोक-स्वरूप है। सदियों से यह पर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल) की लोक संस्कृति का हिस्सा रहा है, लेकिन सूर्य उपासना का यह वैदिक इतिहास इसे पूरे भारतवर्ष का एक महान और ऐतिहासिक पर्व बनाता है।

छठ पूजा 2026: तिथियां और शुभ मुहूर्त

छठ पूजा कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से शुरू होकर सप्तमी तिथि तक चलने वाला 4 दिवसीय महापर्व है। यह दीपावली के ठीक 6 दिन बाद (षष्ठी तिथि को मुख्य पूजा) मनाया जाता है। वर्ष 2026 में दीपावली 8 नवंबर को है, इसलिए छठ महापर्व की शुरुआत 12 नवंबर 2026 से होगी।

छठ पूजा 2026 का विस्तृत 4-दिवसीय कैलेंडर और भगवान सूर्य को अर्घ्य देने का शुभ मुहूर्त इस प्रकार है:

  • पहला दिन – नहाय-खाय (Nahay Khay): 12 नवंबर 2026 (गुरुवार) यह कार्तिक शुक्ल चतुर्थी का दिन है, जहाँ से व्रत का विधिवत आरंभ होता है। स्नान के बाद व्रती (व्रत रखने वाले) कद्दू (लौकी) की सब्जी, चने की दाल और अरवा चावल से बना सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। यह भोजन सेंधा नमक में बनता है।
  • दूसरा दिन – खरना (Kharna): 13 नवंबर 2026 (शुक्रवार) कार्तिक शुक्ल पंचमी के इस दिन व्रती पूरे दिन निर्जला उपवास रखते हैं। शाम के समय मिट्टी के नए चूल्हे और आम की लकड़ी पर गुड़ की खीर (रसियाव) और रोटी बनाई जाती है। छठी मईया को इसी का भोग लगाकर व्रती इसे एकांत में ग्रहण करते हैं। इसके तुरंत बाद से 36 घंटे का कठिन निर्जला व्रत शुरू हो जाता है।
  • तीसरा दिन – संध्या अर्घ्य (Sandhya Arghya): 14 नवंबर 2026 (शनिवार) यह छठ पर्व का सबसे प्रमुख दिन (षष्ठी तिथि) है। इस दिन व्रती नदी, तालाब या कृत्रिम घाट के जल में खड़े होकर अस्ताचलगामी (डूबते हुए) सूर्य को सूप और दउरा से अर्घ्य देते हैं।
    • सूर्यास्त का समय (Sunset Time): शाम लगभग 05:28 बजे (आपके शहर की भौगोलिक स्थिति के अनुसार समय में कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है)।
  • चौथा दिन – उषा अर्घ्य और पारण (Usha Arghya): 15 नवंबर 2026 (रविवार) पर्व के अंतिम दिन (कार्तिक शुक्ल सप्तमी) व्रती सुबह-सुबह घाट पर पहुँचकर उदीयमान (उगते हुए) सूर्य को अर्घ्य देते हैं। अर्घ्य के बाद घाट पर ही अदरक और गुड़ या प्रसाद खाकर व्रत का पारण (समापन) किया जाता है।
    • सूर्योदय का समय (Sunrise Time): सुबह लगभग 06:44 बजे।

छठ पूजा की पौराणिक कथाएं (रामायण और महाभारत)

सनातन धर्म में कोई भी व्रत या त्योहार बिना पौराणिक कथाओं और गहरे इतिहास के पूरा नहीं होता। छठ महापर्व कोई साधारण व्रत नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें हमारे दो सबसे महान और पवित्र महाकाव्यों— रामायण और महाभारत से बहुत गहराई से जुड़ी हुई हैं।

छठ व्रत की शुरुआत कैसे हुई, इसे लेकर ये दो सबसे प्रमुख और प्रामाणिक कथाएं प्रचलित हैं:

१. रामायण काल की कथा (माता सीता का सूर्य व्रत): वाल्मीकि रामायण और आनंद रामायण के प्रसंगों के अनुसार, जब भगवान श्री राम और माता सीता लंका के राजा रावण (जो कि एक ब्राह्मण था) का वध करके अयोध्या लौटे, तो उन्हें ‘ब्रह्महत्या’ के पाप से मुक्त होना था और रामराज्य की स्थापना करनी थी।

तब ऋषि-मुनियों के आदेश पर राम और सीता ने मुंगेर (बिहार) में गंगा तट पर आकर कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन सूर्य देव की कठोर उपासना की थी। माता सीता ने मुदगल ऋषि के आश्रम में रहकर छह दिनों तक सूर्य देव का व्रत रखा था। मान्यता है कि माता सीता द्वारा किए गए उसी पवित्र व्रत को आज हम ‘छठ पूजा’ के रूप में मनाते हैं।

२. महाभारत काल की कथा (सूर्यपुत्र कर्ण की जल-उपासना): महाभारत काल में अंगराज कर्ण (जो साक्षात भगवान सूर्य देव के पुत्र थे) सूर्य के सबसे बड़े और निष्ठावान उपासक माने जाते थे। कर्ण प्रतिदिन सुबह-सुबह नदी के जल में कमर तक पानी में खड़े होकर भगवान सूर्य को अर्घ्य दिया करते थे। अर्घ्य देने के बाद वे गरीबों को दान देते थे।

कर्ण की इसी अटूट जल-उपासना से छठ पर्व में नदी या तालाब के जल में खड़े होकर अर्घ्य देने की महान परंपरा शुरू हुई। सूर्य देव की विशेष कृपा से ही कर्ण अजेय योद्धा और ‘दानवीर’ कहलाए।

३. पांडवों की जीत और द्रौपदी का छठ व्रत: महाभारत में ही एक और महत्वपूर्ण प्रसंग आता है। जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हारकर जंगलों में वनवास का घोर कष्ट भोग रहे थे, तब महर्षि धौम्य ने द्रौपदी को सूर्य देव की आराधना (छठ व्रत) करने की सलाह दी थी। द्रौपदी के इस कठोर व्रत और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान सूर्य ने उन्हें ‘अक्षय पात्र’ (जिसमें कभी भोजन समाप्त नहीं होता) वरदान में दिया था। इसी व्रत के प्रताप से अंततः पांडवों ने महाभारत का युद्ध जीता और अपना खोया हुआ सम्मान व राज्य वापस पाया।

यही कारण है कि आज भी लोग अपना खोया हुआ स्वास्थ्य, सम्मान, संतान-सुख और धन-संपत्ति वापस पाने के लिए पूरी श्रद्धा के साथ छठ का व्रत करते हैं।

छठी मईया और सूर्य देव का संबंध

छठ महापर्व के दौरान अक्सर लोगों (विशेषकर नई पीढ़ी) के मन में यह सवाल उठता है कि जब हम नदी में खड़े होकर अर्घ्य भगवान सूर्य देव को देते हैं, तो फिर गीत और जयकारे ‘छठी मईया’ (Chhathi Maiya) के क्यों गाए जाते हैं? आखिर छठी मईया कौन हैं और सूर्य देव से उनका क्या रिश्ता है?

छठी मईया कौन हैं? (Who is Chhathi Maiya) ब्रह्मवैवर्त पुराण (Brahmavaivarta Purana) के प्रकृति खंड के अनुसार, भगवान ने सृष्टि की रचना के समय मूल प्रकृति को छह भागों में विभाजित किया था। प्रकृति देवी के इसी छठे अंश (Sixth Part) को ‘षष्ठी देवी’ (Shashti Devi) कहा गया है। षष्ठी देवी को ही हमारी क्षेत्रीय और लोक भाषा में बड़े प्यार और श्रद्धा से ‘छठी मईया’ कहा जाता है। पुराणों में षष्ठी देवी को देवसेना भी कहा गया है, जो बच्चों की रक्षा करने वाली, आयु बढ़ाने वाली और निसंतान दंपत्तियों को संतान का सुख प्रदान करने वाली देवी हैं।

सूर्य देव और छठी मईया का रिश्ता: वैदिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, छठी मईया साक्षात भगवान सूर्य देव की मानस बहन (Sister) हैं।

दोनों की एक साथ पूजा क्यों? मान्यता है कि भगवान सूर्य अपनी बहन छठी मईया से अत्यंत प्रेम करते हैं। इसलिए, छठ पर्व के दौरान जब व्रती कठोर उपवास रखकर नदी या तालाब के जल में भगवान सूर्य की उपासना करते हैं और उन्हें अर्घ्य देते हैं, तो सूर्य देव के साथ-साथ उनकी बहन छठी मईया भी अत्यंत प्रसन्न होती हैं।

सरल शब्दों में कहें तो— सूर्य देव (भाई) को अर्घ्य देकर छठी मईया (बहन) को प्रसन्न किया जाता है और उनसे अपने बच्चों की दीर्घायु, स्वास्थ्य और परिवार की सुख-शांति का आशीर्वाद मांगा जाता है। यही कारण है कि इस पर्व में सूर्य और छठी मईया दोनों की महिमा एक समान गाई जाती है।

प्रारंभिक तैयारियां: मिट्टी का चूल्हा और पवित्रता

छठ पूजा दुनिया का शायद सबसे कठिन और ‘शुद्धता’ (Purity) वाला व्रत है। इसकी तैयारियां नहाय-खाय से कई दिन पहले ही शुरू हो जाती हैं। इस महापर्व में साफ-सफाई और सात्विकता का स्तर इतना ऊंचा होता है कि एक छोटी सी चूक भी वर्जित मानी जाती है।

छठ की प्रारंभिक तैयारियों के कुछ सबसे कड़े और महत्वपूर्ण नियम इस प्रकार हैं:

  • मिट्टी का नया चूल्हा: छठ माता का महाप्रसाद (जैसे ठेकुआ और रसियाव) घर के सामान्य गैस स्टोव पर नहीं बनाया जाता। इसके लिए विशेष रूप से गंगा नदी की शुद्ध मिट्टी (या किसी पवित्र स्थान की साफ मिट्टी) से एक नया चूल्हा तैयार किया जाता है।
  • आम की लकड़ी का उपयोग: प्रसाद बनाने के लिए ईधन के रूप में किसी भी आम लकड़ी या कोयले का इस्तेमाल नहीं होता। इसके लिए केवल आम की सूखी लकड़ी (Mango Wood) का ही उपयोग किया जाता है, जिसे हिंदू धर्म की हवन और पूजा-पाठ में अत्यंत पवित्र माना गया है।
  • गेहूं धोना और सुखाना: प्रसाद (ठेकुआ) के लिए बाजार का पिसा हुआ आटा इस्तेमाल नहीं किया जाता। साबुत गेहूं लाकर व्रती और परिवार के सदस्य स्वयं उसे धोते हैं और छत या आंगन में सुखाते हैं। गेहूं सुखाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि कोई भी पक्षी (कौआ, कबूतर आदि) या जानवर इसे जूठा न कर दे। इसके लिए घर का कोई न कोई सदस्य लगातार वहां पहरा देता है।
  • बर्तनों की विशेष शुद्धि: छठ का प्रसाद बनाने और पूजा के लिए घर के दैनिक उपयोग (जहाँ रोजमर्रा का खाना बनता है) वाले बर्तनों का इस्तेमाल नहीं होता। इसके लिए पीतल, तांबे या कांसे (Brass/Copper/Bronze) के विशेष और शुद्ध बर्तनों का ही उपयोग होता है।
  • लहसुन-प्याज से पूर्ण दूरी: छठ की तैयारियों के दौरान पूरे घर में लहसुन, प्याज, मांसाहार या किसी भी तामसिक वस्तु का प्रवेश पूरी तरह से वर्जित होता है। व्रती जिस बिस्तर पर सोते हैं, वह भी बिल्कुल साफ और अलग होता है। सात्विकता ही इस पर्व की असली आत्मा है।

पहला दिन (नहाय-खाय): नियम, सात्विक भोजन और इसका महत्व

छठ महापर्व के चार दिवसीय अनुष्ठान की विधिवत शुरुआत ‘नहाय-खाय’ (Nahay Khay) की परंपरा के साथ होती है। वर्ष 2026 में यह पवित्र दिन 12 नवंबर (गुरुवार) को पड़ रहा है। ‘नहाय’ का अर्थ है स्नान (शुद्धिकरण) और ‘खाय’ का अर्थ है भोजन ग्रहण करना। यह दिन मूल रूप से शरीर और आत्मा को शुद्ध करके खुद को 36 घंटे के कठोर व्रत के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार करने का दिन है।

नहाय-खाय के प्रमुख नियम और विधि:

  • पवित्र स्नान (Holy Bath): नहाय-खाय के दिन व्रती (व्रत रखने वाले महिला या पुरुष) सुबह जल्दी उठकर किसी पवित्र नदी (जैसे गंगा, यमुना या कोसी) में स्नान करते हैं। यदि नदी तक जाना संभव न हो, तो घर पर ही नहाने के पानी में थोड़ा सा ‘गंगाजल’ मिलाकर स्नान किया जाता है। स्नान के बाद व्रती नए और शुद्ध सूती वस्त्र (आमतौर पर महिलाएं सूती साड़ी और पुरुष धोती) धारण करते हैं।
  • घर की साफ-सफाई: इस दिन पूरे घर की बहुत गहराई से सफाई की जाती है। घर के चप्पे-चप्पे को धोया और पोंछा जाता है। इस दिन के बाद से घर में किसी भी प्रकार का तामसिक भोजन (लहसुन, प्याज, मांसाहार) या झूठे बर्तन नहीं रखे जाते।

नहाय-खाय का विशेष सात्विक भोजन (कद्दू-भात):

नहाय-खाय की सबसे बड़ी विशेषता इस दिन बनने वाला विशेष और अत्यंत शुद्ध भोजन है। इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है:

  • भोजन का मेन्यू: इस दिन मुख्य रूप से कद्दू (लौकी) की सब्जी, चने की दाल और अरवा चावल (Raw Rice) बनाया जाता है। बिहार और पूर्वांचल में इसे ‘कद्दू-भात’ कहा जाता है।
  • बनाने की विधि: यह भोजन पूरी तरह से शुद्ध घी और सेंधा नमक (Rock Salt) में पकाया जाता है। इसे बनाते समय हल्दी और साधारण नमक का इस्तेमाल कम या बिल्कुल नहीं किया जाता। इसे उसी विशेष मिट्टी के चूल्हे पर तांबे या पीतल के बर्तनों में बनाया जाता है, जिसकी तैयारी पहले से की गई होती है।
  • भोजन ग्रहण करने का नियम (Eating Order): सबसे पहले भगवान सूर्य का ध्यान करके व्रती स्वयं इस ‘कद्दू-भात’ को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। व्रती के भोजन कर लेने के बाद ही परिवार के बाकी सदस्य इस भोजन को महाप्रसाद के रूप में खाते हैं।

इस कद्दू-भात का वैज्ञानिक महत्व यह है कि यह सुपाच्य (आसानी से पचने वाला) होता है और शरीर को अंदर से ठंडा रखकर अगले दिन के निर्जला व्रत के लिए तैयार करता है।

दूसरा दिन: खरना और 36 घंटे का निर्जला व्रत

छठ महापर्व का दूसरा दिन ‘खरना’ (Kharna) कहलाता है। वर्ष 2026 में यह महत्वपूर्ण दिन 13 नवंबर (शुक्रवार) को मनाया जाएगा। ‘खरना’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है— पूर्ण शुद्धिकरण (Purification)। नहाय-खाय के दिन जहाँ बाहरी शरीर की शुद्धि होती है, वहीं खरना के दिन व्रती (उपवास रखने वाले) अपने मन और अंतःकरण को पूरी तरह शुद्ध करते हैं।

खरना के दिन की विधि और महाप्रसाद:

  • दिन भर का निर्जला उपवास: खरना के दिन व्रती सुबह सूर्योदय से लेकर शाम (सूर्यास्त) तक बिना अन्न और जल ग्रहण किए (निर्जला) उपवास रखते हैं।
  • रसियाव-रोटी का महाप्रसाद: शाम ढलने के बाद, व्रती उसी विशेष मिट्टी के चूल्हे और आम की लकड़ी पर छठी मईया के लिए महाप्रसाद तैयार करते हैं। इस प्रसाद में मुख्य रूप से ‘रसियाव’ (गुड़ की खीर) और शुद्ध गेहूं के आटे की घी लगी रोटियां बनाई जाती हैं। रसियाव बनाने के लिए शुद्ध गुड़ (या गन्ने के ताजे रस), गाय के दूध और नए अरवा चावल का ही उपयोग किया जाता है।
  • प्रसाद ग्रहण करने का कठोर नियम (पूर्ण एकांत): खरना के प्रसाद को खाने का नियम अत्यंत कठोर और अनोखा है। छठी मईया को भोग लगाने के बाद, व्रती एक बिल्कुल एकांत और शांत जगह (या बंद कमरे) में बैठकर यह प्रसाद ग्रहण करते हैं। इस दौरान घर में ‘पिन ड्रॉप साइलेंस’ (पूर्ण शांति) रखी जाती है। मान्यता है कि यदि प्रसाद खाते समय व्रती के कानों में किसी भी प्रकार की तेज आवाज (जैसे किसी के बोलने की, बर्तन गिरने की या कुत्ते के भौंकने की आवाज) पड़ जाए, तो व्रती उसी क्षण प्रसाद खाना छोड़ देते हैं और उठ जाते हैं।
  • प्रसाद वितरण: व्रती के भोजन कर लेने के बाद ही, उस बचे हुए भोजन को ‘महाप्रसाद’ मानकर परिवार के अन्य सदस्यों, पड़ोसियों और रिश्तेदारों में बांटा जाता है। इस प्रसाद को मांगने के लिए लोग दूर-दूर से व्रती के घर आते हैं।

36 घंटे के महाव्रत की शुरुआत:

खरना की शाम को यह ‘रसियाव-रोटी’ का प्रसाद खाने के बाद व्रती पानी की एक बूंद भी ग्रहण नहीं करते हैं। यहीं से उनका 36 घंटे का अत्यंत कठिन और निर्जला महाव्रत शुरू हो जाता है। यह व्रत सीधे तीसरे दिन (संध्या अर्घ्य) से होते हुए, चौथे दिन सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद ही (पारण के समय) खुलता है।

तीसरा दिन: संध्या अर्घ्य की विधि

छठ महापर्व का तीसरा दिन (कार्तिक शुक्ल षष्ठी) सबसे प्रमुख और मुख्य पूजा का दिन होता है। वर्ष 2026 में यह मुख्य दिन 14 नवंबर (शनिवार) को है। इसी दिन शाम के समय डूबते हुए (अस्ताचलगामी) सूर्य को ‘संध्या अर्घ्य’ (Sandhya Arghya) दिया जाता है। दुनिया भर में सनातन धर्म ही एकमात्र ऐसा धर्म है और छठ ही ऐसा पर्व है जहाँ उगते सूर्य के साथ-साथ डूबते हुए सूर्य की भी पूरी श्रद्धा से पूजा होती है।

संध्या अर्घ्य की संपूर्ण विधि और प्रक्रिया:

  • दउरा और सूप सजाना: तीसरे दिन दोपहर के समय घर की महिलाएं बांस से बने बड़े ‘दउरा’ (टोकरी) और पीतल या बांस के ‘सूप’ को सजाना शुरू करती हैं। इसमें मुख्य रूप से महाप्रसाद ‘ठेकुआ’, चावल के लड्डू (कसार) और मौसम के सभी ताजे फल (जैसे- गन्ना, डाभ नींबू, केला, पानी वाला नारियल, सेब, सिंघाड़ा, सुथनी आदि) सलीके से सजाकर रखे जाते हैं। सूप के किनारों पर सिंदूर लगाया जाता है और दीये रखे जाते हैं।
  • घाट की ओर प्रस्थान: शाम होने से कुछ घंटे पहले पूरा परिवार एक साथ मिलकर नदी, तालाब या कृत्रिम घाट की ओर निकलता है। इस दौरान घर का मुखिया, बेटा या व्रती स्वयं नंगे पैर ‘दउरा’ को अपने सिर पर उठाकर घाट तक ले जाते हैं। रास्ते भर महिलाएं पारंपरिक और सुमधुर छठ गीत (जैसे- ‘कांच ही बांस के बहंगिया’) गाती हुई चलती हैं।
  • जल में खड़ा होना (Water Ritual): घाट पर पहुँचने के बाद, व्रती सूर्य ढलने से लगभग एक-डेढ़ घंटे पहले ही नदी या तालाब के ठंडे जल में (कमर या घुटने तक) जाकर खड़े हो जाते हैं। उनका मुख पश्चिम दिशा (जिधर सूर्य डूब रहा हो) की ओर होता है और वे पूरी एकाग्रता के साथ सूर्य देव का ध्यान करते हैं।
  • अर्घ्य देने की विधि: जब सूर्य अस्त होने लगता है (लालिमा छा जाती है), तब व्रती अपने हाथों में प्रसाद और दीयों से सजा ‘सूप’ लेकर सूर्य देव की ओर उठाते हैं। इस दौरान परिवार के अन्य सदस्य उस सूप के आगे लोटे या अर्घ्य-पात्र से कच्चा दूध और जल की धार गिराते हैं। इस जल के भीतर से सूर्य की किरणों को देखना बहुत ही शुभ और लाभकारी माना जाता है।

डूबते सूर्य की पूजा का गहरा संदेश: डूबते सूर्य को अर्घ्य देना हमें एक बहुत बड़ा जीवन दर्शन सिखाता है। समाज का नियम है कि लोग केवल उगते सूरज को सलाम करते हैं, लेकिन छठ पूजा हमें सिखाती है कि जो आज अस्त हो रहा है, उसका भी सम्मान होना चाहिए, क्योंकि कल वही फिर से उदय होगा। यह हमें उन लोगों (जैसे घर के बुजुर्गों) का सम्मान करना सिखाता है जिनका समय ढल रहा है।

‘कोशी भराई’ की अनोखी रस्म और मन्नत

छठ महापर्व में यूँ तो हर एक नियम और रस्म अपने आप में खास है, लेकिन ‘कोशी भराई’ (Koshi Bharai) इस पर्व की सबसे सुंदर, भव्य और विशेष रस्मों में से एक है। यह रस्म मुख्य रूप से संध्या अर्घ्य (तीसरे दिन) की शाम को और उषा अर्घ्य (चौथे दिन) की सुबह निभाई जाती है।

कोशी भराई क्या है और यह क्यों की जाती है?

कोशी भरना हर व्रती के लिए अनिवार्य नहीं होता है। यह रस्म केवल वे ही परिवार या व्रती करते हैं, जिन्होंने छठी मईया से कोई विशेष ‘मन्नत’ (Vow) मांगी होती है और जब वह मन्नत पूरी हो जाती है, तब कृतज्ञता (Thankfulness) प्रकट करने के लिए यह अनुष्ठान किया जाता है। उदाहरण के लिए— घर में संतान (विशेषकर पुत्र) का जन्म होने, परिवार के किसी सदस्य के गंभीर बीमारी से ठीक होने, अच्छी नौकरी लगने, या घर में शादी-विवाह जैसी बड़ी खुशी आने पर मन्नत के अनुसार कोशी भरी जाती है। कई परिवारों में यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाली एक पारंपरिक रस्म भी होती है।

कोशी भरने की विधि और सामग्री:

कोशी भराई का दृश्य बहुत ही अलौकिक और मनमोहक होता है। इसकी विधि इस प्रकार है:

  • गन्ने का मंडप (Sugarcane Canopy): सबसे पहले 5, 7 या 9 साबुत गन्नों (जिनके ऊपर हरे पत्ते लगे हों) को एक साथ खड़ा करके ऊपर से लाल-पीले धागे (कलावा) या कपड़े से बांध दिया जाता है। इससे यह एक तंबू या छोटे ‘मंडप’ का आकार ले लेता है।
  • मिट्टी के बर्तन (कोशिया): इस गन्ने के मंडप के ठीक बीच में एक बड़ा मिट्टी का कलश और उसके चारों ओर मिट्टी के 12 या 24 छोटे-छोटे बर्तन (जिन्हें ‘कोशिया’ कहा जाता है) रखे जाते हैं। कलश के ऊपर एक लाल रंग की चुनरी बांधी जाती है।
  • महाप्रसाद और दीये: इन सभी मिट्टी के बर्तनों (कोशिया) के अंदर छठ का पवित्र महाप्रसाद (ठेकुआ), कसार (चावल के लड्डू), सुथनी, फल और अन्य पूजा सामग्री भरी जाती है। इसके बाद हर बर्तन के ऊपर शुद्ध घी या सरसों के तेल का एक-एक दीया (Diya) जलाकर रखा जाता है।
  • पूजन और लोकगीत: गन्ने के इस मंडप और दीयों के चारों ओर व्रती और परिवार के सदस्य बैठकर छठी मईया की पूजा करते हैं, सिंदूर लगाते हैं और पारंपरिक लोकगीत गाते हैं।

कोशी कहाँ-कहाँ भरी जाती है?

पारंपरिक रूप से कोशी दो जगह भरी जाती है:

  1. घर के आंगन में: संध्या अर्घ्य (तीसरे दिन) के बाद रात के समय व्रती अपने घर के आंगन या छत पर गन्ने का मंडप बनाकर कोशी भरते हैं और रात भर उन दीयों को बुझने नहीं दिया जाता।
  2. घाट पर: अगले दिन सुबह (उषा अर्घ्य के समय) सूर्योदय से पहले उसी कोशी और गन्नों को नदी या तालाब के ‘घाट’ पर ले जाया जाता है। वहां जल के किनारे फिर से मंडप सजाकर कोशी भरी जाती है और उसके बाद ही उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।

यह रस्म इस बात का सबसे बड़ा प्रतीक है कि छठी मईया अपने भक्तों की हर मुराद पूरी करती हैं और भक्त भी पूरी श्रद्धा और पवित्रता के साथ अपना वचन निभाते हैं।

चौथा दिन: उषा अर्घ्य और व्रत का पारण

छठ महापर्व का चौथा और अंतिम दिन (कार्तिक शुक्ल सप्तमी) इस 36 घंटे लंबे, कठिन और पवित्र महाव्रत के समापन का दिन होता है। वर्ष 2026 में यह 15 नवंबर (रविवार) को संपन्न होगा। इसे ‘उषा अर्घ्य’ (Usha Arghya) या आम बोलचाल में ‘भोरवा घाट’ भी कहा जाता है।

उगते सूर्य को अर्घ्य (Usha Arghya):

  • घाट पर वापसी: अंतिम दिन व्रती और उनका पूरा परिवार सूर्योदय से बहुत पहले (भोर के अंधेरे में ही) उठकर वापस उसी नदी या तालाब के घाट पर पहुँचते हैं जहाँ उन्होंने पिछली शाम को अर्घ्य दिया था।
  • जल में प्रतीक्षा: व्रती एक बार फिर से नदी के ठंडे जल में प्रवेश करते हैं, लेकिन इस बार उनका मुख पूर्व दिशा (East) की ओर होता है।
  • अर्घ्य की विधि: हाथों में दउरा और सूप लेकर, व्रती पूरी एकाग्रता के साथ भगवान सूर्य के उदय होने (उदीयमान सूर्य) की प्रतीक्षा करते हैं। जैसे ही आकाश में लालिमा छाती है और सूर्य की पहली किरण फूटती है, व्रती सूर्य देव को गाय का कच्चा दूध और जल अर्पित करके अर्घ्य देते हैं। यह नई ऊर्जा, नई शुरुआत और जीवन में प्रकाश का प्रतीक है।

व्रत का पारण (Breaking the Fast):

  • उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद व्रती घाट पर ही सूर्य देव की सात बार परिक्रमा करते हैं और छठी मईया से अपने परिवार की सुख-शांति की प्रार्थना करते हैं।
  • इसके बाद घाट पर ही व्रत का ‘पारण’ (समापन) किया जाता है। पारण करने के लिए व्रती सबसे पहले कच्चा दूध, अदरक का टुकड़ा, गुड़ या छठी मईया का महाप्रसाद (ठेकुआ) खाकर अपना 36 घंटे का निर्जला उपवास खोलते हैं।

महाप्रसाद का वितरण (Prasad Distribution):

व्रत खोलने के ठीक बाद घाट पर उपस्थित सभी लोगों (चाहे वे किसी भी धर्म या जाति के हों) में प्रसाद बांटा जाता है। मान्यता है कि छठ का प्रसाद कभी स्वयं नहीं खाना चाहिए, बल्कि इसे दूसरों से मांगकर खाने से अधिक पुण्य, सौभाग्य और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। इसके बाद सभी लोग खुशी-खुशी छठी मईया के जयकारे लगाते हुए अपने घर लौट आते हैं।

छठ पूजा की संपूर्ण सामग्री लिस्ट (दउरा, सूप, फल और अन्य अनिवार्य वस्तुएं)

छठ पूजा पूरी तरह से प्रकृति को समर्पित त्योहार है, इसलिए इसमें बाजार की कृत्रिम वस्तुओं (Artificial items) का कोई स्थान नहीं होता। छठी मईया और सूर्य देव की पूजा में इस्तेमाल होने वाली हर एक वस्तु सीधे खेतों, बागों और प्रकृति से आती है। बाजार से पूजा की सामग्री खरीदते समय भी पवित्रता और शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है।

एक आदर्श और संपूर्ण छठ पूजा के लिए निम्नलिखित सामग्रियों की आवश्यकता होती है:

१. मुख्य पूजा के बर्तन (बांस और पीतल):

  • दउरा (Daura): बांस से बनी 1 या 2 बड़ी टोकरियां (जिसमें सारा प्रसाद और फल रखकर घाट तक ले जाया जाता है)।
  • सूप (Soop): बांस या पीतल के 5, 7 या आवश्यकतानुसार सूप (इन्हीं में सजाकर सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है)।
  • जल पात्र: तांबे या पीतल का लोटा (सूर्य देव को जल और दूध का अर्घ्य देने के लिए) और दूध के लिए एक अलग बर्तन।
  • मिट्टी के बर्तन: कई सारे मिट्टी के दीये (Diya), एक मिट्टी का कलश और कोशी भरने के लिए मिट्टी के छोटे बर्तन (कोशिया)।

२. विशेष फल और सब्जियां (प्रकृति का उपहार): छठ पूजा में मौसम के सभी ताजे फलों का इस्तेमाल होता है, लेकिन कुछ फल बिल्कुल अनिवार्य माने जाते हैं:

  • गन्ना (Sugarcane): हरे पत्तों के साथ 5 या 7 साबुत गन्ने।
  • डाभ नींबू (Grapefruit/Pomelo): यह अंदर से लाल या सफेद होता है और आकार में बहुत बड़ा और पीला होता है।
  • सुथनी और शकरकंद (Sweet Potato): मिट्टी के नीचे उगने वाले ये कंदमूल छठ पूजा की पहचान हैं।
  • पानी फल (सिंघाड़ा): ताजे हरे सिंघाड़े।
  • केले का घवद (Bunch of Bananas): केले का पूरा साबुत गुच्छा (जिसमें केले अलग न किए गए हों)।
  • हल्दी और अदरक का पौधा: हरे पत्तों सहित कच्ची हल्दी और अदरक के छोटे पौधे।
  • अन्य फल: सेब, संतरा, नाशपाती, नारियल (पानी वाला), अनानास और मुसम्मी।

३. महाप्रसाद बनाने की सामग्री:

  • नया गेहूं (ठेकुआ बनाने के लिए, जिसे घर पर धोकर सुखाया जाता है)।
  • नया अरवा चावल (कसार के लड्डू और रसियाव के लिए)।
  • शुद्ध देसी घी और गुड़ (Jaggery)।
  • सेंधा नमक (नहाय-खाय के भोजन के लिए)।
  • सूखे मेवे, इलायची और सौंफ (प्रसाद में स्वाद के लिए)।

४. शृंगार और पूजा की अन्य सामग्री:

  • पीला सिंदूर (Yellow Sindoor): छठ में महिलाएं नाक से लेकर मांग तक विशेष पीला (या नारंगी) सिंदूर लगाती हैं।
  • आलता (महावर), कुमकुम, चंदन और रोली।
  • धूपबत्ती, कपूर, रूई की बत्ती और माचिस।
  • पान के पत्ते, सुपारी, लौंग और इलायची।
  • लाल और पीला कलावा (रक्षा सूत्र)।

५. विशेष व्यवस्थाएं:

  • प्रसाद पकाने के लिए मिट्टी का नया चूल्हा और आम की सूखी लकड़ी।
  • व्रतियों के लिए नए और शुद्ध सूती वस्त्र (महिलाओं के लिए बिना सिलाई वाली सूती साड़ी और पुरुषों के लिए धोती)।

नंगे पैर सिर पर ‘दउरा’ ले जाने का नियम और अपार श्रद्धा

छठ पूजा में घर से घाट (नदी या तालाब) तक जाने का दृश्य अपने आप में बहुत अलौकिक और भावुक करने वाला होता है। इस महापर्व में पूजा की सारी सामग्री (सूप, प्रसाद, फल आदि) को बांस की एक बड़ी सी टोकरी में सजाकर रखा जाता है, जिसे ‘दउरा’ (Daura) कहा जाता है।

दउरा को घाट तक ले जाने के कुछ बेहद सख्त और पवित्र नियम हैं, जो इस पर्व की महानता और श्रद्धा को दर्शाते हैं:

  • सिर पर उठाना: दउरा को कभी भी गाड़ी, रिक्शा, कार या किसी अन्य वाहन पर रखकर घाट तक नहीं ले जाया जाता (जब तक कि घाट बहुत ज्यादा दूर न हो)। इसे हमेशा घर के मुखिया, बेटे, भाई या किसी पुरुष सदस्य द्वारा पूरे सम्मान के साथ अपने सिर (Head) पर उठाकर घाट तक ले जाया जाता है। यह भगवान सूर्य और छठी मईया के प्रति पूर्ण समर्पण, दास-भाव और विनम्रता का प्रतीक है।
  • नंगे पैर चलने का नियम (Barefoot Walk): दउरा सिर पर उठाने वाला व्यक्ति पैरों में जूते, चप्पल या कोई भी खड़ाऊं नहीं पहन सकता। घाट का रास्ता चाहे कितना भी लंबा हो, कंकरीला हो या पक्की सड़क हो, दउरा हमेशा नंगे पैर (Barefoot) ही ले जाया जाता है। यह शारीरिक कष्ट सहकर भगवान की आराधना करने और तपस्या करने की एक प्राचीन परंपरा है।
  • पुण्य कमाने की होड़ (Helping Hands): रास्ते में चलते समय अक्सर आस-पड़ोस के लोग, मित्र या अनजान लोग भी श्रद्धा-भाव से कुछ दूर के लिए दउरा अपने सिर पर मांग लेते हैं (इसे ‘कंधा देना’ भी कहते हैं)। मान्यता है कि छठ का दउरा उठाने से बहुत बड़ा ‘पुण्य’ मिलता है और छठी मईया का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।
  • छठ गीतों की गूंज: जब दउरा सिर पर उठाकर घाट की ओर प्रस्थान किया जाता है, तो घर की महिलाएं और व्रती पीछे-पीछे नंगे पैर ही चलते हैं। रास्ते भर पारंपरिक छठ गीत (जैसे— “कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए…”) गाए जाते हैं। इससे पूरे रास्ते का वातावरण अत्यंत भक्तिमय और ऊर्जावान हो जाता है।

महापर्व का महाप्रसाद: शुद्ध घी का ‘ठेकुआ’ बनाने की पारंपरिक विधि

छठ पूजा का नाम लेते ही सबसे पहली जो चीज़ मन में आती है, वह है इसका विश्व प्रसिद्ध महाप्रसाद— ‘ठेकुआ’ (Thekua)। इसे कई जगहों पर ‘खजुरिया’ या ‘टिकरी’ भी कहा जाता है। ठेकुआ केवल एक मिठाई नहीं है, बल्कि यह छठी मईया का सबसे प्रिय भोग और करोड़ों भक्तों की आस्था का प्रतीक है। इसकी सोंधी महक से ही पूरा घर और मोहल्ला महक उठता है।

ठेकुआ बनाने की प्रक्रिया बाजार की मिठाइयों जैसी नहीं होती, बल्कि यह शुद्धता और पवित्रता की एक बहुत ही कठोर और पारंपरिक विधि से होकर गुजरती है:

१. सामग्री की शुद्धि (गेहूं धोना और सुखाना): ठेकुआ बनाने के लिए बाजार का पैकेट वाला आटा इस्तेमाल नहीं होता। सबसे पहले बाजार से नया और साबुत गेहूं खरीदा जाता है। घर के सदस्य (विशेषकर व्रती) इसे स्वयं धोते हैं और छत पर सुखाते हैं। सूखते समय कोई पक्षी (जैसे कौआ) इसे जूठा न कर दे, इसके लिए डंडा लेकर वहां पहरा दिया जाता है। सूखने के बाद इसे चक्की (पारंपरिक रूप से ‘जांता’) में पीसकर आटा तैयार किया जाता है।

२. ठेकुआ की मुख्य सामग्री (Ingredients): इस महाप्रसाद को बनाने के लिए मुख्य रूप से चार चीजों की आवश्यकता होती है:

  • घर का पिसा हुआ शुद्ध गेहूं का आटा (थोड़ा दरदरा)
  • शुद्ध देसी घी (मोयन के लिए और तलने के लिए)
  • उत्तम गुणवत्ता वाला गुड़ (Jaggery)
  • स्वाद के लिए इलायची पाउडर, सौंफ और बारीक कटे हुए सूखे नारियल (गढ़ी) के टुकड़े।

३. आटा गूंथना (Dough Preparation): सबसे पहले पानी में गुड़ को उबालकर उसका एक गाढ़ा सीरप (घोल) तैयार किया जाता है। फिर आटे में शुद्ध घी का मोयन और सौंफ-नारियल डालकर मिलाया जाता है। इसके बाद उसी गुड़ के पानी से आटे को बहुत ही सख्त (Tight) गूंथा जाता है। ध्यान रहे, इसमें साधारण चीनी या सादे पानी का इस्तेमाल नहीं होता।

४. लकड़ी का ‘सांचा’ (Traditional Wooden Molds): आटे की छोटी-छोटी लोइयां बनाकर उन्हें विशेष लकड़ी के सांचों पर दबाया जाता है। इन सांचों पर बहुत ही सुंदर और पारंपरिक आकृतियां बनी होती हैं— जैसे पत्ता (Leaf), फूल, या चक्र। इसी सांचे पर दबाने के कारण इसे ‘ठेकुआ’ (यानी ठोक कर बनाया गया) कहा जाता है।

५. मिट्टी के चूल्हे पर तलना (Frying Process): छठ का ठेकुआ गैस स्टोव पर नहीं बनता। इसे उसी विशेष मिट्टी के चूल्हे पर, आम की सूखी लकड़ी जलाकर, शुद्ध देसी घी में धीमी आंच पर डीप फ्राई (Deep Fry) किया जाता है। धीमी आंच पर पकने के कारण यह अंदर तक खस्ता (Crispy) हो जाता है और इसका रंग गहरा सुनहरा-भूरा हो जाता है।

ठेकुआ की सबसे बड़ी वैज्ञानिक खूबी यह है कि इसमें पानी का अंश बिल्कुल नहीं होता, इसलिए यह महीनों तक खराब नहीं होता। पूजा समाप्त होने के बाद, दूर-दूर रहने वाले रिश्तेदारों और दोस्तों को यह ठेकुआ प्रसाद के रूप में डिब्बों में भरकर भेजा जाता है।

छठ के विशेष फलों का आयुर्वेदिक महत्व

छठ पूजा में छठी मईया को चढ़ाए जाने वाले फल बाजार के महंगे या कृत्रिम फल नहीं होते, बल्कि ये सीधे खेतों और बागों से आते हैं। यह महापर्व कार्तिक मास (नवंबर) में मनाया जाता है, जब मौसम में बदलाव हो रहा होता है और सर्दियां शुरू हो रही होती हैं। इस समय शरीर की इम्यूनिटी (रोग प्रतिरोधक क्षमता) को बढ़ाने के लिए प्रकृति हमें जो फल देती है, वही छठी मईया को अर्पित किए जाते हैं।

आइए जानते हैं छठ के सूप में सजने वाले इन विशेष फलों का गहरा आयुर्वेदिक और स्वास्थ्य महत्व:

  • डाभ नींबू (Grapefruit/Pomelo): यह आकार में बहुत बड़ा, बाहर से पीला-हरा और अंदर से लाल या सफेद होता है। आयुर्वेद के अनुसार, डाभ नींबू ‘विटामिन-C’ का सबसे बड़ा और शुद्ध प्राकृतिक स्रोत है। बदलते मौसम में होने वाली सर्दी, खांसी, जुकाम और कफ रोगों से बचाने में यह रामबाण का काम करता है।
  • गन्ना / ईख (Sugarcane): छठ पूजा गन्ने के बिना पूरी तरह अधूरी मानी जाती है। गन्ने का रस शरीर को तुरंत ऊर्जा (Instant Energy) देता है और पाचन तंत्र (Digestion) को बहुत मजबूत बनाता है। पीलिया (Jaundice) और लिवर से जुड़ी बीमारियों में गन्ने को आयुर्वेद की बेहतरीन औषधि माना गया है।
  • सुथनी (Suthni): मिट्टी के नीचे पैदा होने वाला यह कंदमूल दिखने में शकरकंद (Sweet potato) जैसा होता है और खाने में हल्का मीठा लगता है। आयुर्वेद में इसे पेट के रोगों और गैस की समस्या के लिए बेहद लाभकारी माना गया है। इसकी तासीर गर्म होती है, जो सर्दियों की शुरुआत में शरीर को अंदर से प्राकृतिक गर्माहट देती है।
  • पानी फल / सिंघाड़ा (Water Chestnut): तालाब के कीचड़ में पैदा होने वाला कच्चा सिंघाड़ा पोषक तत्वों का खजाना है। यह शरीर में आयोडीन, पोटेशियम और जिंक की कमी को पूरा करता है। 36 घंटे के लंबे निर्जला व्रत के बाद प्रसाद के रूप में सिंघाड़ा खाने से शरीर में पानी (Hydration) और ऊर्जा का स्तर तुरंत संतुलित हो जाता है।
  • कच्ची हल्दी और अदरक का पौधा: छठ के दउरा में हरे पत्तों वाली कच्ची हल्दी और अदरक के छोटे पौधे भी अनिवार्य रूप से रखे जाते हैं। ये दोनों ही आयुर्वेद के सबसे बड़े ‘एंटी-बैक्टीरियल’ और ‘एंटी-इंफ्लेमेटरी’ (सूजन और दर्द कम करने वाले) तत्व माने गए हैं। सर्दियों के संक्रमण (Infections) से बचाने में इनका कोई तोड़ नहीं है।

छठ के ये फल यह सिद्ध करते हैं कि हमारे पूर्वजों ने इस पर्व को केवल धार्मिक आस्था से नहीं, बल्कि एक बहुत ही शानदार वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक सोच के साथ डिजाइन किया था।

संतान प्राप्ति और सुख-समृद्धि के लिए छठ व्रत का महत्व

छठ पूजा को ‘मन्नतों का पर्व’ (Festival of Vows) भी कहा जाता है। जनमानस में यह गहरी आस्था है कि जो भी व्यक्ति सच्चे मन, असीम श्रद्धा और पूरी पवित्रता के साथ छठी मईया और सूर्य देव की उपासना करता है, उसकी झोली कभी खाली नहीं रहती। मुख्य रूप से यह 36 घंटे का कठिन महाव्रत जीवन की तीन सबसे बड़ी इच्छाओं को पूरा करने के लिए किया जाता है:

  • संतान प्राप्ति और बच्चों की दीर्घायु (For Child & Long Life): पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, छठी मईया (षष्ठी देवी) को ब्रह्मांड में बच्चों की सबसे बड़ी रक्षक और आयु प्रदान करने वाली देवी माना गया है। जिन दंपत्तियों को विवाह के कई वर्षों बाद भी संतान सुख नहीं मिल रहा होता (निसंतान होते हैं), वे सूनी गोद भरने के लिए यह कठिन व्रत रखते हैं। इसके अलावा, माताएं अपने बच्चों की लंबी उम्र, उनके अच्छे स्वास्थ्य और उन्हें जीवन के हर संकट से बचाने के लिए यह उपवास करती हैं। ‘कोशी भराई’ (जिसका जिक्र हमने ऊपर किया है) की रस्म अक्सर संतान प्राप्ति की मन्नत पूरी होने पर ही की जाती है।
  • अखंड सौभाग्य और सुख-समृद्धि (Prosperity & Success): भगवान सूर्य संपूर्ण जगत के पालनहार, प्रत्यक्ष देवता और ऊर्जा के सबसे बड़े स्रोत हैं। सूर्य देव की जल में खड़े होकर आराधना करने से परिवार की दरिद्रता दूर होती है, व्यापार व करियर में अपार सफलता मिलती है और घर में हमेशा सुख, शांति और धन-धान्य का वास होता है।
  • असाध्य और गंभीर रोगों से मुक्ति (Cure from Diseases): वेदों और पुराणों के अनुसार, सूर्य की किरणों में अद्भुत रोगनाशक (Healing) क्षमता होती है। भविष्य पुराण की एक कथा के अनुसार, जब भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र ‘सांब’ को श्राप के कारण कुष्ठ रोग (Leprosy/गंभीर चर्म रोग) हो गया था, तब उन्होंने सूर्य देव की कठोर उपासना की थी, जिससे उनका शरीर फिर से निरोगी और सुंदर हो गया था। आज भी लोग गंभीर बीमारियों, चर्म रोगों और आंखों की समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए छठ का व्रत रखते हैं।

यही कारण है कि इस व्रत में नंगे पैर चलने और 36 घंटे निर्जला रहने का भारी कष्ट सहने के बावजूद, व्रतियों के चेहरे पर थकान के बजाय एक अलग ही आध्यात्मिक तेज और खुशी दिखाई देती है।

छठ पूजा का वैज्ञानिक महत्व और स्वास्थ्य लाभ

अक्सर लोग छठ पूजा को केवल एक धार्मिक और आध्यात्मिक पर्व मानते हैं, लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी कि आधुनिक विज्ञान (Modern Science) ने भी छठ पूजा के नियमों और इसकी प्रक्रिया को स्वास्थ्य के लिए एक चमत्कार माना है। इस व्रत की हर एक रस्म के पीछे बहुत गहरा विज्ञान और ‘नेचुरोपैथी’ (प्राकृतिक चिकित्सा) छिपी हुई है।

छठ पूजा से मिलने वाले प्रमुख वैज्ञानिक और स्वास्थ्य लाभ इस प्रकार हैं:

  • सूर्य की सुरक्षित किरणें और विटामिन-D (Solar Energy): विज्ञान के अनुसार, सूर्योदय (उगते सूरज) और सूर्यास्त (डूबते सूरज) के समय सूर्य की पराबैंगनी किरणें (UV Rays) इंसान के शरीर के लिए सबसे अधिक सुरक्षित और फायदेमंद होती हैं। जब व्रती पानी में खड़े होकर अर्घ्य देते हैं, तो पानी से टकराकर सूर्य की किरणें परावर्तित (Reflect) होकर सीधे उनकी आंखों और शरीर पर पड़ती हैं। इससे शरीर को भरपूर मात्रा में ‘विटामिन-D’ मिलता है, जो हड्डियों को मजबूत बनाता है और इम्यूनिटी बढ़ाता है।
  • 36 घंटे का उपवास और ‘ऑटोफैगी’ (Detoxification): आजकल दुनिया भर के डॉक्टर और वैज्ञानिक ‘इंटरमिटेंट फास्टिंग’ (Intermittent Fasting) और ‘ऑटोफैगी’ (Autophagy) की सलाह देते हैं, जिसमें शरीर भूखा रहकर अपने अंदर की खराब कोशिकाओं (Cells) और गंदगी को खाकर नष्ट कर देता है। छठ का 36 घंटे का निर्जला व्रत शरीर की पूरी तरह से ‘डीप-क्लीनिंग’ (Detox) कर देता है। इससे पाचन तंत्र (Digestive system) को आराम मिलता है और पेट से जुड़ी बीमारियां खत्म हो जाती हैं।
  • जल चिकित्सा (Hydrotherapy): नदी या तालाब के ठंडे पानी में कमर तक खड़े रहने की प्रक्रिया को विज्ञान में ‘हाइड्रोथेरेपी’ कहा जाता है। जब ऊपर से सूर्य की हल्की गर्मी और नीचे से पानी की ठंडक शरीर को एक साथ मिलती है, तो यह शरीर के तापमान (Body Temperature) को संतुलित करता है। इससे नर्वस सिस्टम (तंत्रिका तंत्र) शांत होता है और मानसिक तनाव (Stress/Anxiety) दूर होता है।
  • सोलर प्राणायाम और मानसिक एकाग्रता (Mental Focus): पानी में खड़े होकर सूर्य पर ध्यान केंद्रित करना एक प्रकार का ‘सोलर प्राणायाम’ या ‘त्राटक ध्यान’ (Trataka Meditation) है। इससे आंखों की रोशनी तेज होती है, पीनियल ग्रंथि (Pineal Gland) सक्रिय होती है और मन में अद्भुत शांति और एकाग्रता आती है।

यही कारण है कि छठ पूजा केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि शरीर, मन और आत्मा को पूरी तरह से ‘रीचार्ज’ (Recharge) करने का एक वैज्ञानिक तरीका है।

भगवान सूर्य को अर्घ्य देने के ज्योतिषीय लाभ और नवग्रह शांति

सनातन धर्म में भगवान सूर्य को साक्षात देवता माना गया है, लेकिन वैदिक ज्योतिष (Vedic Astrology) में इनका महत्व और भी अधिक गहरा है। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य देव को नवग्रहों का राजा, हमारी आत्मा का कारक (आत्मकारक ग्रह) और मान-सम्मान का प्रतीक माना गया है। ऐसे में छठ पूजा केवल एक लोकपर्व नहीं, बल्कि ज्योतिषीय दृष्टि से जीवन की सभी बाधाओं को दूर करने का एक अचूक ‘महा-उपाय’ है।

छठ पर्व के दौरान सूर्य देव को अर्घ्य देने से कुंडली (Kundli) पर पड़ने वाले अद्भुत ज्योतिषीय लाभ इस प्रकार हैं:

  • दशम भाव (10th House) की मजबूती और करियर में सफलता: ज्योतिष में सूर्य देव को विशेष रूप से दशम भाव (कर्म, राज्य, सरकारी नौकरी और पिता का भाव) का नैसर्गिक कारक माना जाता है। डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देने से कुंडली का दशम भाव अत्यंत बलवान होता है। इससे कार्यक्षेत्र (करियर) में आ रही रुकावटें दूर होती हैं, पद-प्रतिष्ठा बढ़ती है और मान-सम्मान में जबरदस्त वृद्धि होती है।
  • नवग्रह शांति (Calming of Navagrahas): चूँकि सूर्य पूरे सौरमंडल और सभी ग्रहों के राजा हैं, इसलिए जब अर्घ्य देकर राजा (सूर्य) को प्रसन्न कर लिया जाता है, तो कुंडली के बाकी ग्रह (चंद्रमा, मंगल, राहु, केतु, शनि आदि) स्वतः ही शांत हो जाते हैं। उनकी नकारात्मक ऊर्जा समाप्त हो जाती है।
  • लग्न भाव और आत्मविश्वास (1st House & Confidence): लग्न भाव (1st House) व्यक्ति के शरीर, व्यक्तित्व और ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है। छठ के दौरान सूर्य देव की उपासना से लग्न भाव मजबूत होता है (ठीक वैसे ही जैसे लग्न में मंगल असीम पराक्रम देता है)। इससे व्यक्ति के अंदर अद्भुत आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता (Leadership) और आरोग्य (अच्छे स्वास्थ्य) का संचार होता है।
  • सूर्य दोष और पितृ दोष से मुक्ति: यदि किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में सूर्य नीच राशि (तुला) में हो, राहु-केतु के साथ ‘ग्रहण दोष’ बना रहा हो, या कुंडली में ‘पितृ दोष’ हो, तो छठ पूजा का अर्घ्य उसके लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है। यह उपाय पिता के साथ संबंधों को सुधारता है और पैतृक संपत्ति के विवादों को सुलझाता है।
  • नवम भाव (9th House) का जागरण: नियमित अर्घ्य और विशेषकर छठ के अर्घ्य से धर्म और भाग्य का भाव (नवम भाव) भी जागृत होता है। इससे व्यक्ति का सोया हुआ भाग्य चमक उठता है और उसे अपने हर प्रयास में ईश्वरीय कृपा मिलने लगती है।

यही कारण है कि छठ महापर्व पर भगवान सूर्य की उपासना एक ऐसा शक्तिशाली ज्योतिषीय अनुष्ठान है, जो व्यक्ति के पूरे जीवन का भाग्य और दशा बदल सकता है।

फ्लैट्स और बड़े शहरों में कैसे करें छठ पूजा? (कृत्रिम घाट या टब में पूजा की विधि)

आजकल रोजगार और पढ़ाई के सिलसिले में बड़ी संख्या में लोग अपने गांव और पारंपरिक नदियों (जैसे गंगा, कोसी) से दूर बड़े शहरों और महानगरों (जैसे दिल्ली, मुंबई, पुणे, बेंगलुरु) के फ्लैट्स में रहने लगे हैं। ऐसे में अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या बिना नदी या प्राकृतिक घाट के अपार्टमेंट में छठ पूजा की जा सकती है?

इसका उत्तर है— बिल्कुल! छठी मईया केवल आपकी सच्ची श्रद्धा और पवित्रता देखती हैं। बड़े शहरों और हाई-राइज बिल्डिंग्स में छठ पूजा करने के लिए आजकल लोग इन शानदार और सुविधाजनक तरीकों को अपना रहे हैं:

  • सोसाइटी में कृत्रिम घाट (Artificial Ponds in Societies): आजकल शहरों की कई हाउसिंग सोसाइटीज छठ के लिए आपस में चंदा इकट्ठा करके सोसाइटी के पार्क में एक अस्थायी कृत्रिम तालाब (Artificial Ghat) तैयार करवाती हैं। इसे ईंटों और तिरपाल से बनाकर साफ पानी और गंगाजल से भरा जाता है। यहाँ पूरी सोसाइटी के लोग एक साथ मिलकर अर्घ्य देते हैं, जिससे बिल्कुल गांव के घाट जैसा ही भक्तिमय माहौल बन जाता है।
  • छत या बालकनी में टब का उपयोग (Rooftop & Balcony Setup): यदि सोसाइटी में जगह नहीं है या आप बिल्कुल एकांत चाहते हैं, तो आप अपने फ्लैट की खुली बालकनी या छत पर एक बड़ा सा साफ टब, प्लास्टिक का ड्रम या बच्चों वाला ‘इन्फ्लेटेबल पूल’ (हवा भरकर फूलने वाला टब) रख सकते हैं। इसमें शुद्ध पानी और थोड़ा सा गंगाजल मिला लें। अर्घ्य के समय व्रती आसानी से इसमें खड़े हो सकते हैं।
  • प्रसाद के लिए नए गैस स्टोव का विकल्प: शहर के फ्लैट्स में मिट्टी का चूल्हा बनाना और आम की लकड़ी जलाना संभव नहीं हो पाता (धुएं के कारण)। इसका सबसे अच्छा उपाय यह है कि आप छठ के प्रसाद (ठेकुआ, रसियाव) के लिए एक बिल्कुल नया गैस स्टोव (New Gas Stove या सिंगल बर्नर) खरीद लें। इस पर कभी भी सामान्य खाना (विशेषकर लहसुन-प्याज) नहीं बनना चाहिए।
  • पवित्र जल का सदुपयोग (Eco-friendly Arghya): बालकनी या छत के टब में अर्घ्य देने का एक बड़ा फायदा यह है कि पूजा समाप्त होने के बाद उस पवित्र जल को नालियों में बहने से बचाया जा सकता है। आप उस जल को सोसाइटी के पार्कों, पेड़ों या गमलों में डाल सकते हैं।

शहरों की यह बदलती हुई तस्वीर इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि लोग चाहे अपनी जन्मभूमि से कितने भी दूर चले जाएं, लेकिन वे अपनी जड़ों और अपनी लोक आस्था (छठी मईया) को कभी नहीं छोड़ते।

प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण का महापर्व (Eco-Friendly Festival)

आज जब पूरी दुनिया ‘ग्लोबल वार्मिंग’ (Global Warming) और पर्यावरण प्रदूषण जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रही है, तब ‘छठ पूजा’ दुनिया के सामने पर्यावरण संरक्षण (Environment Conservation) का सबसे बड़ा और आदर्श उदाहरण बनकर सामने आती है। यह सनातन धर्म का एकमात्र ऐसा पर्व है जहाँ किसी मूर्ति की नहीं, बल्कि सीधे तौर पर प्रकृति (Nature) के साक्षात स्वरूपों— सूर्य, जल और वायु की पूजा होती है।

छठ महापर्व को दुनिया का सबसे बड़ा ‘इको-फ्रेंडली’ (Eco-Friendly) त्योहार क्यों कहा जाता है, इसके मुख्य कारण इस प्रकार हैं:

  • नदियों और तालाबों की सामूहिक सफाई: छठ पूजा से हफ्तों पहले ही समाज के सभी लोग (बिना किसी सरकारी दबाव के) अपने गांव और शहर की नदियों, तालाबों, पोखरों और घाटों की साफ-सफाई में जुट जाते हैं। घाटों से सारा कचरा हटाया जाता है और रास्तों को झाड़ू लगाकर साफ किया जाता है। यह अपने आप में एक बहुत बड़ा, स्वैच्छिक और प्राकृतिक ‘स्वच्छता अभियान’ (Cleanliness Drive) है।
  • ‘जीरो प्लास्टिक’ (Zero Plastic) का उपयोग: छठ की पूरी पूजा प्रक्रिया में प्लास्टिक, थर्माकोल या किसी भी कृत्रिम (Artificial) सामग्री का प्रवेश पूरी तरह से वर्जित है। पूजा के सभी बर्तन (जैसे सूप और दउरा) प्राकृतिक बांस से बने होते हैं, दीये और कलश शुद्ध मिट्टी के होते हैं, और प्रसाद रखने के लिए केले के पत्तों का उपयोग होता है। यह सब कुछ 100% बायोडिग्रेडेबल (Biodegradable) है, जो उपयोग के बाद आसानी से मिट्टी में मिल जाता है।
  • जल प्रदूषण से पूर्ण मुक्ति: अन्य कई त्योहारों की तरह छठ पूजा में मूर्तियों का विसर्जन नहीं होता, इसलिए पानी में प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) या जहरीले रासायनिक रंग (Chemical Colors) नहीं घुलते। अर्घ्य के दौरान जो प्राकृतिक फल, दूध और अनाज नदी में गिरते हैं, वे जल जीवों (जैसे मछलियों) के लिए भोजन का काम करते हैं, पानी को प्रदूषित नहीं करते।
  • वृक्षों और वनस्पतियों का सम्मान: इस पूजा में जड़ों वाले गन्ने, हल्दी के पौधे, केले के पत्ते, सुथनी और अदरक के पौधों को विशेष महत्व दिया जाता है। यह इस बात का प्रतीक है कि वनस्पति (Flora) ही हमारे जीवन का आधार है और हमें हर हाल में पेड़-पौधों और अपनी कृषि का संरक्षण करना चाहिए।

सरल शब्दों में कहें तो, छठ पूजा हमें यह सिखाती है कि प्रकृति ही साक्षात ईश्वर है और इस प्रकृति को शुद्ध रखना ही मानव जीवन की सबसे बड़ी पूजा है।

छठ व्रत के कड़े नियम और पवित्रता

सनातन धर्म में ‘छठ पूजा’ को सबसे कठिन और कठोर नियमों वाला व्रत माना जाता है। इस महापर्व में केवल शरीर का उपवास नहीं होता, बल्कि मन, वचन और कर्म की पूर्ण शुद्धि (Purity) अनिवार्य होती है। मान्यता है कि छठी मईया बहुत दयालु हैं, लेकिन पूजा के नियमों में हुई किसी भी चूक या अशुद्धता को वे जल्दी क्षमा नहीं करतीं।

छठ व्रत के दौरान पालन किए जाने वाले सबसे कड़े और विशेष नियम इस प्रकार हैं:

  • बिना सिलाई वाले वस्त्र (Unstitched Clothes): छठ के दौरान व्रती (उपवास रखने वाले) कोई भी सिला हुआ कपड़ा (Tailored clothes) नहीं पहनते हैं। महिलाएं मुख्य रूप से सूती की साफ साड़ी और पुरुष सूती धोती धारण करते हैं। इन वस्त्रों पर हल्दी का दाग लगाना शुभ माना जाता है।
  • बिस्तर का त्याग (Sleeping on the Floor): नहाय-खाय के दिन से लेकर व्रत के पारण (समापन) तक व्रती पलंग या गद्देदार बिस्तर पर नहीं सोते हैं। वे जमीन पर साफ चादर, चटाई या ‘कुश’ (पवित्र घास) के आसन पर ही सोते हैं। इस दौरान वे ओढ़ने के लिए भी बिल्कुल साफ और अलग कंबल का इस्तेमाल करते हैं।
  • पूर्ण सात्विकता और ब्रह्मचर्य: छठ के पूरे चार दिनों तक घर में पूर्ण सात्विकता बनाए रखी जाती है। लहसुन, प्याज, मांसाहार और मदिरा का सेवन पूरी तरह से वर्जित होता है। इसके साथ ही व्रती और उनके परिवार के सदस्य पूर्ण ब्रह्मचर्य (Celibacy) का पालन करते हैं।
  • बर्तनों की कठोर शुद्धि: छठ का महाप्रसाद बनाने के लिए घर के उन बर्तनों का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं होता जिनमें रोजमर्रा का खाना बनता है। प्रसाद केवल मिट्टी, पीतल, तांबे या कांसे के विशेष और शुद्ध बर्तनों में ही पकाया जाता है।
  • अखंड निर्जला उपवास (36 Hours Dry Fasting): दूसरे दिन (खरना) की शाम को प्रसाद ग्रहण करने के बाद व्रती पानी की एक बूंद भी नहीं पी सकते। उनका यह कठिन निर्जला व्रत सीधे चौथे दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद ही खुलता है।
  • वाणी और विचारों की पवित्रता: छठ में केवल बाहरी साफ-सफाई ही काफी नहीं है, बल्कि विचारों की शुद्धि भी बहुत जरूरी है। व्रत के दौरान व्रती को क्रोध करने, किसी को अपशब्द कहने (गाली देने) या किसी की निंदा (चुगली) करने की सख्त मनाही होती है।
  • जूते-चप्पल का त्याग: व्रत के दौरान व्रती पूरी तरह से नंगे पैर (Barefoot) रहते हैं। यहां तक कि दउरा लेकर घाट तक जाने वाला व्यक्ति भी मीलों का सफर बिना जूते-चप्पल के ही तय करता है।

ये नियम इस बात का प्रतीक हैं कि जब इंसान अहंकार और विलासिता को छोड़कर पूरी तरह से प्रकृति के प्रति समर्पित हो जाता है, तभी उसे ईश्वर की सच्ची कृपा प्राप्त होती है।

छठ पूजा के प्रसिद्ध और पारंपरिक लोकगीत (आस्था की गूंज)

छठ महापर्व जितना अपने कड़े नियमों और शुद्धता के लिए जाना जाता है, उतना ही यह अपने सुमधुर और आत्मा को छू लेने वाले पारंपरिक लोकगीतों (Traditional Folk Songs) के लिए भी प्रसिद्ध है। बिना छठ गीतों के यह पर्व बिल्कुल अधूरा माना जाता है। 36 घंटे के कठिन निर्जला उपवास के दौरान, ये गीत ही व्रतियों के भीतर असीम ऊर्जा, धैर्य और आध्यात्मिक शक्ति का संचार करते हैं।

छठ के कुछ सबसे प्रसिद्ध पारंपरिक गीत और उनके गहरे अर्थ इस प्रकार हैं:

  • ‘कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए…’: यह छठ पूजा का सबसे ऐतिहासिक और लोकप्रिय गीत है। इस गीत में बहुत ही खूबसूरती से बताया गया है कि कैसे बिल्कुल हरे और कच्चे (शुद्ध) बांस से बनी बहंगी (दउरा) में छठी मईया का पवित्र प्रसाद सजाकर नंगे पैर घाट तक ले जाया जाता है। रास्ते में जाते समय वह बहंगी वजन से कैसे लचकती है, इसका मार्मिक वर्णन इस गीत में है।
  • ‘केलवा जे फरेला घवद से, ओह पर सुगा मेड़राय…’: (मारबो रे सुगवा धनुष से, सुगा गिरे मुरुझाय…) यह गीत बहुत ही गहरा अर्थ रखता है। इसमें एक तोते (सुग्गा) को चेतावनी दी जा रही है कि वह छठी मईया के प्रसाद (केले के गुच्छे) के पास न मंडराए और उसे जूठा न करे, नहीं तो उसे धनुष-बाण से मार दिया जाएगा। यह गीत छठ के प्रसाद की कठोर सात्विकता और पवित्रता को बचाने की जिद का प्रतीक है।
  • ‘उग हो सुरुज देव, भेल भिनसार…’: यह गीत पर्व के चौथे और अंतिम दिन, भोर के अंधेरे में ठंडे पानी में खड़े होकर गाया जाता है। इसमें व्रती बड़ी ही करुणा के साथ भगवान सूर्य से जल्दी उदय होने (निकलने) की प्रार्थना करते हैं, ताकि वे अपना अर्घ्य देकर अपने इस कठिन व्रत का पारण (समापन) कर सकें।
  • ‘रुनकी झुनकी बेटी मांगीला, पढ़ल पंडितवा दामाद…’: छठ लोकगीतों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये आम जनजीवन से जुड़े हैं। इस पारंपरिक गीत में एक भक्त छठी मईया से अपने परिवार के लिए धन-दौलत नहीं, बल्कि एक संस्कारी बेटी और एक ज्ञानी (पढ़ा-लिखा) दामाद मांग रहा है। यह हमारी प्राचीन सामाजिक सोच और पारिवारिक मूल्यों को बहुत ही मिठास के साथ दर्शाता है।

जब भी छठ लोकगीतों की बात आती है, तो ‘बिहार कोकिला’ शारदा सिन्हा (Sharda Sinha) जी का नाम सबसे ऊपर आता है। उनकी खनकती और जादुई आवाज के बिना आज भी हर घाट और हर घर बिल्कुल सूना लगता है।

छठ पूजा का सामाजिक संदेश: समानता और जाति-भेद का अंत

सनातन धर्म में शायद ही कोई दूसरा ऐसा पर्व हो, जो समाज को समानता (Equality) और भाईचारे का इतना बड़ा और गहरा संदेश देता हो जितना कि छठ महापर्व। छठ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह एक ‘सामाजिक क्रांति’ (Social Revolution) है जो समाज से जाति, ऊंच-नीच और अमीरी-गरीबी के हर भेद को जड़ से मिटा देती है।

यह महापर्व हमें सिखाता है कि ईश्वर के सामने सभी इंसान एक बराबर हैं। इसके सबसे बड़े सामाजिक संदेश इस प्रकार हैं:

  • न कोई वीआईपी, न कोई साधारण (No VIP Culture): छठ के घाट पर कोई ‘वीआईपी’ नहीं होता। चाहे वह राज्य का मुख्यमंत्री हो, कोई करोड़पति उद्योगपति हो, या फिर सड़क किनारे ठेला लगाने वाला एक साधारण मजदूर— सभी एक ही घाट पर, एक ही नदी के पानी में एक साथ खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं। सूरज की किरणें और छठी मईया का आशीर्वाद सब पर एक समान पड़ता है। यहाँ धन या पद का कोई अहंकार नहीं टिकता।
  • जाति-पाति और छुआछूत का पूर्ण अंत (Eradication of Casteism): छठ पूजा में जाति-पाति की दीवारें पूरी तरह ढह जाती हैं। पूजा में इस्तेमाल होने वाला ‘दउरा’ और ‘सूप’ मुख्य रूप से ‘डोम’ (महादलित) समाज के लोगों द्वारा अपने हाथों से बुना जाता है। मिट्टी का कलश और दीये ‘कुम्हार’ समाज बनाता है। सवर्ण हो या दलित, सभी वर्गों के लोग इन वस्तुओं को बिना किसी हिचकिचाहट के सबसे पवित्र मानकर अपने सिर पर उठाते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि समाज के हर वर्ग के योगदान के बिना यह महापर्व पूरा हो ही नहीं सकता।
  • अहंकार का नाश और प्रसाद मांगना (Breaking the Ego): छठ में एक बहुत ही अद्भुत परंपरा है— प्रसाद मांगकर खाना। बड़े-बड़े अधिकारी, अफसर और अमीर परिवार के लोग भी घाट पर जाकर दूसरों के आगे (चाहे वे किसी भी जाति या वर्ग के हों) हाथ फैलाकर प्रसाद मांगते हैं। यह इंसान के भीतर पल रहे झूठे ‘अहंकार’ (Ego) को तोड़ता है और विनम्रता (Humility) सिखाता है।
  • सामूहिक सहयोग और सांप्रदायिक सौहार्द (Community Bonding): घाटों की सफाई से लेकर रास्तों को सजाने और व्रतियों की सेवा करने तक, पूरा समाज बिना किसी सरकारी आदेश के एकजुट हो जाता है। देश के कई हिस्सों में मुस्लिम समाज के लोग भी छठ के लिए विशेष रूप से मिट्टी के शुद्ध चूल्हे बनाते हैं और रास्तों की सफाई करते नजर आते हैं। यह भारत के सांप्रदायिक सौहार्द और आपसी प्रेम का सबसे बेहतरीन उदाहरण है।

छठ हमें यह याद दिलाता है कि अगर हम अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और प्रकृति से जुड़े रहें, तो समाज में कोई भेदभाव पैदा ही नहीं हो सकता।

क्या महिलाएं और पुरुष दोनों कर सकते हैं छठ का व्रत?

अक्सर उन लोगों के मन में (जो छठ के बारे में कम जानते हैं) यह एक आम गलतफहमी होती है कि छठ पूजा केवल महिलाओं (माताओं और बहनों) का त्योहार है और सिर्फ वही इस कठिन व्रत को रख सकती हैं। लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग और बहुत ही खूबसूरत है।

छठ महापर्व पूरी तरह से ‘जेंडर-न्यूट्रल’ (Gender-Neutral) यानी लैंगिक समानता वाला त्योहार है। इस व्रत को लेकर कुछ बेहद महत्वपूर्ण तथ्य इस प्रकार हैं:

  • पुरुषों की समान भागीदारी (Equal Participation): छठी मईया और भगवान सूर्य की आराधना में पुरुष भी महिलाओं के कंधे से कंधा मिलाकर चलते हैं। समाज में बड़ी संख्या में पुरुष भी पूरे नियम-निष्ठा के साथ यह 36 घंटे का कठिन और निर्जला व्रत रखते हैं। वे भी महिलाओं की तरह ही पानी में खड़े होकर सूर्य देव को सूप से अर्घ्य देते हैं।
  • दंडवत प्रणाम (कठोर तपस्या): आपने अक्सर टीवी या सोशल मीडिया पर देखा होगा कि कई व्रती अपने घर से लेकर घाट तक सड़क पर लेट-लेटकर (दंडवत परिक्रमा करते हुए) जाते हैं। यह अत्यंत कठिन और शारीरिक कष्ट वाली तपस्या मुख्य रूप से पुरुषों द्वारा ही की जाती है, जिन्होंने छठी मईया से कोई विशेष मन्नत (जैसे संतान प्राप्ति या रोग मुक्ति) मांगी होती है।
  • नियमों में कोई छूट नहीं: व्रत रखने वाले पुरुषों के लिए भी नियम उतने ही सख्त होते हैं जितने महिलाओं के लिए। उन्हें भी नहाय-खाय से लेकर पारण तक जमीन पर सोना होता है, बिना सिलाई वाले सूती वस्त्र (धोती और गमछा) पहनने होते हैं और पूर्ण सात्विकता का पालन करना होता है।
  • परिवार का सामूहिक समर्पण: अगर घर में कोई महिला (जैसे मां या पत्नी) व्रत रखती है, तो घर के पुरुष उस व्रत को सफल बनाने में अपना पूरा जोर लगा देते हैं। बाजार से बिल्कुल शुद्ध सामग्री लाना, गेहूं सुखाने में पहरा देना, सिर पर भारी ‘दउरा’ उठाकर नंगे पैर मीलों दूर घाट तक जाना और रात भर घाट की रखवाली करना— यह सब पुरुषों की असीम श्रद्धा का ही हिस्सा है।

निष्कर्ष यह है कि भगवान सूर्य और छठी मईया का आशीर्वाद बेटे और बेटी दोनों के लिए एक समान है। इसलिए, पूर्ण श्रद्धा और पवित्रता के साथ कोई भी पुरुष, महिला या यहाँ तक कि कुंवारी कन्याएं भी यह महाव्रत रख सकती हैं।

छठ पूजा के बाद घर वापसी और प्रसाद वितरण का महत्व

छठ महापर्व के चौथे दिन (उषा अर्घ्य) जब सूर्य देव को अर्घ्य देने के बाद घाट पर पूजा संपन्न हो जाती है, तो वहां का दृश्य बहुत ही भावुक, पवित्र और आनंदमयी होता है। 36 घंटे के कठोर निर्जला व्रत के पारण (समापन) के बाद, व्रती और पूरा परिवार खुशी-खुशी छठी मईया के जयकारे लगाते हुए घर वापस लौटते हैं।

इस पर्व में घर वापसी और विशेष रूप से ‘प्रसाद वितरण’ का बहुत गहरा और आध्यात्मिक महत्व है:

  • आशीर्वाद लेने की परंपरा (Blessings from Vrati): घाट से पूजा संपन्न करके घर लौटने के बाद, परिवार के सभी छोटे-बड़े सदस्य व्रती (उपवास रखने वाली माता या पिता) के पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं। गहरी मान्यता है कि 36 घंटे की तपस्या के बाद व्रती के भीतर साक्षात छठी मईया और सूर्य देव की सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है, इसलिए पारण के तुरंत बाद उनका दिया हुआ आशीर्वाद (सुख, शांति और संतान का) कभी खाली नहीं जाता।
  • प्रसाद ‘मांगकर’ खाने का अद्भुत नियम: सनातन धर्म में संभवतः छठ ही एकमात्र ऐसा पर्व है जहाँ यह नियम है कि महाप्रसाद को कभी स्वयं चुपचाप नहीं खाना चाहिए, बल्कि इसे दूसरों से हाथ फैलाकर ‘मांगकर’ खाना चाहिए। चाहे कोई कितना भी बड़ा अधिकारी या धनवान क्यों न हो, जब वह प्रसाद मांगता है, तो उसके भीतर का ‘अहंकार’ (Ego) पूरी तरह से टूट जाता है। प्रसाद मांगने से छठी मईया अत्यंत प्रसन्न होती हैं।
  • महाप्रसाद का व्यापक वितरण (Mass Distribution): व्रत खोलने के बाद व्रती अपने हाथों से आस-पड़ोस के लोगों, रिश्तेदारों, मित्रों और हर दर्शनार्थी में ठेकुआ, कसार (चावल के लड्डू) और फल बांटते हैं। ठेकुआ प्रसाद की खूबी यह है कि यह महीनों तक खराब नहीं होता, इसलिए पूजा के बाद इसे डिब्बों में पैक करके दूर शहरों या विदेशों में रहने वाले रिश्तेदारों और बच्चों को विशेष रूप से भेजा जाता है।
  • पवित्र जल का घर में छिड़काव: घाट से लौटते समय पूजा के कलश में जो पवित्र जल (नदी का जल और गंगाजल) बच जाता है, उसे व्रती पूरे घर, आंगन और अपने व्यापारिक स्थल (दुकान/ऑफिस) में छिड़कते हैं। माना जाता है कि इस जल से घर की सारी नकारात्मक ऊर्जा (Negative Energy), बीमारियां और दरिद्रता हमेशा के लिए दूर हो जाती हैं।

इस तरह, चार दिनों का यह कठिन महापर्व केवल एक परिवार में ही नहीं, बल्कि पूरे समाज में एक नई ऊर्जा, मिठास और शांति का संचार करके खुशी-खुशी संपन्न होता है।

निष्कर्ष: छठ पूजा 2026 का शुभ संदेश और अंतिम विचार

छठ महापर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह हमारी गौरवशाली सनातन संस्कृति, प्रकृति प्रेम और अटूट आस्था का सबसे जीवंत प्रतीक है। यह दुनिया का एकमात्र ऐसा पर्व है जो हमें सिखाता है कि जो आज अस्त हो रहा है, उसका भी सम्मान होना चाहिए, क्योंकि कल वही नए प्रकाश और ऊर्जा के साथ फिर से उदय होगा। यह पर्व समाज से ऊंच-नीच के हर भेद को मिटाकर मानवता और समानता का वास्तविक पाठ पढ़ाता है।

वर्ष 2026 में 12 नवंबर (नहाय-खाय) से लेकर 15 नवंबर (उषा अर्घ्य) तक मनाया जाने वाला यह चार दिवसीय महाव्रत हम सभी के जीवन के लिए बेहद खास है। आज के इस आधुनिक दौर में, चाहे आप अपने गांव के पारंपरिक घाट पर हों या मीलों दूर किसी महानगर के फ्लैट की बालकनी में, छठी मईया केवल आपके हृदय की पवित्रता, समर्पण और सच्ची श्रद्धा देखती हैं।

आइए, इस वर्ष हम सब मिलकर प्रकृति को समर्पित इस सबसे बड़े ‘इको-फ्रेंडली’ पर्व को इसकी पूरी शुद्धता, कड़े नियमों और सामाजिक सद्भाव के साथ मनाएं। भगवान भास्कर (सूर्य देव) और छठी मईया से यही प्रार्थना है कि वे आपके और आपके पूरे परिवार के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य (आरोग्य) और अखंड सौभाग्य का सदा वास बनाए रखें।

जय छठी मईया!

अस्वीकरण (Disclaimer):

इस लेख में छठ पूजा 2026 से संबंधित तिथियाँ, सूर्यास्त एवं सूर्योदय का समय, पूजा विधि और धार्मिक मान्यताओं की जानकारी उपलब्ध पंचांगों तथा प्रचलित हिंदू परंपराओं के आधार पर प्रस्तुत की गई है। अलग-अलग शहरों और पंचांगों में गणना के कारण तिथि एवं अर्घ्य के समय में अंतर हो सकता है। इसलिए पूजा करने से पहले अपने स्थानीय पंचांग या योग्य पंडित से समय की पुष्टि अवश्य करें। छठी मैया, भगवान सूर्यदेव और छठ पूजा से जुड़ी कथाएँ धार्मिक मान्यताओं एवं लोकपरंपराओं पर आधारित हैं। इस लेख का उद्देश्य धार्मिक जानकारी और परंपराओं से परिचित कराना है। पाठकों से अनुरोध है कि वे अपने परिवार और क्षेत्र की परंपराओं के अनुसार पूजा करें।

36 घंटे के निर्जला उपवास जैसे कठिन व्रत या किसी भी विशेष स्वास्थ्य/आयुर्वेदिक लाभ को अपनाने से पहले (विशेषकर यदि आपको कोई स्वास्थ्य समस्या है), तो कृपया अपने चिकित्सक (Doctor) से सलाह अवश्य लें। इसी तरह, सटीक ज्योतिषीय उपायों के लिए किसी योग्य ज्योतिषाचार्य से परामर्श करें। किसी भी जानकारी के उपयोग से होने वाले प्रभाव के लिए लेखक या वेबसाइट की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी।

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