Astronomy (खगोल विज्ञान) के अनुसार मंगल ग्रह क्या है?
मंगल (Mars) सौरमंडल का चौथा ग्रह है, जो सूर्य से लगभग 22.79 करोड़ किलोमीटर (227.9 मिलियन किमी) की औसत दूरी पर स्थित है। आधुनिक खगोल विज्ञान (Astronomy) के अनुसार मंगल एक स्थलीय ग्रह (Terrestrial Planet) है, अर्थात इसकी सतह मुख्य रूप से चट्टानों, धूल और धातुओं से बनी है। इसका आकार पृथ्वी से छोटा है, लेकिन इसकी कई भौगोलिक विशेषताएँ पृथ्वी से मिलती-जुलती हैं। यही कारण है कि वैज्ञानिक इसे पृथ्वी का सबसे निकटतम ग्रह-समान पड़ोसी मानते हैं।
मंगल को सामान्यतः “लाल ग्रह (Red Planet)” कहा जाता है। इसका लाल रंग इसकी सतह पर बड़ी मात्रा में उपस्थित लौह ऑक्साइड (Iron Oxide) के कारण दिखाई देता है। यही पदार्थ पृथ्वी पर जंग (Rust) बनने के लिए भी उत्तरदायी होता है। अंतरिक्ष से देखने पर पूरा ग्रह लाल-नारंगी रंग का दिखाई देता है।
प्राचीन काल से ही मंगल मानव सभ्यता के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है। इसे नंगी आँखों से आसानी से देखा जा सकता है और इसकी चमक तथा लाल रंग के कारण विभिन्न संस्कृतियों में इसे युद्ध, शक्ति और साहस का प्रतीक माना गया। हालांकि आधुनिक विज्ञान मंगल को केवल एक प्राकृतिक ग्रह के रूप में देखता है और उसके गुणों का अध्ययन वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर करता है।
आज मंगल ग्रह वैज्ञानिक अनुसंधान का एक प्रमुख विषय है। NASA, ESA, ISRO और अन्य अंतरिक्ष एजेंसियों ने मंगल की सतह, वातावरण, जल के प्रमाण और संभावित जीवन की खोज के लिए अनेक मिशन भेजे हैं। इन अभियानों से प्राप्त जानकारी ने यह समझने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है कि अरबों वर्ष पहले मंगल का वातावरण आज की तुलना में अधिक घना था और उसकी सतह पर तरल जल भी मौजूद हो सकता था।
इस लेख में हम Astronomy के अनुसार मंगल ग्रह की उत्पत्ति, संरचना, वातावरण, सतह, गुरुत्वाकर्षण, उपग्रह, कक्षा, वैज्ञानिक मिशन तथा मंगल पर जीवन की संभावनाओं का विस्तृत अध्ययन करेंगे, जिससे इस लाल ग्रह की वैज्ञानिक दृष्टि से समग्र जानकारी प्राप्त की जा सके।
मंगल ग्रह की उत्पत्ति
आधुनिक खगोल विज्ञान (Astronomy) के अनुसार मंगल ग्रह का निर्माण लगभग 4.5 से 4.6 अरब वर्ष पहले सौरमंडल के निर्माण के प्रारंभिक चरण में हुआ था। वैज्ञानिकों का मानना है कि सूर्य के जन्म के बाद उसके चारों ओर गैस, धूल और चट्टानी कणों का एक विशाल चक्र (Solar Nebula या प्रोटोप्लानेटरी डिस्क) बना। इसी डिस्क में उपस्थित पदार्थों के आपसी गुरुत्वाकर्षण और लगातार होने वाली टक्करों के परिणामस्वरूप मंगल सहित सभी ग्रहों का निर्माण हुआ।
सौर नीहारिका सिद्धांत (Solar Nebula Theory)
मंगल की उत्पत्ति को समझाने के लिए सबसे अधिक स्वीकार किया जाने वाला सिद्धांत सौर नीहारिका सिद्धांत है। इस सिद्धांत के अनुसार लगभग 4.6 अरब वर्ष पहले गैस और धूल का एक विशाल बादल अपने ही गुरुत्वाकर्षण के कारण सिकुड़ने लगा। इसके केंद्र में सूर्य का निर्माण हुआ, जबकि उसके चारों ओर बचा हुआ पदार्थ एक चक्र के रूप में घूमता रहा।
समय के साथ इस चक्र में मौजूद धूल और चट्टानी कण आपस में टकराकर बड़े पिंड बनाने लगे। पहले प्लानेटेसिमल (Planetesimals) बने, फिर वे मिलकर प्रोटोप्लानेट (Protoplanets) बने। अंततः इन्हीं प्रोटोप्लानेट्स में से एक विकसित होकर मंगल ग्रह बना।
प्रारंभिक मंगल
अपने निर्माण के बाद मंगल अत्यंत गर्म था। लगातार होने वाली टक्करों और रेडियोधर्मी तत्वों से उत्पन्न ऊष्मा के कारण इसकी सतह पिघली हुई थी। इस अवस्था को मैग्मा महासागर (Magma Ocean) कहा जाता है।
धीरे-धीरे ग्रह ठंडा होने लगा और इसके भीतर भारी तत्व, जैसे लोहा (Iron) और निकेल (Nickel), केंद्र की ओर जाकर क्रोड (Core) का निर्माण करने लगे। हल्के पदार्थ ऊपर रह गए, जिनसे मैंटल (Mantle) और भूपर्पटी (Crust) का निर्माण हुआ। इस प्रक्रिया को ग्रह विभेदन (Planetary Differentiation) कहा जाता है।
उल्कापिंडों की बमबारी
मंगल के निर्माण के बाद लगभग 4.1 से 3.8 अरब वर्ष पहले सौरमंडल में भारी संख्या में उल्कापिंड और क्षुद्रग्रह ग्रहों से टकराए। इस काल को Late Heavy Bombardment कहा जाता है।
इन्हीं टक्करों के कारण मंगल की सतह पर आज दिखाई देने वाले अनेक विशाल क्रेटर (Impact Craters) बने। आज भी मंगल की सतह पर हजारों प्रभाव-गड्ढे देखे जा सकते हैं, जो उसके प्रारंभिक इतिहास के प्रमाण हैं।
प्रारंभिक वातावरण
वैज्ञानिकों के अनुसार प्रारंभिक मंगल पर ज्वालामुखीय गतिविधियाँ अत्यंत सक्रिय थीं। इनसे निकलने वाली गैसों ने एक घना वातावरण बनाया, जिसमें मुख्यतः कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), जलवाष्प और अन्य गैसें थीं। माना जाता है कि उस समय मंगल की सतह पर तरल जल भी मौजूद था और नदियाँ, झीलें तथा संभवतः उथले समुद्र भी रहे होंगे।
बाद में मंगल का अधिकांश वातावरण अंतरिक्ष में नष्ट हो गया, जिससे ग्रह ठंडा और शुष्क बन गया।
आधुनिक विज्ञान के अनुसार मंगल ग्रह का निर्माण लगभग 4.5–4.6 अरब वर्ष पहले सौर नीहारिका सिद्धांत (Solar Nebula Theory) के अनुसार हुआ। प्रारंभ में यह अत्यंत गर्म और पिघली हुई अवस्था में था, लेकिन समय के साथ ठंडा होकर एक चट्टानी ग्रह में परिवर्तित हो गया। उल्कापिंडों की टक्करों, ज्वालामुखीय गतिविधियों और वातावरण में हुए परिवर्तनों ने आज के मंगल का स्वरूप निर्धारित किया। मंगल की उत्पत्ति का अध्ययन वैज्ञानिकों को न केवल इस ग्रह के इतिहास को समझने में सहायता करता है, बल्कि पूरे सौरमंडल के निर्माण की प्रक्रिया को समझने में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है।
मंगल ग्रह की संरचना
आधुनिक खगोल विज्ञान (Astronomy) के अनुसार मंगल एक स्थलीय ग्रह (Terrestrial Planet) है। इसकी आंतरिक संरचना पृथ्वी के समान तीन प्रमुख भागों में विभाजित है—भूपर्पटी (Crust), मैंटल (Mantle) और क्रोड (Core)। वैज्ञानिकों ने इन परतों की जानकारी अंतरिक्ष यानों, उपग्रहों और विशेष रूप से NASA के InSight मिशन द्वारा दर्ज किए गए भूकंपीय (Marsquakes) आँकड़ों के आधार पर प्राप्त की है।
1. भूपर्पटी (Crust)
मंगल की सबसे बाहरी ठोस परत को भूपर्पटी कहा जाता है। यह मुख्यतः बेसाल्ट (Basalt) जैसी ज्वालामुखीय चट्टानों से बनी है। इसकी औसत मोटाई लगभग 24 से 72 किलोमीटर मानी जाती है, जो विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग हो सकती है।
मंगल की सतह पर विशाल ज्वालामुखी, गहरी घाटियाँ, प्रभाव-गड्ढे (Impact Craters) और विस्तृत धूल के मैदान पाए जाते हैं। भूपर्पटी में बड़ी मात्रा में लौह ऑक्साइड (Iron Oxide) उपस्थित है, जिसके कारण मंगल लाल रंग का दिखाई देता है।
2. मैंटल (Mantle)
भूपर्पटी के नीचे स्थित मोटी परत को मैंटल कहा जाता है। यह सिलिकेट चट्टानों से बनी है और ग्रह के कुल आयतन का सबसे बड़ा भाग बनाती है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि मंगल का मैंटल आज अधिकांशतः ठोस है, लेकिन इसके कुछ भागों में गहराई पर अभी भी उच्च तापमान मौजूद हो सकता है। अतीत में इसी मैंटल की गतिविधियों के कारण मंगल पर विशाल ज्वालामुखियों का निर्माण हुआ, जिनमें Olympus Mons सौरमंडल का सबसे बड़ा ज्ञात ज्वालामुखी है।
3. क्रोड (Core)
मंगल के केंद्र में क्रोड (Core) स्थित है। नवीन वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार इसका व्यास लगभग 3,600 से 3,700 किलोमीटर है।
क्रोड मुख्यतः निम्न तत्वों से बना माना जाता है—
- लोहा (Iron)
- निकेल (Nickel)
- सल्फर (Sulfur)
NASA के InSight मिशन से प्राप्त आँकड़ों के अनुसार मंगल का क्रोड पूरी तरह ठोस नहीं है, बल्कि तरल (Liquid Core) होने के मजबूत प्रमाण मिले हैं। यह खोज मंगल के आंतरिक विकास को समझने में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
मंगल की आंतरिक संरचना का महत्व
मंगल की संरचना का अध्ययन वैज्ञानिकों को यह समझने में सहायता करता है कि—
- ग्रह का निर्माण कैसे हुआ।
- ज्वालामुखीय गतिविधियाँ कब और कैसे हुईं।
- मंगल का चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field) क्यों समाप्त हो गया।
- प्रारंभिक वातावरण और जल की स्थिति कैसी रही होगी।
- भविष्य में मानव मिशनों के लिए कौन-से क्षेत्र अधिक उपयुक्त हो सकते हैं।
मंगल ग्रह की आंतरिक संरचना भूपर्पटी, मैंटल और क्रोड से मिलकर बनी है। यह संरचना पृथ्वी से काफी मिलती-जुलती है, लेकिन मंगल आकार में छोटा और भूगर्भीय दृष्टि से कम सक्रिय है। NASA के InSight मिशन ने यह पुष्टि करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई कि मंगल का क्रोड संभवतः तरल है। इन अध्ययनों से वैज्ञानिकों को न केवल मंगल के विकास को समझने में मदद मिल रही है, बल्कि पूरे सौरमंडल के स्थलीय ग्रहों की उत्पत्ति और विकास के बारे में भी महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हो रही है।
मंगल ग्रह का आकार
मंगल (Mars) सौरमंडल का सातवाँ सबसे बड़ा ग्रह और पृथ्वी के बाद दूसरा सबसे छोटा स्थलीय (Terrestrial) ग्रह है। आकार की दृष्टि से यह पृथ्वी से काफी छोटा है, लेकिन इसकी सतह पर पर्वत, घाटियाँ, ज्वालामुखी और ध्रुवीय हिम-टोपी जैसी अनेक भू-आकृतियाँ पाई जाती हैं, जो इसे वैज्ञानिक अध्ययन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती हैं।
मंगल का औसत व्यास लगभग 6,779 किलोमीटर है। तुलना के लिए पृथ्वी का औसत व्यास लगभग 12,742 किलोमीटर है। अर्थात् मंगल का व्यास पृथ्वी के व्यास का लगभग 53% है।
मंगल का कुल सतह क्षेत्रफल लगभग 14.45 करोड़ वर्ग किलोमीटर (144.8 million km²) है। यह पृथ्वी के कुल भूमि क्षेत्रफल (लगभग 14.9 करोड़ वर्ग किमी) के लगभग बराबर है। इसी कारण वैज्ञानिक मानते हैं कि यदि मंगल पर रहने योग्य परिस्थितियाँ होतीं, तो वहाँ पृथ्वी के समान विशाल भूभाग उपलब्ध होता।
मंगल का कुल आयतन लगभग 1.63 × 10¹¹ घन किलोमीटर है, जो पृथ्वी के आयतन का लगभग 15% है।
मंगल का द्रव्यमान लगभग 6.42 × 10²³ किलोग्राम है, जो पृथ्वी के द्रव्यमान का लगभग 10.7% है। इसके कम द्रव्यमान के कारण इसका गुरुत्वाकर्षण भी पृथ्वी की तुलना में काफी कम है।
आकार की तुलना
| विशेषता | मंगल | पृथ्वी |
|---|---|---|
| औसत व्यास | 6,779 किमी | 12,742 किमी |
| त्रिज्या | 3,389.5 किमी | 6,371 किमी |
| सतह क्षेत्रफल | 144.8 मिलियन किमी² | 510.1 मिलियन किमी² (कुल, जिसमें महासागर भी शामिल हैं) |
| भूमि क्षेत्रफल | लगभग पृथ्वी के भूमि क्षेत्रफल के बराबर | लगभग 148.9 मिलियन किमी² |
| आयतन | पृथ्वी का लगभग 15% | 100% |
| द्रव्यमान | पृथ्वी का लगभग 10.7% | 100% |
वैज्ञानिक महत्व
मंगल का छोटा आकार उसके विकास पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है। कम द्रव्यमान होने के कारण इसका आंतरिक भाग पृथ्वी की तुलना में अधिक तेजी से ठंडा हो गया। परिणामस्वरूप—
- इसका वैश्विक चुंबकीय क्षेत्र लगभग समाप्त हो गया।
- अधिकांश ज्वालामुखीय गतिविधियाँ बंद हो गईं।
- इसका घना वातावरण धीरे-धीरे अंतरिक्ष में समाप्त होता गया।
- सतह ठंडी और शुष्क बन गई।
इन्हीं कारणों से आज का मंगल पृथ्वी की तुलना में अधिक ठंडा और विरल वातावरण वाला ग्रह है।
आकार की दृष्टि से मंगल पृथ्वी से लगभग आधा बड़ा है, लेकिन इसकी सतह पर पृथ्वी जैसी अनेक भू-आकृतियाँ मौजूद हैं। इसका 6,779 किलोमीटर का व्यास, अपेक्षाकृत कम द्रव्यमान और छोटा आकार इसे सौरमंडल के अन्य स्थलीय ग्रहों से अलग बनाते हैं। मंगल के आकार का अध्ययन वैज्ञानिकों को इसके निर्माण, भूगर्भीय विकास और भविष्य के मानव मिशनों की योजना बनाने में महत्वपूर्ण सहायता प्रदान करता है।
मंगल ग्रह का गुरुत्वाकर्षण
गुरुत्वाकर्षण (Gravity) वह प्राकृतिक बल है जिसके कारण किसी ग्रह पर मौजूद वस्तुएँ उसकी सतह की ओर आकर्षित होती हैं। आधुनिक खगोल विज्ञान (Astronomy) के अनुसार मंगल ग्रह का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी की तुलना में काफी कम है।
मंगल की सतह पर गुरुत्वीय त्वरण (Surface Gravity) लगभग 3.71 मीटर प्रति सेकंड² (m/s²) है, जबकि पृथ्वी पर यह लगभग 9.81 m/s² है। अर्थात् मंगल का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी का केवल 38% है।
इसका अर्थ यह है कि यदि किसी व्यक्ति का वजन पृथ्वी पर 70 किलोग्राम है, तो मंगल पर उसका द्रव्यमान (Mass) 70 किलोग्राम ही रहेगा, लेकिन वजन (Weight) पृथ्वी की तुलना में लगभग 26–27 किलोग्राम के बराबर महसूस होगा। इसका कारण यह है कि द्रव्यमान नहीं बदलता, केवल गुरुत्वाकर्षण बल बदलता है।
मंगल का कम गुरुत्वाकर्षण उसके अपेक्षाकृत छोटे आकार और कम द्रव्यमान के कारण है। इसी वजह से यह ग्रह अपने वातावरण को पृथ्वी जितनी मजबूती से नहीं रोक सका, जिसके परिणामस्वरूप समय के साथ इसका अधिकांश वातावरण अंतरिक्ष में नष्ट हो गया।
कम गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव भविष्य के मानव मिशनों पर भी पड़ेगा। वैज्ञानिकों के अनुसार मंगल पर चलना, ऊँची छलांग लगाना और भारी वस्तुओं को उठाना पृथ्वी की तुलना में आसान होगा, लेकिन लंबे समय तक कम गुरुत्वाकर्षण में रहने से मानव शरीर की मांसपेशियों और हड्डियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
मंगल ग्रह का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी की तुलना में लगभग 38% है। यही कारण है कि वहाँ वस्तुओं का वजन कम महसूस होता है। मंगल के गुरुत्वाकर्षण का अध्ययन ग्रह की आंतरिक संरचना, वातावरण, अंतरिक्ष अभियानों तथा भविष्य में मानव बस्तियाँ स्थापित करने की योजनाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
मंगल ग्रह का वातावरण
मंगल ग्रह का वातावरण (Atmosphere) पृथ्वी की तुलना में अत्यंत पतला और विरल है। इसका सतही वायुदाब (Surface Pressure) पृथ्वी के औसत वायुदाब का केवल लगभग 0.6% है। यही कारण है कि मंगल पर मनुष्य बिना विशेष जीवन-रक्षक उपकरणों के जीवित नहीं रह सकता।
मंगल के वातावरण का लगभग 95% भाग कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) से बना है। इसके अतिरिक्त इसमें नाइट्रोजन (लगभग 2.7%), आर्गन (लगभग 1.6%), तथा बहुत कम मात्रा में ऑक्सीजन, जलवाष्प और अन्य गैसें पाई जाती हैं।
पतले वातावरण के कारण मंगल पर—
- तरल जल लंबे समय तक सतह पर स्थिर नहीं रह सकता।
- सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी (UV) किरणों से पर्याप्त सुरक्षा नहीं मिलती।
- तापमान में दिन और रात के बीच बहुत अधिक अंतर रहता है।
- विशाल धूल-भरी आँधियाँ (Dust Storms) उत्पन्न होती हैं, जो कभी-कभी पूरे ग्रह को ढक लेती हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि अरबों वर्ष पहले मंगल का वातावरण अधिक घना था और उस समय इसकी सतह पर नदियाँ एवं झीलें भी मौजूद रही होंगी। बाद में ग्रह के वैश्विक चुंबकीय क्षेत्र के समाप्त होने से सौर पवन (Solar Wind) ने धीरे-धीरे इसका अधिकांश वातावरण अंतरिक्ष में उड़ा दिया।
मंगल का वातावरण मुख्यतः कार्बन डाइऑक्साइड से बना अत्यंत पतला वातावरण है। यही वातावरण मंगल को ठंडा, शुष्क और जीवन के लिए कठिन ग्रह बनाता है, फिर भी वैज्ञानिकों के लिए यह ग्रह के इतिहास और संभावित प्राचीन जीवन के अध्ययन का महत्वपूर्ण स्रोत है।
मंगल ग्रह का तापमान
मंगल ग्रह सौरमंडल के सबसे ठंडे ग्रहों में से एक है। सूर्य से अधिक दूरी तथा अत्यंत पतले वातावरण के कारण यहाँ का तापमान पृथ्वी की तुलना में बहुत कम रहता है।
मंगल का औसत सतही तापमान लगभग –63°C है। हालांकि स्थान, मौसम और दिन-रात के अनुसार तापमान में काफी परिवर्तन होता है।
- भूमध्य रेखा (Equator) के पास गर्मियों के दिन में तापमान लगभग 20°C तक पहुँच सकता है।
- रात के समय वही तापमान –70°C या उससे भी कम हो सकता है।
- ध्रुवीय क्षेत्रों में सर्दियों के दौरान तापमान –125°C तक गिर सकता है।
मंगल पर ऋतुएँ (Seasons) भी होती हैं, क्योंकि इसका अक्षीय झुकाव (Axial Tilt) लगभग 25.2° है, जो पृथ्वी (23.5°) के काफी निकट है। इसलिए वहाँ भी ग्रीष्म, शीत, वसंत और शरद ऋतुएँ आती हैं, लेकिन प्रत्येक ऋतु पृथ्वी की तुलना में अधिक लंबी होती है क्योंकि मंगल सूर्य की परिक्रमा लगभग 687 पृथ्वी दिनों में पूरी करता है।
मंगल ग्रह का तापमान अत्यंत कम और परिवर्तनीय है। औसतन यह –63°C रहता है, जबकि ध्रुवीय क्षेत्रों में –125°C तक गिर सकता है। अत्यंत पतला वातावरण और सूर्य से अधिक दूरी मंगल को एक ठंडा तथा शुष्क ग्रह बनाते हैं। भविष्य के मानव अभियानों की योजना बनाते समय इन तापमान परिस्थितियों को विशेष रूप से ध्यान में रखा जाता है।
मंगल का रंग लाल क्यों है?
मंगल (Mars) को सामान्यतः “लाल ग्रह (Red Planet)” कहा जाता है। इसका कारण इसकी सतह पर बड़ी मात्रा में पाया जाने वाला लौह ऑक्साइड (Iron Oxide) है। लौह ऑक्साइड वही रासायनिक यौगिक है, जिसे सामान्य भाषा में जंग (Rust) कहा जाता है।
अरबों वर्ष पहले मंगल की सतह पर मौजूद लौह (Iron) का संपर्क ऑक्सीजन से हुआ, जिससे लौह ऑक्साइड का निर्माण हुआ। समय के साथ यह लाल-भूरी धूल पूरे ग्रह पर फैल गई। यही धूल सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करती है, जिसके कारण अंतरिक्ष से देखने पर मंगल लाल या नारंगी-लाल दिखाई देता है।
लौह ऑक्साइड क्या है?
लौह ऑक्साइड वह यौगिक है, जो तब बनता है जब लोहा ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया करता है। पृथ्वी पर भी लोहे की वस्तुओं पर जो जंग लगती है, वह मुख्यतः लौह ऑक्साइड ही होती है।
मंगल की सतह पर मौजूद धूल के सूक्ष्म कणों में यही लौह ऑक्साइड बड़ी मात्रा में पाया जाता है। तेज हवाएँ इन कणों को पूरे ग्रह में फैला देती हैं, जिससे लगभग पूरा मंगल लाल रंग का दिखाई देता है।
क्या पूरा मंगल लाल है?
यद्यपि मंगल को लाल ग्रह कहा जाता है, लेकिन इसकी पूरी सतह एक ही रंग की नहीं है। विभिन्न क्षेत्रों में—
- लाल-भूरी धूल
- गहरे भूरे ज्वालामुखीय क्षेत्र
- काले बेसाल्टिक पत्थर
- सफेद ध्रुवीय हिम-टोपियाँ
- पीले एवं नारंगी धूल वाले क्षेत्र
भी पाए जाते हैं। फिर भी लाल धूल की अधिकता के कारण दूर से देखने पर पूरा ग्रह लाल दिखाई देता है।
वैज्ञानिक महत्व
मंगल का लाल रंग वैज्ञानिकों को उसके भूगर्भीय इतिहास और रासायनिक संरचना को समझने में सहायता करता है। इससे यह जानकारी मिलती है कि मंगल की सतह पर लौह-समृद्ध चट्टानें मौजूद हैं और अतीत में ऑक्सीकरण (Oxidation) की प्रक्रियाएँ हुई थीं।
मंगल का लाल रंग उसकी सतह पर बड़ी मात्रा में उपस्थित लौह ऑक्साइड (Iron Oxide) के कारण है। यही पदार्थ पृथ्वी पर बनने वाली जंग का भी मुख्य घटक है। मंगल की लाल धूल पूरे ग्रह पर फैली हुई है, जिसके कारण इसे “लाल ग्रह (Red Planet)” कहा जाता है।
मंगल की सतह
मंगल की सतह (Surface of Mars) सौरमंडल की सबसे विविध और रोचक ग्रह सतहों में से एक है। आधुनिक खगोल विज्ञान (Astronomy) के अनुसार इसकी सतह मुख्यतः बेसाल्ट (Basalt) जैसी ज्वालामुखीय चट्टानों, लौह ऑक्साइड युक्त धूल और प्रभाव-गड्ढों (Impact Craters) से बनी है। मंगल की सतह का अध्ययन अंतरिक्ष यानों, ऑर्बिटर और रोवर मिशनों द्वारा किया गया है।
प्रमुख विशेषताएँ
मंगल पर हजारों बड़े और छोटे क्रेटर पाए जाते हैं। ये करोड़ों वर्ष पहले उल्कापिंडों और क्षुद्रग्रहों की टक्करों से बने थे। दक्षिणी गोलार्ध में इनकी संख्या अधिक है, जिससे पता चलता है कि यह क्षेत्र अधिक प्राचीन है।
मंगल पर विशाल ज्वालामुखी पाए जाते हैं। इनमें Olympus Mons सौरमंडल का सबसे बड़ा ज्ञात ज्वालामुखी है, जिसकी ऊँचाई लगभग 22 किलोमीटर है। यह दर्शाता है कि अतीत में मंगल पर व्यापक ज्वालामुखीय गतिविधियाँ हुई थीं।
मंगल की सतह पर Valles Marineris नामक विशाल घाटी प्रणाली स्थित है। इसकी लंबाई लगभग 4,000 किलोमीटर, चौड़ाई लगभग 200 किलोमीटर और अधिकतम गहराई लगभग 7 किलोमीटर तक है। यह सौरमंडल की सबसे बड़ी ज्ञात घाटियों में से एक है।
मंगल की सतह महीन लाल धूल से ढकी हुई है। इसके नीचे विभिन्न प्रकार की चट्टानें, बेसाल्ट, ज्वालामुखीय शिलाएँ और खनिज पाए जाते हैं। कई स्थानों पर मिट्टी में सल्फेट, सिलिका और मिट्टी (Clay Minerals) के प्रमाण भी मिले हैं, जो अतीत में जल की उपस्थिति का संकेत देते हैं।
मंगल के उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों पर स्थायी हिम-टोपियाँ (Polar Ice Caps) मौजूद हैं। इनमें मुख्य रूप से जल की बर्फ (Water Ice) तथा जमी हुई कार्बन डाइऑक्साइड (Dry Ice) पाई जाती है। मौसम के अनुसार इनका आकार बदलता रहता है।
सतह का वैज्ञानिक महत्व
मंगल की सतह का अध्ययन वैज्ञानिकों को यह समझने में सहायता करता है कि—
- ग्रह का भूगर्भीय विकास कैसे हुआ।
- अतीत में जल कहाँ और कितनी मात्रा में मौजूद था।
- ज्वालामुखीय गतिविधियाँ कब तक सक्रिय रहीं।
- भविष्य में मानव मिशनों के लिए कौन-से क्षेत्र सुरक्षित और उपयुक्त हो सकते हैं।
- मंगल की सतह विशाल ज्वालामुखियों, गहरी घाटियों, प्रभाव-गड्ढों, लाल धूल और ध्रुवीय हिम-टोपियों से युक्त एक अत्यंत विविध भू-दृश्य प्रस्तुत करती है। इन विशेषताओं के अध्ययन से वैज्ञानिकों को मंगल के भूगर्भीय इतिहास, जल के अतीत और संभावित जीवन की परिस्थितियों को समझने में महत्वपूर्ण सहायता मिल रही है।
ओलंपस मॉन्स (Olympus Mons)
ओलंपस मॉन्स (Olympus Mons) मंगल ग्रह पर स्थित एक विशाल शील्ड ज्वालामुखी (Shield Volcano) है। यह न केवल मंगल का, बल्कि पूरे सौरमंडल का सबसे बड़ा ज्ञात ज्वालामुखी और सबसे ऊँचा पर्वत माना जाता है। इसका अध्ययन मंगल के भूगर्भीय इतिहास और ज्वालामुखीय गतिविधियों को समझने में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
वैज्ञानिकों के अनुसार ओलंपस मॉन्स का निर्माण अरबों वर्षों तक लगातार बहने वाले बेसाल्टिक लावा (Basaltic Lava) के कारण हुआ। मंगल पर पृथ्वी जैसी सक्रिय प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics) नहीं है। इसलिए लावा लंबे समय तक एक ही स्थान से निकलता रहा और परत-दर-परत जमा होकर इस विशाल ज्वालामुखी का निर्माण हुआ।
प्रमुख विशेषताएँ
- ऊँचाई: लगभग 21.9–22 किलोमीटर
- आधार (Base) का व्यास: लगभग 600 किलोमीटर
- कैल्डेरा (Caldera): शिखर पर कई विशाल ज्वालामुखीय गर्त, जिनका संयुक्त व्यास लगभग 80 किलोमीटर तक है।
- ढाल: इसकी ढलान बहुत कम है (लगभग 5°), इसलिए इसे शील्ड ज्वालामुखी कहा जाता है।
पृथ्वी के पर्वतों से तुलना
ओलंपस मॉन्स की ऊँचाई पृथ्वी के सबसे ऊँचे पर्वत माउंट एवरेस्ट (8.85 किमी) से लगभग ढाई गुना अधिक है। इसका आधार क्षेत्रफल इतना विशाल है कि यह कई देशों के क्षेत्रफल के बराबर है।
वैज्ञानिक महत्व
ओलंपस मॉन्स का अध्ययन वैज्ञानिकों को यह समझने में सहायता करता है कि—
- मंगल पर ज्वालामुखीय गतिविधियाँ कैसे हुईं।
- ग्रह की आंतरिक संरचना और ऊष्मा का विकास कैसा था।
- मंगल पर प्लेट विवर्तनिकी क्यों नहीं है।
- ग्रह के भूगर्भीय इतिहास में ज्वालामुखियों की क्या भूमिका रही।
ओलंपस मॉन्स मंगल ग्रह की सबसे अद्भुत भू-आकृतियों में से एक है। लगभग 22 किलोमीटर ऊँचा यह ज्वालामुखी सौरमंडल का सबसे बड़ा ज्ञात ज्वालामुखी है। इसका निर्माण करोड़ों वर्षों तक लगातार बहने वाले लावा से हुआ और आज भी यह मंगल के भूगर्भीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण प्रमाण है।
वैलेस मेरिनेरिस (Valles Marineris)
वैलेस मेरिनेरिस (Valles Marineris) मंगल ग्रह पर स्थित एक विशाल घाटी प्रणाली (Canyon System) है। यह पूरे सौरमंडल की सबसे बड़ी ज्ञात घाटियों में से एक है। इसका नाम NASA के Mariner 9 अंतरिक्ष यान के सम्मान में रखा गया, जिसने 1971 में पहली बार इस क्षेत्र की विस्तृत तस्वीरें भेजी थीं।
आकार और विस्तार
वैलेस मेरिनेरिस का आकार अत्यंत विशाल है—
- लंबाई: लगभग 4,000 किलोमीटर
- अधिकतम चौड़ाई: लगभग 200 किलोमीटर
- अधिकतम गहराई: लगभग 7 किलोमीटर
यदि इसकी तुलना पृथ्वी से की जाए, तो यह लगभग पूरे भारतीय उपमहाद्वीप या संयुक्त राज्य अमेरिका के एक बड़े हिस्से के बराबर लंबाई तक फैली हुई है।
निर्माण कैसे हुआ?
वैज्ञानिकों का मानना है कि वैलेस मेरिनेरिस मुख्यतः भूपर्पटी में आई दरारों (Tectonic Fractures) और सतह के धँसने (Collapse) से बनी। इसका निर्माण संभवतः निकट स्थित विशाल ज्वालामुखीय क्षेत्र थार्सिस (Tharsis Rise) के उभरने के कारण उत्पन्न तनाव से हुआ।
बाद में हवा, भूस्खलन और संभवतः प्राचीन जल प्रवाह ने इन घाटियों को और अधिक चौड़ा तथा गहरा बना दिया।
वैलेस मेरिनेरिस मंगल के भूगर्भीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण अभिलेख है। यहाँ की चट्टानों में ग्रह के अरबों वर्षों के इतिहास के प्रमाण सुरक्षित हैं। विभिन्न मिशनों द्वारा यहाँ ऐसे खनिजों के प्रमाण मिले हैं जो अतीत में जल की उपस्थिति का संकेत देते हैं।वैज्ञानिक इस क्षेत्र का अध्ययन इसलिए भी करते हैं क्योंकि—
- यहाँ प्राचीन चट्टानों की परतें स्पष्ट दिखाई देती हैं।
- जल से बने खनिजों के प्रमाण मिले हैं।
- मंगल के जलवायु और भूगर्भीय विकास को समझने में सहायता मिलती है।
- भविष्य में जीवन के संकेत खोजने के लिए यह एक महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता है।
वैलेस मेरिनेरिस मंगल की सबसे अद्भुत प्राकृतिक संरचनाओं में से एक है। लगभग 4,000 किलोमीटर लंबी और 7 किलोमीटर तक गहरी यह घाटी प्रणाली सौरमंडल की सबसे विशाल घाटियों में गिनी जाती है। इसका अध्ययन मंगल के भूगर्भीय विकास, प्राचीन जल गतिविधियों और भविष्य के वैज्ञानिक अभियानों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
मंगल ग्रह की ध्रुवीय बर्फ (Polar Ice Caps)
मंगल ग्रह के उत्तरी (North Pole) और दक्षिणी (South Pole) ध्रुवों पर विशाल ध्रुवीय हिम-टोपियाँ (Polar Ice Caps) स्थित हैं। ये सौरमंडल की सबसे महत्वपूर्ण ग्रह-भौगोलिक संरचनाओं में से एक हैं। आधुनिक खगोल विज्ञान (Astronomy) के अनुसार इन हिम-टोपियों में मुख्य रूप से जल की बर्फ (Water Ice) तथा जमी हुई कार्बन डाइऑक्साइड (Frozen Carbon Dioxide या Dry Ice) पाई जाती है।







उत्तरी ध्रुवीय हिम-टोपी (North Polar Ice Cap)
मंगल की उत्तरी ध्रुवीय हिम-टोपी का अधिकांश भाग जल की बर्फ से बना है। सर्दियों में इसके ऊपर कार्बन डाइऑक्साइड की पतली परत जम जाती है, जबकि गर्मियों में यह परत पुनः वाष्पित होकर वातावरण में मिल जाती है। इस कारण इसका आकार मौसम के अनुसार बदलता रहता है।
दक्षिणी ध्रुवीय हिम-टोपी (South Polar Ice Cap)
दक्षिणी ध्रुव पर भी जल की बर्फ मौजूद है, लेकिन यहाँ कार्बन डाइऑक्साइड की स्थायी बर्फ (Permanent Dry Ice) की मोटी परत भी पाई जाती है। यह क्षेत्र उत्तरी ध्रुव की तुलना में अधिक ठंडा रहता है, इसलिए यहाँ सूखी बर्फ पूरे वर्ष बनी रह सकती है।
ध्रुवीय बर्फ का निर्माण
वैज्ञानिकों के अनुसार मंगल के अत्यंत कम तापमान के कारण वातावरण में उपस्थित जलवाष्प और कार्बन डाइऑक्साइड ध्रुवीय क्षेत्रों में जमकर बर्फ का रूप ले लेते हैं। मौसम बदलने पर इनकी मात्रा बढ़ती और घटती रहती है, जिससे हिम-टोपियों का आकार भी बदलता है।
वैज्ञानिक महत्व
मंगल की ध्रुवीय बर्फ वैज्ञानिकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि—
- यह मंगल पर जल के सबसे बड़े ज्ञात भंडारों में से एक है।
- इसकी परतों में करोड़ों वर्षों के जलवायु परिवर्तन का इतिहास सुरक्षित हो सकता है।
- भविष्य में मानव अभियानों के लिए यह पीने का पानी, ऑक्सीजन और रॉकेट ईंधन (हाइड्रोजन) प्राप्त करने का संभावित स्रोत बन सकती है।
- इसके अध्ययन से मंगल की जलवायु और वातावरण के विकास को समझने में सहायता मिलती है।
मंगल के दोनों ध्रुवों पर स्थित हिम-टोपियाँ मुख्यतः जल की बर्फ और जमी हुई कार्बन डाइऑक्साइड से बनी हैं। ये केवल बर्फ के भंडार ही नहीं, बल्कि मंगल के जलवायु इतिहास और भविष्य के मानव अभियानों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण संसाधन भी हैं। इसलिए NASA, ESA और अन्य अंतरिक्ष एजेंसियाँ इन ध्रुवीय क्षेत्रों का लगातार अध्ययन कर रही हैं।
मंगल ग्रह पर जल के प्रमाण
आधुनिक खगोल विज्ञान (Astronomy) के अनुसार वर्तमान समय में मंगल की सतह पर स्थायी रूप से बहता हुआ तरल जल (Liquid Water) नहीं पाया जाता। इसका मुख्य कारण वहाँ का अत्यंत पतला वातावरण और कम वायुदाब है। फिर भी अनेक अंतरिक्ष अभियानों से ऐसे मजबूत वैज्ञानिक प्रमाण मिले हैं, जो बताते हैं कि अरबों वर्ष पहले मंगल पर नदियाँ, झीलें और संभवतः उथले समुद्र भी मौजूद थे।






1. सूखी नदी घाटियाँ (Ancient River Channels)
मंगल की सतह पर हजारों सूखी नदी घाटियाँ और जल प्रवाह के मार्ग पाए गए हैं। इनका आकार और स्वरूप पृथ्वी की नदियों जैसा दिखाई देता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ये घाटियाँ कभी बहने वाले तरल जल द्वारा निर्मित हुई थीं।
2. डेल्टा और प्राचीन झीलें
Jezero Crater, जहाँ NASA का Perseverance Rover कार्य कर रहा है, एक समय विशाल झील माना जाता है। यहाँ स्पष्ट रूप से नदी द्वारा निर्मित डेल्टा (River Delta) के प्रमाण मिले हैं। डेल्टा का निर्माण तभी होता है जब बहता हुआ जल किसी झील या समुद्र में प्रवेश करता है।
3. जल से बनने वाले खनिज
मंगल पर अनेक ऐसे खनिज मिले हैं, जिनका निर्माण केवल जल की उपस्थिति में होता है। इनमें प्रमुख हैं—
- क्ले (Clay Minerals)
- सल्फेट (Sulfates)
- हेमेटाइट (Hematite)
इन खनिजों की खोज Mars Reconnaissance Orbiter, Opportunity Rover, Curiosity Rover और Perseverance Rover जैसे अभियानों ने की है।
4. ध्रुवीय बर्फ
मंगल के दोनों ध्रुवों पर विशाल मात्रा में जल की बर्फ (Water Ice) मौजूद है। इसके अतिरिक्त भूमिगत क्षेत्रों में भी जमी हुई बर्फ के प्रमाण मिले हैं। इससे स्पष्ट होता है कि आज भी मंगल पर पर्याप्त मात्रा में जल बर्फ के रूप में सुरक्षित है।
5. भूमिगत बर्फ
रडार अध्ययनों और ऑर्बिटर मिशनों से संकेत मिले हैं कि मंगल की सतह के नीचे कई स्थानों पर विशाल मात्रा में जमी हुई जल-बर्फ (Subsurface Ice) मौजूद है। भविष्य के मानव अभियानों के लिए यह एक महत्वपूर्ण संसाधन हो सकता है।
क्या वर्तमान में मंगल पर तरल जल है?
आज मंगल की सतह पर स्थायी रूप से बहता हुआ तरल जल नहीं पाया गया है। हालांकि कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक खारे पानी (Brines) के सीमित और अस्थायी रूप से बनने की संभावना पर अध्ययन जारी है, लेकिन अभी तक इसका स्पष्ट और सर्वसम्मत प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
वैज्ञानिक महत्व
मंगल पर जल के प्रमाणों का अध्ययन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि—
- इससे ग्रह के प्राचीन वातावरण और जलवायु का पता चलता है।
- यह समझने में सहायता मिलती है कि क्या कभी मंगल पर जीवन के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ थीं।
- भविष्य के मानव मिशनों के लिए जल एक महत्वपूर्ण संसाधन हो सकता है।
वर्तमान में मंगल की सतह पर स्थायी तरल जल नहीं है, लेकिन सूखी नदी घाटियाँ, प्राचीन झीलों के डेल्टा, जल से बने खनिज, ध्रुवीय हिम-टोपियाँ और भूमिगत बर्फ इस बात के मजबूत वैज्ञानिक प्रमाण हैं कि अरबों वर्ष पहले मंगल पर प्रचुर मात्रा में जल मौजूद था। यही कारण है कि मंगल आज भी जीवन की संभावनाओं की खोज के लिए सबसे महत्वपूर्ण ग्रहों में से एक माना जाता है।
मंगल के उपग्रह
आधुनिक खगोल विज्ञान (Astronomy) के अनुसार मंगल ग्रह के दो प्राकृतिक उपग्रह (Natural Satellites) हैं—फोबोस (Phobos) और डीमोस (Deimos)। ये दोनों आकार में छोटे, अनियमित (Irregular) तथा क्षुद्रग्रह (Asteroid) जैसे दिखाई देते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि ये संभवतः मंगल के गुरुत्वाकर्षण द्वारा पकड़े गए क्षुद्रग्रह हो सकते हैं, हालांकि इनके निर्माण को लेकर अन्य वैज्ञानिक सिद्धांत भी प्रचलित हैं।
इन दोनों उपग्रहों की खोज 12 अगस्त 1877 को अमेरिकी खगोलशास्त्री असाफ हॉल (Asaph Hall) ने की थी। इनके नाम यूनानी (Greek) पौराणिक कथाओं के युद्ध देवता एरेस (Ares) के दो पुत्रों—फोबोस (भय) और डीमोस (आतंक)—के नाम पर रखे गए हैं। रोमन पौराणिक कथाओं में एरेस को मार्स (Mars) कहा जाता है।






1. फोबोस (Phobos)
फोबोस मंगल का सबसे बड़ा और सबसे निकट स्थित उपग्रह है।
प्रमुख विशेषताएँ
- औसत व्यास: लगभग 22.4 किलोमीटर
- मंगल से औसत दूरी: लगभग 6,000 किलोमीटर
- परिक्रमा अवधि: लगभग 7 घंटे 39 मिनट
- आकार: अनियमित (Irregular)
- विशेषता: इसकी सतह पर Stickney Crater नामक विशाल प्रभाव-गड्ढा स्थित है।
फोबोस मंगल के बहुत निकट होने के कारण धीरे-धीरे उसकी ओर खिसक रहा है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि लगभग 3 से 5 करोड़ वर्षों बाद यह या तो मंगल से टकरा जाएगा या टूटकर उसके चारों ओर एक वलय (Ring) का निर्माण कर सकता है।
2. डीमोस (Deimos)
डीमोस मंगल का दूसरा और छोटा उपग्रह है।
प्रमुख विशेषताएँ
- औसत व्यास: लगभग 12.4 किलोमीटर
- मंगल से औसत दूरी: लगभग 23,460 किलोमीटर
- परिक्रमा अवधि: लगभग 30.3 घंटे
- आकार: अनियमित (Irregular)
डीमोस की सतह अपेक्षाकृत चिकनी दिखाई देती है क्योंकि उस पर धूल की मोटी परत जमी हुई है, जिसने छोटे-छोटे प्रभाव-गड्ढों को काफी हद तक ढक दिया है।
उत्पत्ति के सिद्धांत
वैज्ञानिकों ने मंगल के उपग्रहों की उत्पत्ति के बारे में कई सिद्धांत प्रस्तुत किए हैं—
पकड़े गए क्षुद्रग्रह (Captured Asteroid Theory): दोनों उपग्रह पहले क्षुद्रग्रह थे, जिन्हें मंगल के गुरुत्वाकर्षण ने अपनी कक्षा में पकड़ लिया।
विशाल टक्कर सिद्धांत (Giant Impact Theory): किसी बड़े पिंड की मंगल से टक्कर के बाद निकले मलबे से इन उपग्रहों का निर्माण हुआ।
वर्तमान में दोनों सिद्धांतों पर शोध जारी है।
वैज्ञानिक महत्व
मंगल के उपग्रहों का अध्ययन वैज्ञानिकों को—
- मंगल के निर्माण और विकास को समझने में सहायता करता है।
- प्रारंभिक सौरमंडल के इतिहास की जानकारी देता है।
- भविष्य के मानव अभियानों के लिए संभावित आधार (Base) के रूप में उपयोग की संभावनाओं का अध्ययन करने में मदद करता है।
मंगल के दो प्राकृतिक उपग्रह—फोबोस और डीमोस—आकार में छोटे लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। फोबोस मंगल के अत्यंत निकट है और भविष्य में उसके साथ टकराने की संभावना रखता है, जबकि डीमोस अपेक्षाकृत दूर और स्थिर कक्षा में परिक्रमा करता है। इन दोनों उपग्रहों का अध्ययन मंगल तथा सौरमंडल के प्रारंभिक इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
मंगल के दिन और वर्ष
आधुनिक खगोल विज्ञान (Astronomy) के अनुसार मंगल ग्रह अपने अक्ष (Axis) पर घूमने और सूर्य की परिक्रमा करने में पृथ्वी से अलग समय लेता है। यही कारण है कि मंगल पर एक दिन (Martian Day) और एक वर्ष (Martian Year) पृथ्वी की तुलना में अधिक लंबे होते हैं।





मंगल का एक दिन (Martian Day)
मंगल अपने अक्ष पर एक घूर्णन लगभग 24 घंटे 37 मिनट 22 सेकंड में पूरा करता है। मंगल के एक दिन को “सोल (Sol)” कहा जाता है।
मंगल का एक सोल पृथ्वी के दिन से केवल लगभग 37 मिनट अधिक लंबा होता है। इसी कारण वैज्ञानिकों के लिए मंगल पर समय की गणना अपेक्षाकृत सरल रहती है। NASA के रोवर मिशनों—जैसे Curiosity और Perseverance—में भी समय की गणना प्रायः सोल (Sol) के आधार पर की जाती है।
मंगल का एक वर्ष (Martian Year)
मंगल सूर्य से पृथ्वी की तुलना में अधिक दूर स्थित है। इसलिए उसे सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करने में लगभग 687 पृथ्वी दिन (लगभग 669 सोल) लगते हैं। अर्थात् मंगल का एक वर्ष पृथ्वी के लगभग 1.88 वर्षों के बराबर होता है।
मंगल पर ऋतुएँ (Seasons)
मंगल का अक्षीय झुकाव (Axial Tilt) लगभग 25.2° है, जो पृथ्वी के 23.5° के बहुत निकट है। इसलिए मंगल पर भी चार ऋतुएँ होती हैं—
- वसंत (Spring)
- ग्रीष्म (Summer)
- शरद (Autumn)
- शीत (Winter)
हालाँकि मंगल का वर्ष लंबा होने के कारण प्रत्येक ऋतु पृथ्वी की तुलना में लगभग दोगुनी अवधि तक रहती है।
दिन और रात की विशेषताएँ
मंगल का वातावरण बहुत पतला होने के कारण दिन और रात के तापमान में काफी अंतर होता है। दिन में भूमध्य रेखा के पास तापमान 20°C तक पहुँच सकता है, जबकि रात में यह –70°C या उससे भी कम हो जाता है। ध्रुवीय क्षेत्रों में सर्दियों के दौरान तापमान –125°C तक गिर सकता है।
वैज्ञानिक महत्व
मंगल के दिन और वर्ष का अध्ययन वैज्ञानिकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि—
- अंतरिक्ष यानों और रोवर मिशनों की समय-सारणी (Mission Planning) इसी पर आधारित होती है।
- मंगल की जलवायु और मौसम को समझने में सहायता मिलती है।
- भविष्य के मानव अभियानों के लिए कार्य-समय और जीवन-चक्र की योजना बनाने में मदद मिलती है।
मंगल का एक दिन 24 घंटे 37 मिनट 22 सेकंड का होता है, जिसे सोल (Sol) कहा जाता है, जबकि उसका एक वर्ष 687 पृथ्वी दिनों के बराबर होता है। पृथ्वी के समान अक्षीय झुकाव होने के कारण मंगल पर भी चार ऋतुएँ आती हैं, लेकिन उनका समय अधिक लंबा होता है। यही विशेषताएँ मंगल को वैज्ञानिक अध्ययन और भविष्य के मानव अभियानों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती हैं।
मंगल की कक्षा (Orbit of Mars)
आधुनिक खगोल विज्ञान (Astronomy) के अनुसार मंगल ग्रह सूर्य की परिक्रमा एक अण्डाकार (Elliptical) कक्षा में करता है। इसका अर्थ है कि मंगल और सूर्य के बीच की दूरी पूरे वर्ष समान नहीं रहती, बल्कि समय-समय पर बदलती रहती है। मंगल सूर्य से औसतन 22.79 करोड़ किलोमीटर (227.9 मिलियन किमी) की दूरी पर स्थित है।




मंगल की कक्षा की प्रमुख विशेषताएँ
1. अण्डाकार कक्षा (Elliptical Orbit)
मंगल की कक्षा पूर्णतः गोल नहीं है, बल्कि अण्डाकार है। इसलिए परिक्रमा के दौरान कभी यह सूर्य के अधिक निकट होता है और कभी अधिक दूर।
- उपसौर (Perihelion): लगभग 20.67 करोड़ किलोमीटर
- अपसौर (Aphelion): लगभग 24.92 करोड़ किलोमीटर
इसी कारण मंगल पर विभिन्न ऋतुओं की अवधि और तीव्रता में भी कुछ अंतर दिखाई देता है।
2. परिक्रमा अवधि
मंगल सूर्य की एक परिक्रमा लगभग 687 पृथ्वी दिनों (लगभग 669 मंगल दिवस या सोल) में पूरी करता है। यही मंगल का एक वर्ष कहलाता है।
3. कक्षीय वेग (Orbital Speed)
मंगल सूर्य की परिक्रमा लगभग 24.1 किलोमीटर प्रति सेकंड की औसत गति से करता है। यह गति पृथ्वी की औसत कक्षीय गति (लगभग 29.8 किमी/सेकंड) से कम है क्योंकि मंगल सूर्य से अधिक दूर स्थित है।
4. कक्षीय झुकाव (Orbital Inclination)
मंगल की कक्षा सूर्य के चारों ओर पृथ्वी की कक्षा (क्रांतिवृत्त या Ecliptic) की तुलना में लगभग 1.85° झुकी हुई है। यह झुकाव अपेक्षाकृत कम है और ग्रह की कक्षीय गति को अधिक प्रभावित नहीं करता।
मंगल की कक्षा का वैज्ञानिक महत्व
मंगल की कक्षा का अध्ययन वैज्ञानिकों को—
- ग्रह की ऋतुओं और जलवायु को समझने में सहायता करता है।
- अंतरिक्ष यानों के प्रक्षेपण और मिशन योजना बनाने में मदद करता है।
- पृथ्वी और मंगल के बीच यात्रा के उपयुक्त समय (Launch Window) निर्धारित करने में सहायक होता है।
- सौरमंडल के ग्रहों की गति और गुरुत्वीय प्रभावों का अध्ययन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
मंगल सूर्य की परिक्रमा एक अण्डाकार कक्षा में करता है और उसे एक चक्कर पूरा करने में लगभग 687 पृथ्वी दिन लगते हैं। इसकी औसत कक्षीय गति 24.1 किमी/सेकंड है तथा सूर्य से इसकी औसत दूरी 22.79 करोड़ किलोमीटर है। मंगल की कक्षा का अध्ययन ग्रह की जलवायु, ऋतुओं, अंतरिक्ष अभियानों और सौरमंडल की गतिशीलता को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
मंगल ग्रह पर जीवन की संभावना
आधुनिक खगोल विज्ञान (Astronomy) के अनुसार अब तक मंगल ग्रह पर जीवन (Life) का कोई प्रत्यक्ष और निर्णायक प्रमाण नहीं मिला है। हालांकि पिछले कई दशकों में किए गए वैज्ञानिक अध्ययनों से ऐसे अनेक संकेत मिले हैं, जिनसे यह संभावना व्यक्त की जाती है कि अरबों वर्ष पहले मंगल पर सूक्ष्मजीवों (Microbial Life) के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ मौजूद रही होंगी।
इसी संभावना की पुष्टि के लिए NASA, ESA, ISRO तथा अन्य अंतरिक्ष एजेंसियाँ लगातार मंगल पर अनुसंधान कर रही हैं।






1. प्राचीन जल की उपस्थिति
वैज्ञानिकों ने मंगल पर सूखी नदी घाटियों, प्राचीन झीलों के डेल्टा, जल से बने खनिज तथा ध्रुवीय बर्फ के रूप में ऐसे प्रमाण खोजे हैं, जो बताते हैं कि अरबों वर्ष पहले मंगल पर बड़ी मात्रा में तरल जल (Liquid Water) मौजूद था।
चूँकि पृथ्वी पर जहाँ जल है, वहाँ जीवन की संभावना भी अधिक होती है, इसलिए वैज्ञानिक मानते हैं कि प्राचीन मंगल पर सूक्ष्मजीवों के लिए अनुकूल वातावरण रहा हो सकता है।
2. जैविक अणुओं (Organic Molecules) की खोज
NASA के Curiosity Rover ने मंगल की चट्टानों में कुछ कार्बनिक अणुओं (Organic Molecules) का पता लगाया है। ये अणु जीवन के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन इनकी उपस्थिति का अर्थ यह नहीं है कि मंगल पर जीवन अवश्य था। ऐसे अणु प्राकृतिक भू-रासायनिक प्रक्रियाओं से भी बन सकते हैं।
3. मीथेन गैस (Methane)
Curiosity Rover ने समय-समय पर मंगल के वातावरण में बहुत कम मात्रा में मीथेन (Methane) का पता लगाया है।
पृथ्वी पर मीथेन का निर्माण जैविक और भूगर्भीय दोनों प्रक्रियाओं से हो सकता है। इसलिए मंगल पर मीथेन की उपस्थिति अभी भी वैज्ञानिकों के लिए एक रहस्य बनी हुई है और इस पर निरंतर शोध जारी है।
4. Perseverance Rover का मिशन
NASA का Perseverance Rover वर्तमान में Jezero Crater का अध्ययन कर रहा है, जहाँ कभी एक विशाल झील और नदी का डेल्टा मौजूद था।
इस मिशन का मुख्य उद्देश्य—
- प्राचीन सूक्ष्मजीवी जीवन (Ancient Microbial Life) के संकेत खोजाना।
- चट्टानों और मिट्टी के नमूने एकत्र करना।
- भविष्य में उन्हें पृथ्वी पर लाकर विस्तृत प्रयोगशाला परीक्षण करना है।
5. वर्तमान परिस्थितियाँ
आज का मंगल जीवन के लिए अत्यंत कठोर वातावरण प्रस्तुत करता है—
- अत्यंत पतला वातावरण
- बहुत कम वायुदाब
- अत्यधिक ठंड
- तीव्र पराबैंगनी (UV) तथा अंतरिक्षीय विकिरण
- सतह पर स्थायी तरल जल का अभाव
इन परिस्थितियों में वर्तमान सतह पर जीवन की संभावना बहुत कम मानी जाती है। फिर भी वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि कहीं जीवन मौजूद हो, तो वह भूमिगत (Subsurface) क्षेत्रों में सूक्ष्मजीवों के रूप में हो सकता है।
वैज्ञानिक महत्व
मंगल पर जीवन की खोज का उद्देश्य केवल यह जानना नहीं है कि वहाँ जीवन था या नहीं, बल्कि यह समझना भी है कि—
- जीवन की उत्पत्ति किन परिस्थितियों में होती है।
- क्या पृथ्वी के अलावा अन्य ग्रहों पर भी जीवन संभव है।
- भविष्य में मानव मंगल पर सुरक्षित रूप से रह सकता है या नहीं।
अब तक मंगल ग्रह पर जीवन का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिला है, लेकिन प्राचीन जल, कार्बनिक अणुओं, मीथेन गैस तथा प्राचीन झीलों के प्रमाण यह संकेत देते हैं कि अरबों वर्ष पहले वहाँ सूक्ष्मजीवों के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ मौजूद हो सकती थीं। इसी कारण मंगल आज भी जीवन की खोज के लिए वैज्ञानिकों का सबसे महत्वपूर्ण ग्रह बना हुआ है।
मंगल ग्रह के प्रमुख अंतरिक्ष मिशन
मंगल ग्रह मानव जाति के लिए सबसे अधिक अध्ययन किए जाने वाले ग्रहों में से एक है। पिछले कई दशकों में NASA, ISRO, ESA, Soviet Union (USSR), China (CNSA) और UAE सहित कई देशों ने मंगल की कक्षा, सतह, वातावरण, जल तथा जीवन की संभावनाओं का अध्ययन करने के लिए अनेक सफल मिशन भेजे हैं। इन अभियानों ने मंगल के बारे में हमारी वैज्ञानिक समझ को अत्यधिक बढ़ाया है।




1. मेरिनर मिशन (Mariner Missions)
1960 के दशक में NASA ने Mariner श्रृंखला के मिशन भेजे। इनमें Mariner 4 (1965) पहला सफल अंतरिक्ष यान था जिसने मंगल के निकट से उड़ान भरकर उसकी पहली स्पष्ट तस्वीरें पृथ्वी पर भेजीं। बाद में Mariner 9 (1971) मंगल की कक्षा में प्रवेश करने वाला विश्व का पहला अंतरिक्ष यान बना और उसने पूरे ग्रह का विस्तृत मानचित्र तैयार किया।
2. वाइकिंग मिशन (Viking Mission)
Viking 1 और Viking 2 मिशन 1976 में मंगल पर सफलतापूर्वक उतरे। ये मंगल की सतह पर सफलतापूर्वक कार्य करने वाले पहले लैंडर थे। इन्होंने मिट्टी का विश्लेषण किया, वातावरण का अध्ययन किया तथा जीवन की संभावनाओं से जुड़े प्रारंभिक वैज्ञानिक प्रयोग किए।
3. स्पिरिट और ऑपर्च्युनिटी रोवर
Spirit (2004) और Opportunity (2004) रोवरों ने मंगल की सतह पर कई वर्षों तक कार्य किया। विशेष रूप से Opportunity ने जल से बने खनिजों के महत्वपूर्ण प्रमाण खोजे और लगभग 15 वर्षों तक सक्रिय रहकर अपेक्षा से कहीं अधिक समय तक वैज्ञानिक जानकारी भेजी।
4. क्यूरियोसिटी रोवर (Curiosity)
Curiosity Rover को 2012 में Gale Crater में उतारा गया। इसका मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना था कि क्या मंगल पर कभी जीवन के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ थीं। इस मिशन ने प्राचीन झीलों, कार्बनिक अणुओं (Organic Molecules) और मीथेन गैस के महत्वपूर्ण प्रमाण खोजे।
5. पर्सिवरेंस रोवर (Perseverance)
Perseverance Rover को 2021 में Jezero Crater में उतारा गया। यह वर्तमान में प्राचीन जीवन के संकेतों की खोज कर रहा है तथा चट्टानों और मिट्टी के नमूने एकत्र कर रहा है, जिन्हें भविष्य में पृथ्वी पर लाने की योजना है।
6. मंगलयान (Mars Orbiter Mission)
भारत के ISRO ने 5 नवम्बर 2013 को मंगलयान (Mars Orbiter Mission) प्रक्षेपित किया। यह 24 सितम्बर 2014 को सफलतापूर्वक मंगल की कक्षा में पहुँचा।
मंगलयान की प्रमुख उपलब्धियाँ—
- भारत पहली ही कोशिश में मंगल की कक्षा में पहुँचने वाला विश्व का पहला देश बना।
- एशिया का पहला सफल मंगल मिशन।
- कम लागत में सफल मिशन होने के कारण इसे विश्वभर में सराहा गया।
- इसने मंगल की सतह, वातावरण और मीथेन गैस के अध्ययन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
7. तियानवेन-1 (Tianwen-1)
चीन की अंतरिक्ष एजेंसी CNSA ने 2021 में Tianwen-1 मिशन के माध्यम से मंगल की कक्षा, लैंडर और Zhurong Rover को सफलतापूर्वक संचालित किया। इससे चीन मंगल पर सफलतापूर्वक रोवर उतारने वाला दूसरा देश बना।
8. होप प्रोब (Hope Probe)
संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का Hope Probe भी 2021 में मंगल की कक्षा में पहुँचा। इसका मुख्य उद्देश्य मंगल के वातावरण और जलवायु का अध्ययन करना है।
वैज्ञानिक महत्व
मंगल मिशनों ने वैज्ञानिकों को—
- मंगल की सतह और भूगर्भीय संरचना समझने में सहायता दी।
- प्राचीन जल के प्रमाण खोजने में सफलता दिलाई।
- वातावरण और जलवायु के विकास का अध्ययन करने में मदद की।
- भविष्य के मानव अभियानों की तैयारी के लिए आवश्यक जानकारी प्रदान की।
मंगल ग्रह पर भेजे गए अंतरिक्ष मिशनों ने मानव ज्ञान में अभूतपूर्व वृद्धि की है। Mariner, Viking, Curiosity, Perseverance, Mangalyaan, Tianwen-1 और Hope Probe जैसे अभियानों ने मंगल के इतिहास, वातावरण, जल तथा संभावित जीवन के बारे में महत्वपूर्ण वैज्ञानिक जानकारी प्रदान की है। भविष्य में Mars Sample Return और मानव मिशनों के माध्यम से मंगल के और भी अनेक रहस्यों से पर्दा उठने की उम्मीद है।
इसरो का मंगलयान (Mars Orbiter Mission – MOM)
मंगलयान (Mars Orbiter Mission – MOM) भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) का पहला अंतरग्रहीय (Interplanetary) मिशन था। इसका उद्देश्य मंगल ग्रह की कक्षा में पहुँचकर उसके वातावरण, सतह, खनिजों तथा मीथेन गैस का अध्ययन करना था। इस मिशन की सफलता ने भारत को अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में विश्व की अग्रणी शक्तियों में शामिल कर दिया।





मिशन का परिचय
- मिशन का नाम: Mars Orbiter Mission (MOM)
- लोकप्रिय नाम: मंगलयान
- अंतरिक्ष एजेंसी: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO)
- प्रक्षेपण तिथि: 5 नवम्बर 2013
- प्रक्षेपण स्थल: सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा
- प्रक्षेपण यान: PSLV-C25
- मंगल की कक्षा में प्रवेश: 24 सितम्बर 2014
मिशन के उद्देश्य
मंगलयान के प्रमुख उद्देश्य थे—
- मंगल के वातावरण का अध्ययन करना।
- मंगल की सतह और स्थलाकृति (Topography) का अवलोकन करना।
- मीथेन गैस (Methane) की खोज करना।
- खनिजों एवं सतही संरचनाओं का अध्ययन करना।
- भविष्य के अंतरग्रहीय अभियानों के लिए आवश्यक तकनीकों का परीक्षण करना।
प्रमुख वैज्ञानिक उपकरण (Payloads)
मंगलयान में पाँच वैज्ञानिक उपकरण लगाए गए थे—
- Mars Colour Camera (MCC) – मंगल की रंगीन तस्वीरें लेने के लिए।
- Methane Sensor for Mars (MSM) – मीथेन गैस की खोज के लिए।
- Thermal Infrared Imaging Spectrometer (TIS) – सतह के तापमान और खनिजों का अध्ययन।
- Lyman Alpha Photometer (LAP) – हाइड्रोजन और ड्यूटेरियम का अध्ययन।
- Mars Exospheric Neutral Composition Analyser (MENCA) – मंगल के ऊपरी वातावरण का विश्लेषण।
मंगलयान की प्रमुख उपलब्धियाँ
- भारत पहले ही प्रयास में मंगल की कक्षा में पहुँचने वाला विश्व का पहला देश बना।
- भारत एशिया का पहला देश बना जिसने सफलतापूर्वक मंगल मिशन पूरा किया।
- यह अपने समय के सबसे कम लागत वाले मंगल मिशनों में से एक था।
- मंगलयान ने मंगल की हजारों उच्च गुणवत्ता वाली रंगीन तस्वीरें भेजीं।
- इस मिशन ने मंगल के वातावरण और सतह के बारे में महत्वपूर्ण वैज्ञानिक आँकड़े उपलब्ध कराए।
मिशन की अवधि
मंगलयान को प्रारंभ में 6 महीने तक कार्य करने के लिए डिज़ाइन किया गया था, लेकिन यह अपेक्षा से कहीं अधिक समय तक सक्रिय रहा। लगभग आठ वर्षों तक इसने वैज्ञानिक आँकड़े भेजे। वर्ष 2022 में ईंधन समाप्त होने और बैटरी से संबंधित समस्याओं के कारण मिशन समाप्त घोषित किया गया।
मंगलयान का महत्व
मंगलयान केवल एक वैज्ञानिक मिशन नहीं था, बल्कि भारत की तकनीकी क्षमता का भी प्रतीक बना। इसने यह सिद्ध किया कि सीमित संसाधनों और कम लागत में भी जटिल अंतरग्रहीय मिशन सफलतापूर्वक पूरे किए जा सकते हैं। इस मिशन से प्राप्त अनुभव भविष्य के भारतीय ग्रह अभियानों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ।
मंगलयान (Mars Orbiter Mission) भारतीय अंतरिक्ष इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। 5 नवम्बर 2013 को प्रक्षेपित और 24 सितम्बर 2014 को मंगल की कक्षा में पहुँचा यह मिशन भारत को अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में नई पहचान दिलाने में सफल रहा। इसकी वैज्ञानिक उपलब्धियों और तकनीकी सफलता ने भारत को विश्व के प्रमुख अंतरिक्ष राष्ट्रों की श्रेणी में स्थापित किया।
NASA के प्रमुख मंगल मिशन
NASA (National Aeronautics and Space Administration) ने पिछले छह दशकों में मंगल ग्रह के अध्ययन के लिए अनेक सफल अंतरिक्ष मिशन भेजे हैं। इन अभियानों ने मंगल की सतह, वातावरण, जल, भूगर्भीय संरचना और जीवन की संभावनाओं के बारे में महत्वपूर्ण वैज्ञानिक जानकारी प्रदान की है।




1. मेरिनर मिशन (Mariner Program)
- NASA का Mariner Program मंगल ग्रह के लिए भेजा गया पहला सफल मिशन था —
- Mariner 4 (1965): मंगल के निकट पहुँचने वाला पहला सफल अंतरिक्ष यान, जिसने मंगल की पहली क्लोज़-अप तस्वीरें पृथ्वी पर भेजीं।
- Mariner 6 और Mariner 7 (1969): मंगल की सतह और वातावरण का विस्तृत अध्ययन किया।
- Mariner 9 (1971): मंगल की कक्षा में प्रवेश करने वाला विश्व का पहला अंतरिक्ष यान बना और पूरे ग्रह का मानचित्र तैयार किया।
2. वाइकिंग मिशन (Viking 1 और Viking 2)
1975 में प्रक्षेपित और 1976 में मंगल पर पहुँचे Viking 1 और Viking 2 इतिहास के पहले सफल मंगल लैंडर थे।
इनकी प्रमुख उपलब्धियाँ—
- मंगल की सतह की पहली स्पष्ट रंगीन तस्वीरें।
- मिट्टी और वातावरण का विश्लेषण।
- जीवन की संभावना से जुड़े वैज्ञानिक प्रयोग।
- मौसम संबंधी आँकड़ों का संग्रह।
3. मार्स पाथफाइंडर (Mars Pathfinder)
1997 में NASA का Mars Pathfinder सफलतापूर्वक मंगल पर उतरा।
इसके साथ Sojourner Rover भेजा गया, जो मंगल पर चलने वाला पहला सफल रोवर था। इस मिशन ने कम लागत वाले रोवर अभियानों का मार्ग प्रशस्त किया।
4. स्पिरिट और ऑपर्च्युनिटी (Spirit & Opportunity)
2004 में NASA ने दो रोवर भेजे—
- Spirit Rover
- Opportunity Rover
इनका उद्देश्य प्राचीन जल के प्रमाण खोजने का था।
Opportunity Rover ने लगभग 15 वर्षों तक कार्य किया और जल से बने खनिजों के महत्वपूर्ण प्रमाण खोजे।
5. मार्स रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर (Mars Reconnaissance Orbiter – MRO)
2006 में मंगल की कक्षा में पहुँचा यह ऑर्बिटर आज भी सक्रिय है।
इसकी उपलब्धियाँ—
- मंगल की उच्च-रिज़ॉल्यूशन तस्वीरें।
- संभावित लैंडिंग स्थलों की पहचान।
- जल-बर्फ और खनिजों का अध्ययन।
- भविष्य के मिशनों के लिए संचार सहायता।
6. क्यूरियोसिटी रोवर (Curiosity Rover)
2012 में Gale Crater में उतरा Curiosity Rover NASA के सबसे सफल मंगल मिशनों में से एक है।
मुख्य उपलब्धियाँ—
- प्राचीन झीलों के प्रमाण।
- कार्बनिक अणुओं (Organic Molecules) की खोज।
- मीथेन गैस में मौसमी परिवर्तन का अध्ययन।
- मंगल की रहने योग्य प्राचीन परिस्थितियों के प्रमाण।
7. इनसाइट मिशन (InSight)
2018 में NASA का InSight Lander मंगल पर उतरा।
इसका उद्देश्य मंगल के आंतरिक भाग का अध्ययन करना था।
इस मिशन ने—
- पहली बार Marsquakes (मंगल भूकंप) दर्ज किए।
- मंगल के क्रोड (Core), मैंटल (Mantle) और भूपर्पटी (Crust) के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की।
8. पर्सिवरेंस रोवर (Perseverance Rover)
18 फरवरी 2021 को Jezero Crater में सफलतापूर्वक उतरा।
इस मिशन का उद्देश्य—
- प्राचीन सूक्ष्मजीवी जीवन के प्रमाण खोजना।
- चट्टानों और मिट्टी के नमूने एकत्र करना।
- भविष्य के Mars Sample Return Mission की तैयारी करना।
इसके साथ भेजा गया Ingenuity Helicopter किसी दूसरे ग्रह पर नियंत्रित उड़ान भरने वाला दुनिया का पहला हेलीकॉप्टर बना।
NASA के मंगल मिशनों का महत्व
NASA के मंगल मिशनों ने वैज्ञानिकों को—
- मंगल के भूगर्भीय इतिहास को समझने में सहायता दी।
- प्राचीन जल के प्रमाण खोजने में सफलता दिलाई।
- जीवन की संभावनाओं का अध्ययन करने का अवसर दिया।
- भविष्य के मानव मंगल मिशनों की योजना बनाने में महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध करा
NASA ने Mariner, Viking, Pathfinder, Spirit, Opportunity, Mars Reconnaissance Orbiter, Curiosity, InSight और Perseverance जैसे अनेक सफल अभियानों के माध्यम से मंगल ग्रह के बारे में मानव ज्ञान को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है। इन मिशनों से प्राप्त वैज्ञानिक जानकारी भविष्य में मंगल पर मानव की उपस्थिति और जीवन की खोज के लिए आधार तैयार कर रही है।
मंगल ग्रह से जुड़े रोचक वैज्ञानिक तथ्य
मंगल ग्रह सौरमंडल के सबसे रहस्यमय ग्रहों में से एक है। इसके बारे में कई ऐसे वैज्ञानिक तथ्य हैं जो इसे अन्य ग्रहों से अलग और अत्यंत रोचक बनाते हैं।




1. मंगल को “लाल ग्रह” कहा जाता है
मंगल की सतह पर बड़ी मात्रा में लौह ऑक्साइड (Iron Oxide) होने के कारण यह लाल रंग का दिखाई देता है। यही पदार्थ पृथ्वी पर जंग (Rust) बनने का भी कारण है।
2. सौरमंडल का सबसे बड़ा ज्वालामुखी
मंगल पर स्थित Olympus Mons सौरमंडल का सबसे बड़ा ज्ञात ज्वालामुखी है। इसकी ऊँचाई लगभग 22 किलोमीटर है, जो माउंट एवरेस्ट से लगभग ढाई गुना अधिक है।
3. सबसे विशाल घाटी
मंगल पर स्थित Valles Marineris लगभग 4,000 किलोमीटर लंबी और 7 किलोमीटर तक गहरी घाटी प्रणाली है, जो सौरमंडल की सबसे बड़ी ज्ञात घाटियों में से एक है।
4. मंगल पर सूर्यास्त नीला दिखाई देता है
पृथ्वी पर सूर्यास्त लाल या नारंगी दिखाई देता है, लेकिन मंगल पर धूल के अत्यंत सूक्ष्म कणों के कारण सूर्यास्त के समय सूर्य के आसपास का आकाश नीला दिखाई देता है। यह मंगल की सबसे अनोखी विशेषताओं में से एक है।
5. मंगल पर एक दिन लगभग पृथ्वी जैसा है
मंगल का एक दिन (सोल) 24 घंटे 37 मिनट 22 सेकंड का होता है, जो पृथ्वी के दिन से केवल लगभग 37 मिनट अधिक है।
6. मंगल के दो छोटे उपग्रह हैं
मंगल के दो प्राकृतिक उपग्रह हैं—
- फोबोस (Phobos)
- डीमोस (Deimos)
फोबोस धीरे-धीरे मंगल के करीब आ रहा है और भविष्य में उसके टूटकर वलय (Ring) बनाने या उससे टकराने की संभावना है।
7. मंगल पर धूल भरी विशाल आँधियाँ
मंगल पर कभी-कभी इतनी विशाल धूल भरी आँधियाँ चलती हैं कि वे पूरे ग्रह को कई सप्ताह या महीनों तक ढक सकती हैं।
8. मंगल पर प्राचीन जल के प्रमाण
सूखी नदी घाटियाँ, झीलों के डेल्टा, जल से बने खनिज और ध्रुवीय बर्फ इस बात के मजबूत प्रमाण हैं कि अरबों वर्ष पहले मंगल पर बड़ी मात्रा में तरल जल मौजूद था।
9. मंगल पर पृथ्वी जैसी ऋतुएँ
मंगल का अक्षीय झुकाव लगभग 25.2° है, इसलिए वहाँ भी पृथ्वी की तरह चार ऋतुएँ आती हैं। हालांकि मंगल का वर्ष लंबा होने के कारण प्रत्येक ऋतु अधिक समय तक रहती है।
10. मंगल पर भविष्य में मानव मिशन
NASA, ESA और अन्य अंतरिक्ष एजेंसियाँ भविष्य में मनुष्यों को मंगल पर भेजने की योजना पर कार्य कर रही हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि भविष्य में मंगल मानव अन्वेषण का सबसे महत्वपूर्ण ग्रह बन सकता है।
मंगल ग्रह अपने विशाल ज्वालामुखियों, गहरी घाटियों, लाल सतह, ध्रुवीय बर्फ, प्राचीन जल के प्रमाण और भविष्य के मानव अभियानों की संभावनाओं के कारण सौरमंडल का सबसे आकर्षक ग्रह माना जाता है। यही कारण है कि आज भी विश्व की प्रमुख अंतरिक्ष एजेंसियाँ मंगल पर लगातार नए मिशन भेज रही हैं।
पुस्तक संदर्भ (Books)
- Chaisson, Eric & McMillan, Steve
Astronomy Today (9th Edition)
Cengage Learning, 2018. - Seeds, Michael A. & Backman, Dana E.
Foundations of Astronomy (14th Edition)
Cengage Learning, 2019. - Freedman, Roger A. & Kaufmann, William J.
Universe (11th Edition)
W. H. Freeman & Company, 2019. - Hartmann, William K.
A Traveler’s Guide to Mars: The Mysterious Landscapes of the Red Planet
Workman Publishing, 2003. - Carr, Michael H.
The Surface of Mars
Cambridge University Press, 2006. - Kieffer, Hugh H. et al.
Mars
University of Arizona Press, 1992. - Barlow, Nadine G.
Mars: An Introduction to its Interior, Surface and Atmosphere
Cambridge University Press, 2008. - Beatty, J. Kelly, Petersen, Carolyn Collins & Chaikin, Andrew (Editors)
The New Solar System (7th Edition)
Cambridge University Press, 2010.
वैज्ञानिक एवं आधिकारिक स्रोत (Online References)
- NASA – Mars Exploration Program
- NASA Solar System Exploration – Mars
- ESA (European Space Agency) – Mars Express
- ISRO – Mars Orbiter Mission (Mangalyaan)
- USGS Astrogeology Science Center
- Encyclopaedia Britannica – Mars
NASA
ISRO
- ISRO Mars Orbiter Mission (Mangalyaan)
- ISRO Mars Orbiter Mission Overview
- ISRO Mars Orbiter Mission Profile
- ISRO MOM FAQ
इन आधिकारिक स्रोतों में मंगल ग्रह के बारे में वैज्ञानिक जानकारी, मंगलयान, सतह, वातावरण, मिशन, ऑर्बिट, उपकरण आदि का विस्तृत विवरण उपलब्ध है।
मंगल (Mars) का इतिहास, वैदिक साहित्य एवं पौराणिक महत्व — भाग 1

