गोवर्धन पूजा 2026 (अन्नकूट): महत्व और इतिहास
दीपावली के भव्य उत्सव के ठीक अगले दिन, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को ‘गोवर्धन पूजा’ का पावन पर्व मनाया जाता है। देश के कई हिस्सों में इसे ‘अन्नकूट’ (Annakut) के नाम से भी जाना जाता है। सनातन धर्म में यह एक अत्यंत अनूठा और विशुद्ध रूप से ‘प्रकृति-प्रेम’ का त्योहार है, जो पूरी तरह से पर्यावरण, कृषि और पशुधन (विशेषकर गौ माता) को समर्पित है।
पर्व का महत्व (Significance): गोवर्धन पूजा केवल एक पारंपरिक धार्मिक कर्मकांड नहीं है, बल्कि यह मनुष्य और प्रकृति के बीच के अटूट संबंध और कृतज्ञता (Gratitude) का सबसे बड़ा प्रतीक है। इस दिन गोवर्धन पर्वत और गायों की पूजा इसलिए की जाती है, क्योंकि यही हमारे जीवन, स्वास्थ्य और आजीविका का मुख्य आधार हैं। आज के आधुनिक युग में यह पर्व हमें यह महत्वपूर्ण संदेश देता है कि हमें उस प्रकृति और पर्यावरण का सम्मान व संरक्षण करना चाहिए, जो हमारा भरण-पोषण करती है।
इतिहास और शुरुआत (History): गोवर्धन पूजा का इतिहास द्वापर युग और भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। पौराणिक काल में ब्रजवासी (मथुरा-वृंदावन के लोग) अच्छी बारिश की कामना से वर्षा के देवता देवराज इंद्र की पूजा किया करते थे, जिसके पीछे श्रद्धा से अधिक इंद्र के प्रकोप का ‘भय’ होता था।
भगवान श्रीकृष्ण ने इस भय-आधारित परंपरा को बदला। उन्होंने ब्रजवासियों को समझाया कि इंद्र केवल अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं, लेकिन वास्तविक पालनहार ‘गोवर्धन पर्वत’ है। गोवर्धन पर्वत की वनस्पतियां, जल और घास ही हमारी गायों का पेट भरते हैं, जिससे हमें दूध, दही और मक्खन प्राप्त होता है। इसलिए, हमें इंद्र की नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष रूप से लाभ देने वाले गोवर्धन पर्वत और गौ माता की पूजा करनी चाहिए। श्रीकृष्ण के इसी क्रांतिकारी विचार से गोवर्धन पूजा की शुरुआत हुई।
‘अन्नकूट’ का अर्थ: इस दिन से ब्रज में ‘अन्नकूट’ की भव्य परंपरा का भी आरंभ हुआ। ‘अन्नकूट’ का शाब्दिक अर्थ है— ‘अन्न का पहाड़’ (Mountain of Food)। गोवर्धन नाथ के प्रति अपनी अगाध श्रद्धा प्रकट करने के लिए भक्तजन विभिन्न प्रकार के सात्विक पकवान, मिठाइयां और अनाज बनाकर उसे पर्वत के आकार में सजाते हैं और भगवान को ‘छप्पन भोग’ के रूप में अर्पित करते हैं।
गोवर्धन पूजा 2026: सही तिथि और शुभ मुहूर्त
सनातन हिंदू पंचांग (कैलेंडर) के अनुसार, गोवर्धन पूजा का पावन पर्व हर साल दीपावली के ठीक अगले दिन, यानी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि (Pratipada Tithi) को मनाया जाता है।
वर्ष 2026 में दीपावली 8 नवंबर को मनाई जाएगी, इसलिए गोवर्धन पूजा (अन्नकूट) का आयोजन 9 नवंबर 2026 (सोमवार) को किया जाएगा। किसी भी पूजा का पूर्ण और अचूक फल प्राप्त करने के लिए उसे शास्त्र-सम्मत शुभ मुहूर्त में ही संपन्न करना चाहिए।
गोवर्धन पूजा 2026 के लिए पंचांग के अनुसार शुभ मुहूर्त और तिथियों का विवरण इस प्रकार है:
महत्वपूर्ण तिथियां और समय (पंचांग अनुसार):
- गोवर्धन पूजा की तिथि: 9 नवंबर 2026, सोमवार
- प्रतिपदा तिथि का आरंभ: 8 नवंबर 2026, रात्रि लगभग 11:25 बजे से
- प्रतिपदा तिथि की समाप्ति: 9 नवंबर 2026, रात्रि लगभग 09:40 बजे तक (चूंकि उदया तिथि 9 नवंबर को प्राप्त हो रही है, इसलिए गोवर्धन पूजा इसी दिन मान्य होगी।)
गोवर्धन पूजा के शुभ मुहूर्त (Shubh Muhurat): गोवर्धन पूजा मुख्य रूप से दिन में दो बार— प्रात:काल (सुबह) और सायं काल (शाम) के समय की जाती है। आप अपनी सुविधा अनुसार किसी भी एक मुहूर्त में पूजा संपन्न कर सकते हैं:
- प्रातः काल पूजा का शुभ मुहूर्त (Morning Puja Time): सुबह 06:35 बजे से 08:50 बजे तक। (यह समय उन लोगों के लिए सर्वोत्तम है जो ब्रह्म मुहूर्त के बाद स्नान करके ताजी और शुद्ध ऊर्जा के साथ भगवान की आराधना करना चाहते हैं।)
- सायं काल पूजा का शुभ मुहूर्त (Evening Puja Time): दोपहर 03:20 बजे से शाम 05:35 बजे तक। (पारंपरिक रूप से कई घरों और मंदिरों में गोवर्धन पूजा दोपहर के बाद गोधूलि बेला के आस-पास की जाती है, क्योंकि इसी समय श्रीकृष्ण गायों को चराकर वापस लौटते थे।)
विशेष नोट: चूँकि स्थान और शहर के अक्षांश-देशांतर (Latitude-Longitude) के अनुसार सूर्योदय और सूर्यास्त के समय में कुछ मिनटों का अंतर आ जाता है, इसलिए अपने शहर के स्थानीय पंचांग के अनुसार मुहूर्त के समय में 5 से 10 मिनट का मामूली बदलाव हो सकता है। पूजा हमेशा स्थिर लग्न और राहुकाल को टालकर ही करनी चाहिए।
कथा: श्रीकृष्ण ने कैसे तोड़ा इंद्र का अहंकार?
गोवर्धन पूजा का पूरा पर्व द्वापर युग की उस अद्भुत लीला पर आधारित है, जब भगवान श्रीकृष्ण ने देवराज इंद्र के मिथ्या अंहकार को चूर-चूर कर दिया था। विष्णु पुराण और श्रीमद्भागवत पुराण में इस कथा का अत्यंत सजीव वर्णन मिलता है।
इंद्र की पूजा और भय का वातावरण: कथा के अनुसार, ब्रजभूमि में हर साल अच्छी वर्षा और उत्तम फसल के लिए देवराज इंद्र की भव्य पूजा का आयोजन होता था। ब्रजवासियों के मन में यह भय व्याप्त था कि यदि इंद्र की पूजा नहीं की गई, तो वे क्रोधित होकर वर्षा रोक देंगे और ब्रज में अकाल पड़ जाएगा।
जब बालकृष्ण ने यह देखा, तो उन्होंने नंदबाबा और अन्य ग्रामवासियों को समझाया कि जल बरसाना तो इंद्र का प्राकृतिक कर्तव्य है। हमारा वास्तविक पालनहार तो ‘गोवर्धन पर्वत’ है, जहां से हमारी गायों को चारा मिलता है और हमें जीवनदायिनी जड़ी-बूटियां प्राप्त होती हैं। कान्हा के तर्कों से सहमत होकर पूरे ब्रज ने इंद्र की पूजा रोक दी और गोवर्धन पर्वत की पूजा आरंभ कर दी।
इंद्र का क्रोध और प्रलयंकारी वर्षा: अपनी पूजा बंद होते देख देवराज इंद्र का अहंकार आहत हो गया। उन्होंने इसे अपना घोर अपमान समझा और ब्रजवासियों को दंडित करने का निश्चय किया। इंद्र ने ‘सांवर्तक’ नामक प्रलयंकारी मेघों को ब्रजमंडल पर मूसलाधार बारिश करने का आदेश दे दिया। भयानक आंधी, तूफान और बाढ़ से पूरे ब्रज में हाहाकार मच गया। ब्रजवासी अपने प्राण और पशुधन बचाने के लिए त्राहि-त्राहि करने लगे।
कनिष्ठा उंगली पर गोवर्धन धारण: अपने भक्तों की रक्षा के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने एक चमत्कारिक लीला रची। उन्होंने विशाल गोवर्धन पर्वत को अपने बाएं हाथ की सबसे छोटी उंगली (कनिष्ठा) पर छाते की तरह उठा लिया। सभी ब्रजवासियों, ग्वालों, गोपियों और गायों ने उस पर्वत के नीचे शरण ली। सुदर्शन चक्र ने पर्वत के ऊपर रहकर पानी को अंदर आने से रोका और शेषनाग ने मेड़ बनकर पानी को बाहर ही रोक दिया।
अहंकार का नाश और क्षमा याचना: लगातार सात दिन और सात रात तक भीषण वर्षा होती रही, लेकिन श्रीकृष्ण अपनी जगह से टस से मस नहीं हुए और ब्रजवासियों का बाल भी बांका नहीं हुआ। अंततः सातवें दिन इंद्र का सारा जल और शक्ति समाप्त हो गई। उन्हें यह अहसास हो गया कि गोवर्धन उठाने वाला यह बालक कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि साक्षात परमब्रह्म परमात्मा है। इंद्र का सारा अंहकार टूट गया। उन्होंने तुरंत वर्षा रोकी, धरती पर उतरे और भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में गिरकर अपने अपराध की क्षमा मांगी।
उसी दिन से इंद्र के अहंकार की हार और प्रकृति (गोवर्धन पर्वत) की जीत के प्रतीक के रूप में यह गोवर्धन पूजा का पावन पर्व मनाया जाने लगा।
अन्नकूट और 56 भोग का विशेष महत्व
गोवर्धन पूजा को पूरे भारत में ‘अन्नकूट’ (Annakut) के नाम से भी जाना जाता है। अन्नकूट का शाब्दिक अर्थ है— ‘अन्न का पहाड़’ (Mountain of Food)। इस पर्व में भगवान गोवर्धन नाथ और श्रीकृष्ण को प्रकृति से प्राप्त नए अनाज और सब्जियों का भोग लगाया जाता है, जिसे ’56 भोग’ (Chhappan Bhog) कहा जाता है।
56 भोग का गणित और रहस्य: भगवान श्रीकृष्ण को ठीक छप्पन (56) प्रकार के ही व्यंजन क्यों अर्पित किए जाते हैं, इसके पीछे एक अत्यंत तार्किक और भावपूर्ण पौराणिक कथा है। माता यशोदा बालकृष्ण को दिन में आठ प्रहर (आठ बार) भोजन कराती थीं। जब इंद्र के प्रकोप से ब्रज को बचाने के लिए श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा उंगली पर उठाया, तो उन्होंने लगातार सात दिन और सात रात तक कुछ भी खाया-पीया नहीं था।
जब आठवें दिन वर्षा रुकी और संकट टला, तो ब्रजवासियों को यह सोचकर बहुत कष्ट हुआ कि उनके कान्हा ने सात दिन से कुछ नहीं खाया है। तब पूरे ब्रज ने मिलकर भगवान की सात दिनों की भूख की भरपाई करने के लिए (7 दिन × 8 प्रहर = 56) कुल छप्पन प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन बनाए और उन्हें गोवर्धन पर्वत के समक्ष एक विशाल पहाड़ (अन्नकूट) के रूप में अर्पित किया।
अन्नकूट में क्या-क्या शामिल होता है? इस दिन बनने वाला भोजन पूर्णतः सात्विक होता है, जिसमें प्याज, लहसुन या किसी भी तामसिक वस्तु का प्रयोग वर्जित है। छप्पन भोग में मुख्य रूप से निम्नलिखित व्यंजन शामिल होते हैं:
- अन्न और दालें: चावल, बाजरा, गेहूं की रोटियां, मूंग और उड़द की दाल।
- कढ़ी और मिश्रित सब्जी: अन्नकूट की सबसे प्रमुख डिश ‘मिश्रित सब्जी’ (Mixed Veg) और बेसन की कढ़ी होती है। यह सब्जी कई प्रकार की ताजी मौसमी सब्जियों को मिलाकर बनाई जाती है।
- मिठाइयां और पकवान: मालपुआ, खीर, बूंदी के लड्डू, पेड़ा, माखन-मिश्री, पूरी, कचौड़ी, और पापड़।
- फल और मेवे: ऋतुफल (केला, सेब, अमरूद) और विभिन्न प्रकार के सूखे मेवे।
आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व: अन्नकूट प्रकृति के प्रति मनुष्य की कृतज्ञता का सबसे सुंदर रूप है। यह इस बात का प्रतीक है कि धरती माता हमें जो कुछ भी (अनाज, फल, सब्जियां) प्रदान करती हैं, उसका पहला अंश हम पूर्ण श्रद्धा के साथ ईश्वर को समर्पित करते हैं। सामाजिक दृष्टि से यह समानता और एकता का पर्व है, जहाँ समाज का हर वर्ग— अमीर हो या गरीब— एक साथ बैठकर भगवान का यह महाप्रसाद ग्रहण करता है।
गोवर्धन पूजा की संपूर्ण सामग्री लिस्ट
गोवर्धन पूजा को शास्त्र-सम्मत और विधि-विधान से संपन्न करने के लिए सही पूजन सामग्री का होना अत्यंत आवश्यक है। पूजा के समय किसी भी वस्तु की कमी न रहे, इसके लिए पहले से ही सभी आवश्यक चीजें एकत्रित कर लेना उत्तम रहता है।
भगवान गोवर्धन नाथ की पूजा के लिए आवश्यक सामग्री की विस्तृत सूची (Puja Samagri List) इस प्रकार है:
1. गोवर्धन पर्वत बनाने और सजाने के लिए:
- शुद्ध गाय का गोबर (यह सबसे मुख्य सामग्री है, जिससे गोवर्धन जी की मानव या पर्वतनुमा आकृति बनाई जाती है)
- विभिन्न प्रकार के ताजे फूल (गेंदा, गुलाब आदि) और फूलों की माला
- सजावट के लिए अबीर, गुलाल और सूखे रंग
- रूई (आंखें और आभूषण बनाने के लिए)
- गन्ने के कुछ टुकड़े (Sugarcane)
- सींक (झाड़ू की सींक या लकड़ी की छोटी तीलियां)
2. अभिषेक और पवित्रिकरण के लिए:
- गंगाजल (पूजा स्थल को पवित्र करने के लिए)
- पंचामृत का सामान (कच्चा दूध, दही, शुद्ध देसी घी, शहद और शक्कर)
- एक जल से भरा तांबे या पीतल का कलश
3. पूजा की थाली की सामग्री:
- रोली (कुमकुम), हल्दी और चंदन
- अक्षत (बिना टूटे हुए साबुत चावल)
- देसी घी का दीपक, रुई की बत्ती और माचिस
- धूपबत्ती (अगरबत्ती) और कपूर (आरती के लिए)
- लाल कलावा (रक्षासूत्र)
- भगवान को अर्पित करने के लिए नए वस्त्र या पीला कपड़ा
4. भोग और प्रसाद के लिए:
- अन्नकूट का प्रसाद (कढ़ी, चावल, मिश्रित सब्जी, बाजरा आदि)
- छप्पन भोग (यदि संभव हो) या सामर्थ्य अनुसार घर में बने सात्विक पकवान
- माखन-मिश्री (श्रीकृष्ण का अति प्रिय भोग)
- दीपावली की बची हुई खील, बताशे और खिलौने (खांड के बने)
- मौसमी फल (केला, सेब, अमरूद) और सूखे मेवे
- तुलसी दल (Tulsi Leaves): भगवान श्रीकृष्ण का कोई भी भोग तुलसी के पत्तों के बिना अधूरा माना जाता है, इसलिए इसे अवश्य शामिल करें।
इन सभी सामग्रियों को पूर्ण श्रद्धा और पवित्रता के साथ एकत्रित करें। यदि ‘छप्पन भोग’ बनाना संभव न हो, तो केवल अन्नकूट की सब्जी, कढ़ी-चावल और माखन-मिश्री का भोग लगाकर भी भगवान गोवर्धन नाथ को पूर्ण रूप से प्रसन्न किया जा सकता है।
गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाने की शास्त्र-सम्मत विधि
गोवर्धन पूजा का सबसे मुख्य और पारंपरिक अनुष्ठान गाय के शुद्ध गोबर से गोवर्धन पर्वत (या भगवान गोवर्धन नाथ की आकृति) बनाना है। सनातन धर्म में गौ माता के गोबर को अत्यंत पवित्र और सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत माना गया है। घर के आंगन या खुले स्थान पर इसे बनाने की एक विशेष और शास्त्र-सम्मत विधि है, जिसका पालन करने से घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।
गोवर्धन नाथ की आकृति बनाने की चरणबद्ध विधि इस प्रकार है:
- स्थान की शुद्धि: सबसे पहले घर के आंगन, छत या बालकनी में पूर्व (East) या उत्तर (North) दिशा की ओर एक साफ स्थान चुनें। उस जगह को झाड़ू से साफ करके वहां जल और गंगाजल का छिड़काव करें ताकि भूमि पवित्र हो जाए।
- आकृति का निर्माण: गोवर्धन जी की आकृति मुख्य रूप से लेटे हुए पुरुष (भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप) के रूप में बनाई जाती है। ताजे और शुद्ध गोबर से एक बड़ी मानव आकृति बनाएं। इसमें गोवर्धन जी का मुख, छाती, हाथ और पैर स्पष्ट रूप से बनाएं।
- नाभि (Navel) का विशेष महत्व: आकृति बनाते समय गोवर्धन जी की नाभि (पेट के मध्य) के स्थान पर एक छोटा सा गड्ढा बनाएं या वहां मिट्टी का एक दीया (या छोटी कटोरी) रख दें। पूजा के समय इसी कटोरी में कच्चा दूध, गंगाजल, खील और बताशे अर्पित किए जाते हैं।
- सजावट और शृंगार: आकृति बन जाने के बाद उसे सूखे रंगों (गुलाल, हल्दी, कुमकुम) से सजाएं। रूई (Cotton) का प्रयोग करके गोवर्धन जी की आंखें, कान और आभूषण (जैसे जनेऊ और मुकुट) बनाएं। गेंदे और गुलाब के ताजे फूलों की माला पहनाकर उनका पूर्ण शृंगार करें।
- गौ माता और ग्वाल-बाल: मुख्य गोवर्धन आकृति के आस-पास बचे हुए गोबर से छोटी-छोटी गाएं, बछड़े, ग्वाल-बाल, और गोपियों की प्रतीकात्मक आकृतियां भी बनाएं।
- गन्ना और सींक का प्रयोग: गोवर्धन जी के हाथों या उनके सिर के पास एक गन्ने (Sugarcane) का टुकड़ा अवश्य रखें। झाड़ू की सींक का प्रयोग करके उनके आस-पास एक बाड़ (Boundary) बनाएं, जो गोकुल गांव और गौशाला का प्रतीक होती है।
ध्यान रखने योग्य बात: यदि आप किसी बड़े शहर या फ्लैट में रहते हैं जहाँ गाय का गोबर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध नहीं है, तो आप एक छोटे से लकड़ी के पट्टे (चौकी) पर थोड़े से गोबर से केवल प्रतीकात्मक गोवर्धन पर्वत बना सकते हैं। भगवान कलाकारी नहीं, बल्कि आपके हृदय का सच्चा भाव देखते हैं।
घर पर गोवर्धन पूजा करने की चरणबद्ध और सरल विधि
गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत की सुंदर आकृति बनाने के बाद, शुभ मुहूर्त में पूर्ण विधि-विधान और भक्ति-भाव से उनकी पूजा की जाती है। यदि आप घर पर गोवर्धन पूजा कर रहे हैं, तो शास्त्र-सम्मत फल प्राप्ति के लिए इन आसान और क्रमानुसार चरणों (Steps) का पालन करें:
- स्नान और संकल्प: शुभ मुहूर्त (प्रातः या सायंकाल) से पहले स्नान कर लें। पूजा के लिए साफ और शुद्ध वस्त्र (अधिमानतः पीले, लाल या हल्के रंग के) धारण करें। पूजा स्थान पर गोवर्धन जी के सामने आसन बिछाकर बैठें और मन में पूजा का संकल्प लें।
- आवाहन और अभिषेक: भगवान श्रीकृष्ण, गोवर्धन नाथ और गौ माता का मानसिक ध्यान करते हुए उन्हें आमंत्रित करें। इसके बाद गोवर्धन जी की नाभि (जो आपने कटोरी या गड्ढे के रूप में बनाई है) में कच्चा दूध, गंगाजल, थोड़ा सा शहद और बताशे डालें।
- तिलक और पुष्प अर्पण: गोवर्धन पर्वत, भगवान श्रीकृष्ण और गौ माता की आकृतियों को रोली, हल्दी, चंदन और अक्षत (चावल) का तिलक लगाएं। इसके बाद उन पर ताजे फूल और गेंदे के फूलों की माला अर्पित करें।
- वस्त्र और रक्षासूत्र: भगवान को वस्त्र के रूप में कलावा (लाल धागा) अर्पित करें। गोवर्धन जी के चारों ओर सींक लगाकर जो बाड़ बनाई है, उस पर भी कलावा बांधें।
- दीपदान और धूप: भगवान के समक्ष शुद्ध देसी घी का दीपक प्रज्वलित करें और धूप या अगरबत्ती जलाकर वातावरण को सुगंधित और पवित्र करें।
- अन्नकूट और भोग अर्पण: अब भगवान को ‘अन्नकूट’ का महाप्रसाद अर्पित करें। इसमें कढ़ी, चावल, मिश्रित सब्जी, माखन-मिश्री, खीर, खील-बताशे और मिष्ठान शामिल करें। ध्यान रहे, किसी भी भोग में तुलसी दल (तुलसी का पत्ता) अवश्य डालें, अन्यथा भगवान कृष्ण भोग स्वीकार नहीं करते।
- जल धारा और परिक्रमा: एक लोटे में जल और थोड़ा सा कच्चा दूध लें। गोवर्धन जी की परिक्रमा शुरू करें। परिक्रमा करते समय लोटे से जल की एक अटूट धारा जमीन पर गिराते चलें और साथ में खील-बताशे भी बिखेरते रहें। (परिक्रमा हमेशा घड़ी की सुई की दिशा, यानी Clockwise की जाती है)।
- आरती और क्षमा याचना: परिक्रमा पूर्ण होने के बाद सपरिवार खड़े होकर कपूर या घी के दीपक से गोवर्धन नाथ और भगवान श्रीकृष्ण की आरती करें। अंत में, पूजा में हुई किसी भी भूल-चूक के लिए क्षमा मांगें और परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें।
भगवान गोवर्धन नाथ और श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने वाले शक्तिशाली वैदिक मंत्र
सनातन धर्म में किसी भी पूजा या अनुष्ठान के दौरान वैदिक मंत्रों के उच्चारण का विशेष महत्व है। मंत्रों की ध्वनि और तरंगों से पूजा स्थल पर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और भगवान शीघ्र प्रसन्न होकर अपना आशीर्वाद प्रदान करते हैं। गोवर्धन पूजा के दिन परिक्रमा, स्नान और भोग अर्पण करते समय इन शक्तिशाली सिद्ध मंत्रों का जाप करना अत्यंत फलदायी माना जाता है:
1. गोवर्धन नाथ का मुख्य प्रार्थना मंत्र: गोवर्धन पर्वत की पूजा करते समय और उन्हें भोग लगाते समय इस पवित्र मंत्र का उच्चारण अवश्य करना चाहिए:
“गोवर्धन धराधार गोकुल त्राणकारक। विष्णुबाहु कृतोच्छ्राय गवां कोटिप्रदो भव।।”
अर्थ: हे गोवर्धन पर्वत! आप पृथ्वी को धारण करने वाले और गोकुल के रक्षक हैं। भगवान विष्णु (श्रीकृष्ण) ने आपको अपनी भुजाओं पर उठाया था। आप मुझे करोड़ों गौओं (अर्थात अपार धन, सुख और समृद्धि) का आशीर्वाद प्रदान करें।
2. भगवान श्रीकृष्ण का क्लेशनाशक मंत्र: चूंकि गोवर्धन पर्वत साक्षात भगवान श्रीकृष्ण का ही स्वरूप हैं, इसलिए उनकी कृपा पाने और जीवन के सभी कष्टों को दूर करने के लिए इस मंत्र का जाप करें:
“ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणतः क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः।।”
अर्थ: हे कृष्ण! हे वासुदेव! हे परमात्मा! हे हरि! मैं आपके चरणों में प्रणाम करता हूँ। मेरे सभी शारीरिक और मानसिक क्लेशों (कष्टों) का नाश करें, हे गोविंद आपको बारंबार नमस्कार है।
3. गौ माता (सुरभि) पूजन मंत्र: गोवर्धन पूजा के दिन गायों की पूजा का विशेष विधान है। गौ माता को हरा चारा या ग्रास (भोजन) खिलाते समय इस मंत्र का स्मरण करें:
“सुरभि त्वं जगन्मातर्देवी विष्णुपदे स्थिता। सर्वदेवमये ग्रासं मया दत्तं इदं ग्रस।।”
अर्थ: हे जगन्माता सुरभि (गौ माता)! आप भगवान विष्णु के चरणों में निवास करती हैं और आपमें सभी देवताओं का वास है। मेरे द्वारा श्रद्धापूर्वक दिए गए इस ग्रास (भोजन) को कृपया स्वीकार करें।
मंत्र जाप के नियम:
- इन मंत्रों का जाप करते समय आपका मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए।
- यदि संस्कृत श्लोकों का उच्चारण करने में कठिनाई हो, तो आप निरंतर “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या “श्री कृष्ण शरणं मम” का मानसिक जाप करते हुए भी परिक्रमा और पूजा संपन्न कर सकते हैं। भाव शुद्ध होना मंत्रों के सटीक उच्चारण से भी अधिक महत्वपूर्ण है।
गोवर्धन परिक्रमा के नियम और तरीका
गोवर्धन पूजा में ‘परिक्रमा’ (Circumambulation) का सबसे अधिक महत्व माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, जो भी भक्त सच्चे मन से गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करता है, उसे साक्षात भगवान श्रीकृष्ण का आशीर्वाद मिलता है और उसके जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। घर पर गोबर से बनाए गए गोवर्धन जी की परिक्रमा करने के भी कुछ विशेष और अनिवार्य नियम हैं।
परिक्रमा करने का सही तरीका:
- दिशा (Direction): हिंदू धर्म में किसी भी देवी-देवता या पवित्र स्थल की परिक्रमा हमेशा घड़ी की सुई की दिशा (Clockwise) में की जाती है, जिसे ‘प्रदक्षिणा’ कहते हैं। इसका अर्थ है कि परिक्रमा करते समय गोवर्धन जी हमेशा आपके दाहिने हाथ (Right hand) की तरफ होने चाहिए।
- जल की अटूट धारा: परिक्रमा शुरू करने से पहले एक तांबे या पीतल के लोटे में शुद्ध जल और थोड़ा सा कच्चा दूध मिला लें। परिक्रमा करते समय इस लोटे से जल की एक पतली और अटूट धारा (Continuous stream) जमीन पर गिराते हुए चलें। यह जल धारा गोवर्धन जी की बाड़ के बाहर गिरनी चाहिए।
- खील-बताशे बिखेरना: जल की धारा के साथ-साथ परिवार के अन्य सदस्य (या आप स्वयं) दीपावली की खील (धान का लावा) और बताशे भी गोवर्धन जी के चारों ओर बिखेरते हुए चलें। यह भगवान को अर्पित किया जाने वाला मार्ग-प्रसाद माना जाता है।
कितनी बार करें परिक्रमा? आमतौर पर घर पर की जाने वाली पूजा में सपरिवार गोवर्धन नाथ की 4 या 7 बार परिक्रमा की जाती है। परिक्रमा हमेशा नंगे पैर ही करनी चाहिए। यदि आपके घर या फ्लैट में जगह बहुत कम है, तो आप अपनी जगह पर खड़े होकर ही गोल घूमकर (आत्म-प्रदक्षिणा) यह परिक्रमा पूरी कर सकते हैं।
मथुरा-वृंदावन की गोवर्धन परिक्रमा (सप्तकोसी परिक्रमा): वास्तविक गोवर्धन पर्वत मथुरा (उत्तर प्रदेश) में स्थित है, जिसकी कुल परिक्रमा लगभग 21 किलोमीटर (सात कोस) की है। अन्नकूट के पावन दिन लाखों श्रद्धालु वहां पहुंचकर नंगे पैर या ‘दंडवत’ (लेटकर) परिक्रमा करते हैं। मान्यता है कि जो लोग मथुरा नहीं जा सकते, वे घर पर ही गोबर के गोवर्धन जी की परिक्रमा करके वही पुण्य, आध्यात्मिक शांति और फल प्राप्त कर सकते हैं।
मानसिक स्थिति और मंत्र: परिक्रमा करते समय मन में किसी भी प्रकार का सांसारिक विचार, क्रोध या ईर्ष्या नहीं होनी चाहिए। पूरे समय होंठों पर भगवान का नाम— “श्री कृष्ण शरणं मम” या “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” —का निरंतर जाप होते रहना चाहिए।
गोवर्धन पूजा का ज्योतिषीय महत्व
गोवर्धन पूजा केवल एक धार्मिक या पर्यावरण संरक्षण का पर्व नहीं है, बल्कि वैदिक ज्योतिष में भी इसका अत्यंत गहरा प्रभाव माना गया है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि ग्रहों की ऊर्जा और प्रकृति के तत्वों को संतुलित करने का एक सिद्ध मुहूर्त होती है।
वैदिक ज्योतिष के अनुसार, इस पर्व का विभिन्न ग्रहों और कुंडली के भावों पर विशेष प्रभाव पड़ता है:
- चंद्रमा (Moon) की स्थिति में सुधार: ज्योतिष में चंद्रमा को मन, जल और भावनाओं का कारक माना गया है। गोवर्धन पूजा के दिन प्रकृति की उपासना और अन्नकूट का सात्विक प्रसाद ग्रहण करने से चंद्रमा को बल मिलता है। विशेषकर यदि जन्म कुंडली में चंद्रमा अष्टम भाव (8th House) में बैठकर मानसिक पीड़ा दे रहा हो, या नवम भाव (9th House) में होने के बावजूद भाग्य का पूरा साथ न मिल रहा हो, तो इस दिन की गई गोवर्धन पूजा मानसिक तनाव को दूर कर भाग्य को जाग्रत करती है।
- मंगल (Mars) का संतुलन: गोवर्धन पर्वत का निर्माण गाय के शुद्ध गोबर और मिट्टी (भूमि) से किया जाता है। ज्योतिष में भूमि और ऊर्जा का सीधा संबंध मंगल ग्रह से है। यदि किसी जातक की कुंडली में मंगल प्रथम भाव (1st House – लग्न) में बैठकर स्वभाव में उग्रता, क्रोध या स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां दे रहा हो, तो गोवर्धन जी की परिक्रमा करने और गोबर से बनी आकृति के दर्शन मात्र से मंगल का अशुभ प्रभाव शांत होता है और जीवन में स्थिरता (Stability) आती है।
- शुक्र ग्रह (Venus) और गौ सेवा: वैदिक ग्रंथों में गौ माता को शुक्र ग्रह का साक्षात स्वरूप माना गया है। शुक्र भौतिक सुख, धन, ऐश्वर्य और दांपत्य जीवन का मुख्य कारक है। गोवर्धन पूजा के दिन गाय की पूजा करने और उसे अपने हाथों से हरा चारा या भोजन खिलाने से कुंडली का कमजोर शुक्र अत्यंत बलवान हो जाता है, जिससे आर्थिक परेशानियां दूर होती हैं।
- पंचतत्वों की शुद्धि: यह पर्व जल, अग्नि, वायु, आकाश और पृथ्वी— इन पांचों तत्वों (पंचमहाभूत) के संतुलन का प्रतीक है। खुले आसमान के नीचे भूमि पर बैठकर की जाने वाली यह पूजा व्यक्ति की ‘ऑरा’ (Aura) को शुद्ध करती है।
अतः ज्योतिषीय दृष्टिकोण से गोवर्धन पूजा का दिन केवल अन्न का उत्सव नहीं है, बल्कि यह नवग्रहों की नकारात्मक ऊर्जा को प्राकृतिक रूप से सकारात्मक दिशा में मोड़ने का एक अचूक वैदिक उपाय है।
राशिनुसार गोवर्धन पूजा के अचूक उपाय
गोवर्धन पूजा का दिन नवग्रहों को शांत करने और धन-समृद्धि को आकर्षित करने का एक सिद्ध अवसर होता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार, यदि जातक अपनी चंद्र राशि (Moon Sign) के आधार पर भगवान गोवर्धन नाथ और गौ माता की विशेष सेवा करे, तो उसके जीवन की सभी आर्थिक और मानसिक बाधाएं दूर हो जाती हैं।
सुख, सफलता और ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए 12 राशियों के अचूक उपाय इस प्रकार हैं:
- मेष और वृश्चिक राशि (Aries & Scorpio): इन दोनों राशियों का स्वामी मंगल ग्रह है। जीवन में ऊर्जा, साहस और संपत्ति वृद्धि के लिए गोवर्धन पूजा के दिन लाल रंग की गाय को गुड़ और गेहूं की रोटी खिलाएं।
- वृषभ और तुला राशि (Taurus & Libra): शुक्र ग्रह के प्रभाव वाली इन राशियों के जातकों को सफेद गाय को चावल की खीर, बताशे या ताजी हरी घास खिलानी चाहिए। यह उपाय जीवन में भौतिक सुख, विलासिता और दांपत्य प्रेम को बढ़ाता है।
- मिथुन और कन्या राशि (Gemini & Virgo): बुध के स्वामित्व वाली इन राशियों के जातकों को व्यापार में लाभ और कुशाग्र बुद्धि के लिए गौ माता को हरा चारा, पालक या हरी मूंग की दाल अर्पित करनी चाहिए।
- कर्क राशि (Cancer): चंद्रमा आपकी राशि का स्वामी है। मानसिक शांति, तनाव से मुक्ति और भाग्य जाग्रत करने के लिए गोवर्धन जी की नाभि में कच्चा दूध अर्पित करें और गाय को आटे की लोई में थोड़ी सी मिश्री रखकर खिलाएं।
- सिंह राशि (Leo): सूर्य ग्रह के प्रभाव वाली इस राशि के लोगों को सरकारी कार्यों में सफलता और समाज में मान-सम्मान पाने के लिए लाल या भूरे रंग की गाय को तांबे के बर्तन से जल पिलाना चाहिए और गेहूं के आटे की रोटी खिलानी चाहिए।
- धनु और मीन राशि (Sagittarius & Pisces): देवगुरु बृहस्पति की इन राशियों को पीले रंग की गाय को चने की दाल, हल्दी लगी रोटी या केला खिलाना चाहिए। यह उपाय विवाह में आ रही बाधाओं को दूर कर जीवन में सौभाग्य और ज्ञान लाता है।
- मकर और कुंभ राशि (Capricorn & Aquarius): शनि देव के प्रभाव वाली इन दोनों राशियों के लिए काले रंग की गाय की सेवा सर्वोत्तम है। गोवर्धन पूजा के दिन काली गाय को सरसों के तेल से चुपड़ी हुई रोटी या काले तिल खिलाएं। इससे शनि दोष, साढ़ेसाती और ढैया के सभी कष्ट शांत होते हैं।
वास्तु अनुसार गोवर्धन पूजा की सही दिशा
सनातन धर्म के सभी पर्वों में दिशाओं और स्थान की ऊर्जा का विशेष महत्व होता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार, यदि गोवर्धन पूजा सही दिशा और स्थान पर की जाए, तो उस घर में सकारात्मक ऊर्जा (Positive Energy) का संचार कई गुना बढ़ जाता है और पूरे वर्ष सुख-समृद्धि का वास रहता है।
घर पर गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाने और पूजा करने के लिए वास्तु के इन महत्वपूर्ण नियमों का पालन करना चाहिए:
1. गोवर्धन जी के निर्माण की सही दिशा (ईशान कोण): वास्तु शास्त्र के अनुसार, घर के देवी-देवताओं और पवित्र कार्यों के लिए उत्तर-पूर्व दिशा (North-East direction), जिसे ‘ईशान कोण’ कहा जाता है, सबसे श्रेष्ठ मानी जाती है। घर के आंगन, बालकनी या छत के उत्तर-पूर्व हिस्से को अच्छी तरह साफ करके वहीं गोबर से गोवर्धन जी की आकृति बनानी चाहिए। यदि उत्तर-पूर्व में जगह न हो, तो पूर्व (East) दिशा का चुनाव भी अत्यंत शुभ होता है।
2. ब्रह्मस्थान (घर का मध्य भाग): यदि आपके घर में एक खुला और बड़ा आंगन है, तो आप गोवर्धन जी की आकृति आंगन के बिल्कुल बीचों-बीच बना सकते हैं। वास्तु में इस स्थान को ‘ब्रह्मस्थान’ कहा जाता है। यहाँ बैठकर पूजा करने से उत्पन्न होने वाली सकारात्मक ऊर्जा घर के हर कोने तक समान रूप से फैलती है।
3. पूजा करते समय मुख की दिशा: केवल गोवर्धन जी की स्थापना ही नहीं, बल्कि पूजा करते समय आपके बैठने की दिशा भी महत्वपूर्ण है। वास्तु के अनुसार, परिक्रमा, अभिषेक और आरती करते समय उपासक (पूजा करने वाले) का मुख सदैव पूर्व (East) या उत्तर (North) दिशा की ओर होना चाहिए। पूर्व दिशा सूर्य और सकारात्मकता की दिशा है, जबकि उत्तर दिशा धन के देवता कुबेर की मानी जाती है।
4. इन दिशाओं से बचें (वर्जित दिशाएं): गोवर्धन जी की आकृति भूलकर भी घर की दक्षिण (South) या दक्षिण-पश्चिम (South-West – नैऋत्य कोण) दिशा में नहीं बनानी चाहिए। दक्षिण दिशा यमराज की मानी जाती है और यहां मांगलिक कार्य या अन्नकूट का भोग लगाना वास्तु दोष उत्पन्न कर सकता है।
5. स्थान की शुद्धि: गोबर से आकृति बनाने से पूर्व उस स्थान की नकारात्मक ऊर्जा को दूर करना आवश्यक है। इसके लिए उस जगह को शुद्ध जल से धो लें और वहां थोड़ा सा गंगाजल और हल्दी का छिड़काव अवश्य करें। इससे भूमि की ऊर्जा पूरी तरह से सात्विक और पूजा के योग्य हो जाती है।
गौ माता (गाय) की पूजा का महत्व और नियम
सनातन धर्म में गोवर्धन पूजा के पर्व को ‘गौ-क्रीड़ा’ या ‘गौ-पूजा’ का दिन भी कहा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण (जिन्हें गोपाल भी कहा जाता है) ने गोवर्धन पर्वत के साथ-साथ गौ माता की पूजा को भी इस दिन का सबसे अनिवार्य हिस्सा बनाया था। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि पशुधन, विशेषकर गाय, हमारी अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य और कृषि का मूल आधार है।
गौ पूजा का आध्यात्मिक महत्व:
- 33 कोटि देवी-देवताओं का वास: वैदिक शास्त्रों के अनुसार, गौ माता के शरीर में 33 कोटि (प्रकार) के देवी-देवताओं का निवास होता है। गोवर्धन पूजा के दिन केवल एक गाय की पूजा करने से ब्रह्मांड के सभी देवी-देवताओं की पूजा का फल स्वतः ही प्राप्त हो जाता है।
- पंचगव्य की महत्ता: गाय से प्राप्त होने वाले पांच तत्व— दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र (जिन्हें ‘पंचगव्य’ कहा जाता है)— मानव जीवन और कृषि भूमि के लिए अमृत के समान हैं। इसी कृतज्ञता को व्यक्त करने के लिए यह पूजा की जाती है।
- नवग्रह शांति: ज्योतिषीय दृष्टि से गौ सेवा करने से कुंडली के सभी नवग्रह (विशेषकर शुक्र और बृहस्पति) शांत होते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
गौ माता की पूजा के नियम और विधि:
इस दिन गौशाला जाकर या अपने घर के आस-पास किसी गाय की पूजा इन शास्त्र-सम्मत नियमों के अनुसार करनी चाहिए:
- स्नान और शृंगार: प्रातःकाल गायों (और बछड़ों) को शुद्ध जल से स्नान कराया जाता है। इसके बाद उनके सींगों पर तेल, हल्दी या गेरू (लाल रंग) लगाया जाता है। उनके गले में गेंदे के फूलों की माला और पैरों में घुंघरू बांधकर उनका भव्य शृंगार किया जाता है।
- तिलक और आरती: गौ माता के माथे पर हल्दी, कुमकुम और अक्षत (चावल) का बड़ा सा तिलक लगाएं। इसके बाद शुद्ध देसी घी या कपूर का दीपक जलाकर उनकी श्रद्धापूर्वक आरती उतारें।
- गौ-ग्रास और प्रसाद: आरती के बाद गौ माता को अपने हाथों से हरा चारा (पालक या ताजी घास), गुड़, और अन्नकूट का प्रसाद (विशेष रूप से आटे की लोई में गुड़ रखकर) अवश्य खिलाएं।
- परिक्रमा और आशीर्वाद: भोजन कराने के बाद गौ माता की चार परिक्रमा (घड़ी की सुई की दिशा में) करें। अंत में उनके खुरों (पैरों) की धूल को अपने माथे पर लगाएं और चरण स्पर्श करके अपने परिवार की सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद मांगें।
यह अटूट मान्यता है कि गोवर्धन पूजा के दिन जो व्यक्ति गौ माता की निस्वार्थ भाव से सेवा करता है, उसके घर से दरिद्रता हमेशा के लिए दूर हो जाती है और वहां साक्षात माता लक्ष्मी का वास होता है।
किसानों, कृषि और प्रकृति के संरक्षण का सबसे बड़ा पर्व
भारत एक कृषि प्रधान देश है, और हमारे सनातन धर्म के अधिकांश त्योहार सीधे तौर पर खेती, मौसम और प्रकृति के चक्र से जुड़े हुए हैं। गोवर्धन पूजा विशुद्ध रूप से किसानों, कृषि और पर्यावरण संरक्षण को समर्पित एक महान पर्व है। आधुनिक युग में जिसे हम ‘इको-फ्रेंडली’ (Eco-friendly) या ‘नेचर कंजर्वेशन’ (Nature Conservation) कहते हैं, भगवान श्रीकृष्ण ने द्वापर युग में ही गोवर्धन पूजा के माध्यम से इसकी मजबूत नींव रख दी थी।
किसानों के लिए महत्व (Importance for Farmers): दीपावली के आस-पास खरीफ की फसल (जैसे धान, बाजरा, मक्का) पूरी तरह पककर किसानों के घरों में आ जाती है। यह पावन पर्व उसी नई फसल के लिए प्रकृति और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता (Gratitude) व्यक्त करने का सबसे सुंदर अवसर है। इसी नए अनाज का उपयोग करके भगवान को ‘अन्नकूट’ का महाप्रसाद अर्पित किया जाता है। ग्रामीण भारत में किसान इस दिन अपने कृषि उपकरणों (हल, ट्रैक्टर, कुदाल आदि) और बैलों व गायों की विशेष रूप से पूजा करते हैं, क्योंकि इन्ही के सहयोग से खेतों में अन्न का उत्पादन संभव हो पाता है।
प्रकृति संवर्धन का वास्तविक संदेश: भगवान श्रीकृष्ण ने देवराज इंद्र (जो मात्र एक प्राकृतिक शक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं) की पूजा रुकवाकर गोवर्धन पर्वत (जो साक्षात प्रकृति है) की पूजा इसलिए आरंभ करवाई थी ताकि मनुष्य यह समझ सके कि उसके जीवन का मूल आधार पहाड़, नदियां, जंगल और वनस्पतियां हैं।
- पहाड़ और वनस्पति: गोवर्धन पर्वत वनों, जड़ी-बूटियों और जल स्रोतों का प्रतीक है, जो पर्यावरण में संतुलन बनाए रखते हैं और वर्षा को आकर्षित करने में सहायक होते हैं।
- जैविक खेती और गौ-वंश: गाय पूरी कृषि अर्थव्यवस्था का केंद्र है। उसका गोबर जैविक खाद (Organic Fertilizer) के रूप में भूमि की उर्वरा शक्ति (Fertility) को बढ़ाता है, जिससे धरती विषमुक्त होती है।
आधुनिक युग में प्रासंगिकता (Relevance Today): आज जब पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming), जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा और प्रदूषण जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है, तब गोवर्धन पूजा की प्रासंगिकता कहीं अधिक बढ़ जाती है। यह पर्व हमें यह चेतावनी और संदेश देता है कि यदि हम अहंकार में आकर प्रकृति (पहाड़, नदियों और जंगलों) का अंधाधुंध दोहन करेंगे, तो हमें विनाशकारी प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ेगा। प्रकृति का सम्मान, वनों का संरक्षण और पशुधन की रक्षा ही मानव जाति के भविष्य को सुरक्षित कर सकती है।
विभिन्न राज्यों में गोवर्धन पूजा की परंपराएं
भारत एक विशाल और विविधताओं से भरा देश है। यद्यपि गोवर्धन पूजा का मूल केंद्र उत्तर प्रदेश की ब्रजभूमि है, लेकिन पूरे भारत में इसे अलग-अलग नामों, मान्यताओं और अनूठी क्षेत्रीय परंपराओं के साथ मनाया जाता है।
विभिन्न राज्यों में इस पर्व को मनाने के कुछ प्रमुख और रोचक तरीके इस प्रकार हैं:
- ब्रजमंडल (मथुरा, वृंदावन और गोकुल): यह गोवर्धन पूजा का वास्तविक जन्मस्थान है। यहाँ यह पर्व सबसे अधिक भव्यता के साथ मनाया जाता है। लाखों श्रद्धालु मथुरा पहुंचकर 21 किलोमीटर लंबी ‘सप्तकोसी गोवर्धन परिक्रमा’ करते हैं। बांके बिहारी मंदिर, इस्कॉन और श्रीनाथजी जैसे प्रमुख मंदिरों में ‘छप्पन भोग’ और ‘अन्नकूट’ के विशाल पहाड़ों के दर्शन कराए जाते हैं। पूरी ब्रजभूमि कृष्ण मय हो जाती है।
- गुजरात (नूतन वर्ष – Bestu Varas): गुजरात में गोवर्धन पूजा के दिन से ही गुजराती नव वर्ष (Gujarati New Year) या ‘बेस्तु वरस’ की शुरुआत होती है। व्यापारी वर्ग इस दिन अपने पुराने बही-खातों को बंद करके नए खातों की पूजा (चोपड़ा पूजन) करते हैं। गुजरात के स्वामीनारायण मंदिरों में दुनिया के सबसे बड़े अन्नकूट सजाए जाते हैं, जहाँ भगवान को सैकड़ों प्रकार के शाकाहारी व्यंजन अर्पित किए जाते हैं।
- महाराष्ट्र (बाली प्रतिपदा / दिवाली पाडवा): महाराष्ट्र और कोंकण क्षेत्रों में इस दिन को ‘बाली प्रतिपदा’ या ‘पाडवा’ के रूप में मनाया जाता है। यहाँ गोवर्धन पर्वत की बजाय भगवान विष्णु के ‘वामन अवतार’ और दानवीर ‘राजा बलि’ की पूजा का विधान है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान वामन ने राजा बलि को पाताल लोक का राज्य सौंपा था। साथ ही, इस दिन पत्नियां अपने पतियों की आरती उतारती हैं और उनके अच्छे स्वास्थ्य की कामना करती हैं, जिसके बदले पति उन्हें उपहार देते हैं।
- राजस्थान और मध्य प्रदेश: इन राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों में गोवर्धन पूजा कृषि और पशुधन के उत्सव के रूप में मनाई जाती है। घरों के आंगन में गाय के गोबर से विशाल और आकर्षक गोवर्धन पर्वत बनाए जाते हैं। रात के समय अलाव जलाकर ग्रामीण पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ लोकगीत गाते हैं। कई आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में गायों को सजाकर उनके साथ पारंपरिक खेल खेलने की भी प्रथा है।
- बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश (गोधन पूजा): इन क्षेत्रों में गोवर्धन पूजा को ‘गोधन’ के नाम से भी जाना जाता है, जो कुछ स्थानों पर भाई दूज की रस्मों के साथ जुड़ जाता है। यहाँ महिलाएं गोबर से गोवर्धन और विभिन्न आकृतियां बनाती हैं और विशेष लोकगीत गाते हुए उन्हें मूसल (Okhli-Musal) से कूटती हैं। यहाँ मटर और चने का प्रसाद विशेष रूप से बांटा जाता है।
यह क्षेत्रीय विविधता गोवर्धन पूजा को केवल एक धार्मिक कर्मकांड से निकालकर संपूर्ण भारत की सांस्कृतिक एकता और प्रकृति प्रेम का एक राष्ट्रीय पर्व बना देती है।
गोवर्धन पूजा का वैज्ञानिक और पर्यावरण महत्व
सनातन धर्म के अधिकांश पर्वों और परंपराओं के पीछे एक गहरा विज्ञान और पारिस्थितिकी (Ecology) छिपी हुई है। गोवर्धन पूजा केवल एक पौराणिक कथा या कर्मकांड मात्र नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण (Environmental Conservation) और मानव स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने का एक अत्यंत उन्नत वैज्ञानिक मॉडल है।
आधुनिक विज्ञान और पर्यावरण के दृष्टिकोण से इस पर्व का महत्व निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:
- गोबर के कीटाणुनाशक (Anti-bacterial) गुण: दीपावली और गोवर्धन पूजा का समय वर्षा ऋतु की समाप्ति और शीत ऋतु (सर्दियों) के आगमन का संधिकाल होता है। इस समय वातावरण में कई तरह के बैक्टीरिया और कीटाणु पनपने लगते हैं। विज्ञान भी प्रमाणित कर चुका है कि गाय के गोबर और गोमूत्र में प्राकृतिक रूप से एंटी-बैक्टीरियल और कीटाणुनाशक गुण होते हैं। गोबर से घर के आंगन को लीपना या उससे विशाल आकृतियां बनाने से घर के आस-पास की हवा शुद्ध होती है और हानिकारक जीवाणु नष्ट हो जाते हैं। यह एक प्रकार का प्राकृतिक ‘सैनिटाइज़र’ है।
- अन्नकूट का पोषण विज्ञान (Nutritional Science of Annakut): गोवर्धन पूजा के दिन नई फसल के अनाज (बाजरा, नया चावल) और ‘मिश्रित सब्जी’ (Mixed Veg) खाने की परंपरा है। मौसम बदलने के इस समय में शरीर को विभिन्न प्रकार के विटामिन्स, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट्स की आवश्यकता होती है। कई प्रकार की ताजी सब्जियों, दालों और नए अनाजों को मिलाकर बनाया गया अन्नकूट का प्रसाद शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) को शक्तिशाली बनाता है, जिससे बदलते मौसम की बीमारियों से बचाव होता है।
- जल चक्र (Water Cycle) और पर्वतों का महत्व: भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्र की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा इसलिए करवाई, क्योंकि पर्वत ही बादलों को रोककर वर्षा कराते हैं और नदियों का उद्गम स्थल होते हैं। यह पूजा इस वैज्ञानिक तथ्य को स्वीकार करना है कि जल चक्र को बनाए रखने और पर्यावरण को संतुलित रखने में पहाड़ों और जंगलों की भूमिका सबसे अहम है। पर्वतों के कटान से मानसून और कृषि प्रणाली पूरी तरह नष्ट हो सकती है।
- अर्थिंग (Earthing / Grounding) का लाभ: खुले आंगन में मिट्टी और गोबर के संपर्क में आना और नंगे पैर गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करना आधुनिक विज्ञान की ‘ग्राउंडिंग’ या ‘अर्थिंग’ तकनीक का एक बेहतरीन उदाहरण है। जब मनुष्य नंगे पैर पृथ्वी (मिट्टी) के सीधे संपर्क में आता है, तो शरीर में जमा अतिरिक्त और हानिकारक इलेक्ट्रोमैग्नेटिक चार्ज धरती में चला जाता है। इससे मानसिक तनाव कम होता है, रक्तचाप (Blood Pressure) संतुलित रहता है और शरीर को गहरी शांति मिलती है।
संक्षेप में, गोवर्धन पूजा हमारे पूर्वजों द्वारा प्रकृति, स्वास्थ्य और विज्ञान को धर्म के साथ जोड़कर आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित रखने का एक शानदार और दूरदर्शी प्रयास है।
गोवर्धन पूजा पर भूलकर भी न करें ये गलतियां
गोवर्धन पूजा प्रकृति और भगवान श्रीकृष्ण की कृपा पाने का अत्यंत पवित्र दिन है। शास्त्रों में इस अनुष्ठान के कुछ विशेष नियम बताए गए हैं। यदि अनजाने में भी इन नियमों की अनदेखी की जाए, तो पूजा का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता और घर में वास्तु या ग्रह दोष लग सकता है।
इस पावन दिन पर भूलकर भी निम्नलिखित 7 गलतियां नहीं करनी चाहिए:
1. बंद कमरे में पूजा न करें: गोवर्धन पूजा मूल रूप से प्रकृति का उत्सव है, इसलिए इसे हमेशा खुले आसमान के नीचे— जैसे घर के आंगन, छत (Terrace), बालकनी या सोसाइटी के पार्क में— करना चाहिए। गोबर से बने गोवर्धन पर्वत की स्थापना किसी बंद कमरे या छत से ढके हुए स्थान पर करना शुभ नहीं माना जाता।
2. गौ माता का अपमान या तिरस्कार: यह पूरा पर्व गौ माता और पशुधन को समर्पित है। इस दिन भूलकर भी किसी गाय को डंडे से मारना, दुत्कारना या उसे अपने दरवाजे से भूखा नहीं भगाना चाहिए। गौ माता का अपमान करने से सीधे भगवान श्रीकृष्ण रुष्ट हो जाते हैं और घर में दरिद्रता आती है।
3. गलत दिशा या अधूरी परिक्रमा: गोवर्धन जी की परिक्रमा हमेशा नंगे पैर और घड़ी की सुई की दिशा (Clockwise/ Right-hand side) में करनी चाहिए। उल्टी (Anti-clockwise) परिक्रमा करना घोर अपराध माना जाता है। इसके अलावा, एक बार परिक्रमा शुरू करने के बाद उसे बीच में अधूरा छोड़कर किसी अन्य काम में नहीं लगना चाहिए।
4. तामसिक भोजन का सेवन: अन्नकूट और गोवर्धन पूजा के दिन घर में पूर्णतः सात्विक वातावरण होना चाहिए। इस दिन मांस-मदिरा, अंडा, प्याज और लहसुन का सेवन सख्त वर्जित है। भगवान का छप्पन भोग और घर का भोजन भी पूरी तरह सात्विक होना चाहिए।
5. काले या अशुद्ध वस्त्र पहनना: पूजा और परिक्रमा के दौरान काले या गहरे नीले रंग के कपड़े पहनने से बचना चाहिए, क्योंकि ये रंग नकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करते हैं। पूजा में स्नान किए हुए शुद्ध वस्त्र (अधिमानतः पीले, लाल या केसरिया रंग के) धारण करना सर्वोत्तम होता है।
6. परिवार के बिना अकेले पूजा करना: गोवर्धन पूजा एक पारिवारिक और सामाजिक त्योहार है। शास्त्रों के अनुसार, इसे कभी भी अकेले संपन्न नहीं करना चाहिए। परिवार के सभी सदस्यों को एक साथ एकत्रित होकर, पूरी श्रद्धा के साथ भगवान की आरती और परिक्रमा करनी चाहिए।
7. गोवर्धन जी की आकृति पर पैर लगना: यह एक बहुत ही सामान्य लेकिन गंभीर गलती है। गोबर से बनी गोवर्धन जी की आकृति साक्षात भगवान का स्वरूप होती है। परिक्रमा करते समय, या अगले दिन तक इस बात का विशेष ध्यान रखें कि परिवार के किसी भी सदस्य या बच्चों का पैर भूल से भी गोवर्धन जी की आकृति या उनकी बाड़ (सींक) पर न लगे
श्री गोवर्धन नाथ की आरती
गोवर्धन पूजा के संपूर्ण विधि-विधान और परिक्रमा के पश्चात पर्व का समापन भगवान श्री गोवर्धन नाथ (गिरिराज जी) की आरती के साथ किया जाता है। सपरिवार एकत्रित होकर, शुद्ध घी का दीपक और कपूर प्रज्वलित कर, पूर्ण भक्ति-भाव के साथ इस आरती का गायन करना चाहिए:
श्री गोवर्धन महाराज, ओ महाराज, तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ।
तोपे पान चढ़े तोपे फूल चढ़े, तोपे चढ़े दूध की धार। तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ॥
तेरी सात कोस की परिकम्मा, चकलेश्वर है विश्राम। तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ॥
तेरे गले में कण्ठा साज रहेओ, ठोड़ी पे हीरा लाल। तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ॥
तेरे कानन कुण्डल चमक रहेओ, तेरी झांकी बनी विशाल। तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ॥
गिरिराज धरण प्रभु तेरी शरण, करो भक्तन का बेड़ा पार। तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ॥
आरती के बाद के नियम (Rules after Aarti):
- शंखनाद और जयकारा: आरती संपन्न होने के बाद शंख अवश्य बजाएं और “बोल गिरिराज महाराज की जय” और “गौ माता की जय” के जयकारे लगाएं।
- क्षमा प्रार्थना: आरती के पश्चात हाथ जोड़कर भगवान श्रीकृष्ण और गोवर्धन नाथ से पूजा में हुई किसी भी प्रकार की भूल-चूक (त्रुटि) के लिए क्षमा मांगें।
- प्रसाद वितरण: सबसे अंत में घर के मुखिया या पूजा संपन्न करने वाले व्यक्ति को भगवान को अर्पित किया गया ‘अन्नकूट’ और ‘छप्पन भोग’ का प्रसाद सभी परिवार जनों, पड़ोसियों और उपस्थित भक्तों में समान रूप से वितरित करना चाहिए।
गोबर न मिलने पर कैसे करें गोवर्धन पूजा?
आज के आधुनिक युग में, विशेषकर बड़े शहरों, महानगरों और बहुमंजिला इमारतों (Flats) में रहने वाले लोगों के लिए शुद्ध गाय का गोबर प्राप्त करना एक बड़ी चुनौती बन गया है। कई बार लोग गोबर न मिल पाने के कारण पूजा ही छोड़ देते हैं। लेकिन सनातन धर्म में कर्मकांड से अधिक ‘भाव’ (श्रद्धा) का महत्व है। यदि आपको गाय का गोबर न मिले, तो भी आप पूर्ण शास्त्र-सम्मत तरीके से और कुछ आसान विकल्पों के साथ गोवर्धन पूजा संपन्न कर सकते हैं।
गोबर उपलब्ध न होने पर आप इन पवित्र विकल्पों का उपयोग कर गोवर्धन जी की आकृति बना सकते हैं:
1. शुद्ध मिट्टी (Pure Soil/Clay): गोबर के बाद सबसे पवित्र तत्व पृथ्वी (मिट्टी) है। आप किसी साफ गमले, बगीचे या नदी किनारे की शुद्ध मिट्टी (या चिकनी मिट्टी) ला सकते हैं। इसमें थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर गूंध लें और एक लकड़ी की चौकी पर इससे गोवर्धन पर्वत की प्रतीकात्मक आकृति बना लें। इसे फूलों और रंगों से सजाकर गोबर की तरह ही पूजा जा सकता है।
2. अनाज और चावल (Grains and Rice): अन्नकूट का पर्व वैसे भी अनाज का ही उत्सव है। आप एक साफ लकड़ी के पट्टे या थाली में साबुत चावल (अक्षत), गेहूं, बाजरा या अन्य अनाजों को ढेर के रूप में रखकर एक ‘पर्वत’ का आकार बना सकते हैं। इसी अन्न के पर्वत को गोवर्धन नाथ मानकर उसकी पूजा और परिक्रमा करें। पूजा के बाद इस अनाज को पक्षियों या गायों को खिला दें।
3. तस्वीर या चित्र (Printed Image or Poster): यदि मिट्टी या अनाज से आकृति बनाना भी संभव न हो, तो बाजार से या इंटरनेट से भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाते हुए एक तस्वीर या पोस्टर ले आएं। इसे पूर्व या उत्तर दिशा में स्थापित करें, तस्वीर पर रोली-अक्षत लगाएं, पुष्प अर्पित करें और इसी तस्वीर की आरती व परिक्रमा (अपनी जगह पर गोल घूमकर) कर लें।
4. फूलों का पर्वत (Mountain of Flowers): आप विभिन्न प्रकार के ताजे फूलों (जैसे गेंदा, गुलाब, चमेली) को इकट्ठा करके एक सुंदर फूलों का पहाड़ बना सकते हैं। इसके बीच में भगवान श्रीकृष्ण की कोई छोटी सी मूर्ति या शालिग्राम जी को स्थापित कर दें और इसे ही गोवर्धन मानकर अन्नकूट का भोग लगाएं।
5. चार्ट पेपर पर आकृति (Drawing): आप एक बड़े चार्ट पेपर पर अपने हाथों से गोवर्धन जी की आकृति या पर्वत का चित्र बना सकते हैं। इस चित्र को रंगों से सजाएं और दीवार या चौकी पर लगाकर उसकी पूजा करें। बच्चों को इस प्रक्रिया में शामिल करने से वे भी अपनी संस्कृति से जुड़ते हैं।
महत्वपूर्ण बात: भगवान गोवर्धन नाथ आपकी व्यवस्थाओं को नहीं, बल्कि आपके हृदय की शुद्धता को देखते हैं। भले ही आप गोबर की जगह मिट्टी या तस्वीर की पूजा करें, लेकिन अन्नकूट का भोग, कढ़ी-चावल का प्रसाद, और आरती-परिक्रमा के नियम बिल्कुल वैसे ही रहेंगे जैसे पारंपरिक पूजा में होते हैं। सच्ची श्रद्धा से किया गया मानसिक स्मरण (मानस पूजा) भी पूर्ण फलदायी होता है।
गोवर्धन पूजा से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs) और निष्कर्ष
किसी भी त्योहार से जुड़ी संपूर्ण जानकारी तब तक अधूरी है, जब तक पाठकों के मन में उठने वाले सामान्य सवालों के जवाब न मिल जाएं। गोवर्धन पूजा (अन्नकूट) को लेकर अक्सर लोगों के मन में कई प्रश्न होते हैं। यहाँ कुछ प्रमुख सवालों (FAQs) के उत्तर दिए जा रहे हैं:
प्रश्न 1: वर्ष 2026 में गोवर्धन पूजा किस दिन मनाई जाएगी? उत्तर: वर्ष 2026 में दीपावली 8 नवंबर को है, इसलिए गोवर्धन पूजा ठीक अगले दिन यानी 9 नवंबर 2026 (सोमवार) को मनाई जाएगी।
प्रश्न 2: घर में गोवर्धन पर्वत बनाने के लिए कौन सी दिशा सबसे शुभ होती है? उत्तर: वास्तु शास्त्र के अनुसार, गोवर्धन पर्वत बनाने और पूजा करने के लिए घर की उत्तर-पूर्व दिशा (ईशान कोण) या पूर्व दिशा सबसे श्रेष्ठ मानी जाती है। पूजा करते समय आपका मुख भी पूर्व या उत्तर की ओर होना चाहिए।
प्रश्न 3: क्या हम फ्लैट के अंदर या बंद कमरे में गोवर्धन पूजा कर सकते हैं? उत्तर: नहीं, गोवर्धन पूजा मूल रूप से प्रकृति का पर्व है। इसे हमेशा खुले आसमान के नीचे— जैसे बालकनी, छत, आंगन या हाउसिंग सोसाइटी के खुले पार्क में करना चाहिए। बंद कमरे में यह पूजा वर्जित है।
प्रश्न 4: गोवर्धन जी की कितनी परिक्रमा करना शुभ माना जाता है? उत्तर: घर पर स्थापित गोबर के गोवर्धन जी की सपरिवार 4 या 7 बार परिक्रमा करना अत्यंत शुभ माना जाता है। परिक्रमा हमेशा नंगे पैर और घड़ी की सुई की दिशा (Clockwise) में जल की धारा गिराते हुए करनी चाहिए।
प्रश्न 5: भगवान श्रीकृष्ण को ‘छप्पन भोग’ (56 Bhog) ही क्यों लगाया जाता है? उत्तर: इंद्र के प्रकोप से बचाने के लिए श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को 7 दिन और 7 रात तक उंगली पर उठाए रखा था। इस दौरान उन्होंने कुछ नहीं खाया था। माता यशोदा उन्हें दिन में 8 बार भोजन कराती थीं। इसलिए 7 दिन और 8 प्रहर के हिसाब से (7×8=56) भगवान की भूख शांत करने के लिए ब्रजवासियों ने 56 प्रकार के व्यंजन बनाए थे।
प्रश्न 6: यदि गाय का गोबर न मिले तो क्या करें? उत्तर: गोबर न मिलने पर आप शुद्ध मिट्टी, अनाज (चावल/गेहूं) की ढेरी, फूलों के पहाड़ या भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाते हुए किसी तस्वीर/पोस्टर की पूजा भी पूर्ण श्रद्धा के साथ कर सकते हैं।
निष्कर्ष (Conclusion):
गोवर्धन पूजा मात्र एक कर्मकांड या पौराणिक कथा नहीं है; यह मनुष्य और प्रकृति के बीच के अटूट प्रेम, कृतज्ञता और संतुलन का सबसे बड़ा प्रमाण है। भगवान श्रीकृष्ण ने इस पर्व के माध्यम से हमें यह सिखाया है कि असली देव हमारी नदियां, पहाड़, जंगल और पशुधन हैं, जो निस्वार्थ भाव से हमारा भरण-पोषण करते हैं। आधुनिक युग में जहाँ जलवायु परिवर्तन एक बड़ा संकट बन चुका है, गोवर्धन पूजा हमें ‘पर्यावरण संरक्षण’ (Environment Protection) का एक मजबूत संदेश देती है।
आशा है कि यह विस्तृत मार्गदर्शिका आपको वर्ष 2026 में विधि-विधान और शास्त्र-सम्मत तरीके से गोवर्धन पूजा संपन्न करने में सहायक सिद्ध होगी। पूर्ण श्रद्धा और भक्ति-भाव से भगवान गोवर्धन नाथ, श्रीकृष्ण और गौ माता की आराधना करें, ताकि आपके घर में सुख, शांति, समृद्धि और अन्न के भंडार सदैव भरे रहें।
“बोलिए गिरिराज महाराज की जय! गौ माता की जय!” (आपको और आपके पूरे परिवार को गोवर्धन पूजा और अन्नकूट की हार्दिक शुभकामनाएं।)
अस्वीकरण (Disclaimer):
इस लेख में दी गई गोवर्धन पूजा 2026 की तिथियां, शुभ मुहूर्त, धार्मिक कथाएं, परिक्रमा के नियम और ज्योतिषीय उपायों की जानकारी विभिन्न वैदिक ग्रंथों, हिंदू पंचांग और पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित है। हमारा उद्देश्य आप तक केवल ज्ञानवर्धक, सटीक और विस्तृत जानकारी पहुँचाना है।
चूँकि भौगोलिक स्थिति (Latitude-Longitude) के अनुसार अलग-अलग शहरों में सूर्योदय और सूर्यास्त के समय में मामूली अंतर हो सकता है, इसलिए अपने शहर के सटीक मुहूर्त के लिए कृपया स्थानीय पंचांग या किसी योग्य पंडित/ज्योतिषाचार्य से परामर्श अवश्य लें। इसके अतिरिक्त, किसी भी राशिनुसार उपाय या वास्तु नियम को व्यक्तिगत रूप से लागू करने से पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित है। इस लेख में दी गई जानकारी के उपयोग या उससे होने वाले किसी भी परिणाम के लिए लेखक या यह मंच उत्तरदायी नहीं होगा।
भाई दूज 2026: तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और धार्मिक महत्व
गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026
गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026
गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026 गोवर्धन पूजा 2026

