मां चंद्रघंटा पूजा

मां चंद्रघंटा: कथा, पूजा विधि, मंत्र, भोग और महत्व

मां चंद्रघंटा कौन हैं?

मां चंद्रघंटा को नवदुर्गा का तीसरा स्वरूप माना जाता है और शारदीय नवरात्रि के तीसरे दिन उनकी पूजा की जाती है। धार्मिक परंपरा के अनुसार मां चंद्रघंटा माता पार्वती का वह स्वरूप हैं, जो भगवान शिव से विवाह के बाद प्रकट हुआ। उनके मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित रहता है और वह अर्धचंद्र घंटे के समान दिखाई देता है, इसी कारण उन्हें चंद्रघंटा नाम प्राप्त हुआ।

उनका स्वरूप एक ओर शांत, सौम्य और भक्तों के कल्याणकारी रूप को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर वे अनेक अस्त्र-शस्त्र धारण करके अधर्म और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करने वाली देवी के रूप में भी वर्णित की जाती हैं।

मां चंद्रघंटा का स्वरूप सामान्यतः दस भुजाओं वाला बताया जाता है। उनके हाथों में त्रिशूल, गदा, तलवार, कमंडल, कमल, धनुष, बाण और जपमाला जैसे विभिन्न प्रतीक तथा अस्त्र रहते हैं, जबकि दो हाथ अभय और वरद मुद्रा में माने जाते हैं। उनका वाहन परंपरागत रूप से बाघिन बताया गया है। इस स्वरूप में देवी को युद्ध के लिए तैयार शक्ति के रूप में देखा जाता है, लेकिन उनका मुख शांत और करुणामय रहता है। यही विशेषता उनके स्वरूप को संतुलित बनाती है—एक ओर भक्तों के प्रति मातृभाव और दूसरी ओर अन्याय के विरुद्ध शक्ति।

मां चंद्रघंटा के नाम और स्वरूप में चंद्र और घंटा, दोनों का विशेष महत्व माना जाता है। मस्तक पर स्थित अर्धचंद्र शीतलता, शांति और मन के संतुलन से जुड़ा प्रतीक माना जाता है, जबकि घंटे का भाव नकारात्मकता को दूर करने और जागृति उत्पन्न करने से जोड़ा जाता है। धार्मिक मान्यता में उनके मस्तक की घंटा-ध्वनि को ऐसी शक्ति माना गया है जो भक्तों को नकारात्मक प्रभावों से सुरक्षा प्रदान करती है। इसलिए नवरात्रि के तीसरे दिन उनकी पूजा में देवी के शांत और शक्तिशाली दोनों पक्षों का ध्यान किया जाता है।

नवरात्रि की साधना के क्रम में भी मां चंद्रघंटा का स्वरूप विशेष अर्थ रखता है। मां शैलपुत्री के माध्यम से स्थिरता और आधार तथा मां ब्रह्मचारिणी के माध्यम से तप, संयम और दृढ़ संकल्प के बाद तीसरे दिन चंद्रघंटा का स्वरूप साहस, शक्ति और आत्मरक्षा की चेतना से जुड़ा हुआ माना जाता है। इस प्रकार उनका स्वरूप भक्त को यह प्रेरणा देता है कि जीवन में शांति और करुणा के साथ-साथ अन्याय तथा कठिन परिस्थितियों का सामना करने के लिए साहस और शक्ति भी आवश्यक है।

इस प्रकार मां चंद्रघंटा केवल नवरात्रि के तीसरे दिन पूजी जाने वाली देवी ही नहीं, बल्कि शांति और शक्ति के संतुलित स्वरूप का प्रतीक मानी जाती हैं। उनका शांत मुख मन की स्थिरता का भाव देता है, जबकि अस्त्र-शस्त्र और बाघिन पर आरूढ़ स्वरूप साहस और शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार उनकी आराधना भक्त को निर्भयता, साहस और सकारात्मक ऊर्जा के भाव से जोड़ती है।

नवरात्रि 2026 का तीसरा दिन: तिथि, पंचांग और शुभ मुहूर्त

शारदीय नवरात्रि 2026 का तीसरा दिन 13 अक्टूबर 2026, मंगलवार को मनाया जाएगा। इस दिन आश्विन शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि रहेगी और नवदुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा की जाएगी। नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री, दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी और तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की आराधना का क्रम चलता है। 2026 के शारदीय नवरात्रि पंचांग के अनुसार 13 अक्टूबर को तृतीया तिथि के साथ सिंदूर तृतीया और चंद्रघंटा पूजा का पर्व है।

13 अक्टूबर 2026 का पंचांग: दिन मंगलवार रहेगा, पक्ष शुक्ल पक्ष और तिथि तृतीया रहेगी। गुरुग्राम के उपलब्ध पंचांग में तृतीया तिथि रात 11:27 बजे तक बताई गई है, जिसके बाद चतुर्थी शुरू होगी। उसी पंचांग के अनुसार विशाखा नक्षत्र रात 1:43 बजे तक (14 अक्टूबर) रहेगा और इसके बाद अनुराधा नक्षत्र शुरू होगा। प्रीति योग रात 8:24 बजे तक रहेगा। नई दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग के अनुसार समय देखना उचित रहेगा।

मां चंद्रघंटा की पूजा के लिए प्रातःकाल का समय उपयुक्त माना जा सकता है। चूंकि तीसरे दिन घटस्थापना नहीं की जाती, इसलिए पहले दिन की तरह कोई अलग घटस्थापना मुहूर्त निकालने की आवश्यकता नहीं है। सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करने के बाद पूजा स्थान की सफाई करें, मां चंद्रघंटा का ध्यान करें और दीप, धूप, पुष्प, नैवेद्य तथा मंत्र-जाप के साथ पूजा करें। यदि घर में पहले दिन घटस्थापित कलश और अखंड ज्योत स्थापित की गई है तो उसकी पूजा भी नियमित रूप से जारी रखें।

13 अक्टूबर को नई दिल्ली क्षेत्र में सूर्योदय लगभग 6:20–6:21 बजे और सूर्यास्त लगभग 5:55 बजे के आसपास रहेगा। इसलिए सुबह सूर्योदय के बाद पूजा करना सुविधाजनक रहेगा। पंचांग के मुहूर्त शहर के अक्षांश-देशांतर के अनुसार बदलते हैं, इसलिए लेख में किसी दूसरे शहर का समय सभी पाठकों के लिए समान बताने के बजाय नई दिल्ली के आधार पर समय देना और साथ में स्थानीय पंचांग देखने की सलाह देना अधिक सही रहेगा।

इस प्रकार शारदीय नवरात्रि 2026 का तीसरा दिन 13 अक्टूबर, मंगलवार को होगा और इस दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाएगी। इस दिन की मुख्य तिथि शुक्ल तृतीया है और पूजा का केंद्र मां चंद्रघंटा का शांत तथा शक्तिशाली स्वरूप रहेगा।

तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा क्यों होती है?

शारदीय नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा करने की परंपरा है। नवदुर्गा के क्रम में पहले दिन मां शैलपुत्री और दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की आराधना के बाद तीसरे दिन देवी के इस स्वरूप की पूजा की जाती है। मां चंद्रघंटा को माता पार्वती का विवाहित और वीर स्वरूप माना जाता है।

उनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित होने के कारण उन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। उनका स्वरूप एक साथ सौम्यता, शांति, साहस और शक्ति का भाव प्रस्तुत करता है। इसलिए नवरात्रि के तीसरे दिन उनकी पूजा को साधना के उस चरण से जोड़ा जाता है, जिसमें तप और संकल्प के बाद व्यक्ति अपने भीतर साहस तथा आत्मबल को जागृत करने का प्रयास करता है।

मां चंद्रघंटा की पूजा का एक प्रमुख भाव भय से मुक्ति और निर्भयता से जुड़ा हुआ है। धार्मिक मान्यता के अनुसार देवी का युद्धमय स्वरूप भक्तों की रक्षा करने वाला माना जाता है और उनके हाथों में मौजूद अस्त्र-शस्त्र नकारात्मक शक्तियों तथा अधर्म के विरुद्ध शक्ति का प्रतीक माने जाते हैं। वहीं उनका शांत मुख यह संदेश देता है कि वास्तविक शक्ति के साथ विवेक और संतुलन भी आवश्यक है।

इसी कारण तीसरे दिन उनकी आराधना करते समय भक्त अपने जीवन के भय, असुरक्षा और कठिन परिस्थितियों का सामना साहस तथा धैर्य के साथ करने की प्रार्थना करते हैं। यह देवी के स्वरूप से जुड़ी धार्मिक मान्यता है, जिसे आध्यात्मिक प्रेरणा के रूप में समझना उचित है।

मां चंद्रघंटा की पूजा का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष शांति और शक्ति का संतुलन है। उनका स्वरूप देखने में तेजस्वी और युद्ध के लिए तैयार दिखाई देता है, लेकिन देवी का मुख शांत बताया जाता है। इससे यह भाव लिया जाता है कि जीवन में केवल आक्रामकता या केवल शांत रहना पर्याप्त नहीं है; परिस्थितियों के अनुसार साहस के साथ विवेक और करुणा बनाए रखना भी आवश्यक है।

नवरात्रि के तीसरे दिन उनकी आराधना इसी संतुलित शक्ति को स्मरण करने का अवसर मानी जाती है। इस दृष्टि से मां चंद्रघंटा का स्वरूप व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों से भागने के बजाय शांत मन से उनका सामना करने की प्रेरणा देता है।

धार्मिक परंपरा में मां चंद्रघंटा के घंटे की ध्वनि को भी विशेष महत्व दिया जाता है। घंटे का संबंध जागृति और नकारात्मकता को दूर करने के भाव से जोड़ा जाता है। इसलिए देवी के मस्तक पर स्थित घंटे के आकार का अर्धचंद्र उनके नाम और स्वरूप का प्रमुख प्रतीक बन जाता है। पूजा के दौरान घंटी बजाने की परंपरा भी इसी धार्मिक भाव से जुड़ी हुई मानी जाती है। भक्त देवी का ध्यान करते हुए अपने मन में मौजूद भय, नकारात्मक विचार और अस्थिरता को छोड़कर सकारात्मक तथा सात्त्विक भाव अपनाने का संकल्प कर सकते हैं।

इस प्रकार नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा इसलिए की जाती है क्योंकि उनका स्वरूप साहस, शक्ति, निर्भयता, शांति और संतुलन का प्रतीक माना जाता है। पहले दो दिनों की साधना में स्थिरता, तप और संकल्प के बाद तीसरे दिन देवी चंद्रघंटा का स्मरण साधक को अपने भीतर साहस और आत्मबल विकसित करने की प्रेरणा देता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार उनकी आराधना भक्त को कठिन परिस्थितियों का सामना करने का मनोबल प्रदान करने वाली मानी जाती है और यही नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा का प्रमुख आध्यात्मिक भाव है।

मां चंद्रघंटा की पौराणिक कथा

मां चंद्रघंटा की पौराणिक कथा माता पार्वती के भगवान शिव से विवाह के बाद के स्वरूप से जुड़ी हुई मानी जाती है। नवदुर्गा की परंपरा में मां चंद्रघंटा को माता पार्वती का विवाहित रूप माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान शिव से विवाह के बाद माता पार्वती ने अपने मस्तक पर अर्धचंद्र धारण किया और यह अर्धचंद्र घंटे के समान दिखाई देता था। इसी कारण उनका नाम चंद्रघंटा प्रसिद्ध हुआ। द्रिक पंचांग भी मां चंद्रघंटा को देवी पार्वती का विवाहित स्वरूप बताते हुए उनके मस्तक पर अर्धचंद्र धारण करने की परंपरा का उल्लेख करता है।

मां चंद्रघंटा के स्वरूप में केवल सौम्यता ही नहीं, बल्कि वीरता और शक्ति का भी विशेष भाव दिखाई देता है। उन्हें दस भुजाओं वाली देवी के रूप में दर्शाया जाता है और उनके हाथों में त्रिशूल, गदा, तलवार, कमंडल, कमल, धनुष, बाण तथा जपमाला जैसे विभिन्न आयुध और प्रतीक बताए गए हैं। उनके दो हाथ अभय और वरद मुद्रा में माने जाते हैं। इस स्वरूप का धार्मिक अर्थ यह है कि माता पार्वती केवल करुणा और मातृत्व की शक्ति ही नहीं हैं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर धर्म और भक्तों की रक्षा करने वाली पराक्रमी शक्ति भी हैं।

मां चंद्रघंटा की कथा में उनका शांत मुख और युद्ध के लिए तैयार स्वरूप विशेष महत्व रखता है। धार्मिक परंपरा में उनका वाहन बाघिन बताया गया है और वे अनेक अस्त्र-शस्त्र धारण करती हैं, लेकिन उनके चेहरे पर शांति और करुणा का भाव रहता है। इससे यह आध्यात्मिक संदेश लिया जाता है कि वास्तविक शक्ति केवल क्रोध या आक्रामकता में नहीं होती, बल्कि शक्ति के साथ विवेक, धैर्य और करुणा का संतुलन भी आवश्यक है। इसलिए मां चंद्रघंटा का स्वरूप भक्तों के लिए साहस और संतुलन दोनों का प्रतीक माना जाता है।

पौराणिक परंपरा में मां चंद्रघंटा के मस्तक पर स्थित अर्धचंद्र और घंटे को उनके नाम और स्वरूप की प्रमुख पहचान माना गया है। अर्धचंद्र का आकार घंटे के समान दिखाई देने के कारण उन्हें चंद्रघंटा कहा गया। धार्मिक मान्यता में घंटा-ध्वनि को जागृति तथा नकारात्मकता से दूरी के भाव से जोड़ा जाता है। इसी कारण देवी के इस स्वरूप की आराधना में मन के भय और अस्थिरता को दूर करके साहस, जागरूकता और सकारात्मकता अपनाने का भाव रखा जाता है। यह धार्मिक प्रतीकात्मक व्याख्या है, जिसे आस्था और परंपरा के संदर्भ में समझना चाहिए।

इस प्रकार मां चंद्रघंटा की पौराणिक कथा मुख्य रूप से माता पार्वती के विवाहित स्वरूप, शिव-शक्ति के मिलन और देवी की रक्षक शक्ति से जुड़ी हुई है। उनके मस्तक का अर्धचंद्र उन्हें चंद्रघंटा नाम देता है, जबकि दस भुजाओं और अस्त्र-शस्त्रों से युक्त स्वरूप उनकी शक्ति और पराक्रम का प्रतीक माना जाता है। नवरात्रि के तीसरे दिन उनकी पूजा करते हुए भक्त देवी के इसी संतुलित स्वरूप का स्मरण करते हैं, जिसमें एक ओर माता की करुणा और शांति है तथा दूसरी ओर धर्म और भक्तों की रक्षा करने का अदम्य साहस है।

मां चंद्रघंटा का जन्म और माता पार्वती से संबंध

मां चंद्रघंटा को माता पार्वती का ही विवाहित स्वरूप माना जाता है। नवदुर्गा की परंपरा में मां शैलपुत्री से शुरू होने वाली देवी की यात्रा के बाद ब्रह्मचारिणी स्वरूप में तपस्या और साधना का चरण आता है, जबकि चंद्रघंटा स्वरूप में माता पार्वती के भगवान शिव से विवाह के बाद का रूप सामने आता है। द्रिक पंचांग के अनुसार देवी चंद्रघंटा को देवी पार्वती का विवाहित रूप माना गया है और भगवान शिव से विवाह के पश्चात माता ने अपने मस्तक पर अर्धचंद्र धारण करना आरंभ किया, जिसके कारण उन्हें चंद्रघंटा के नाम से जाना गया।

माता पार्वती का संबंध मां चंद्रघंटा से समझने के लिए नवदुर्गा के क्रम को देखना महत्वपूर्ण है। धार्मिक परंपरा में नवदुर्गा के नौ स्वरूपों को माता पार्वती की शक्ति के विभिन्न चरणों और रूपों से जोड़ा जाता है। इसी क्रम में शैलपुत्री को हिमालय की पुत्री के रूप में, ब्रह्मचारिणी को तपस्विनी और अविवाहित स्वरूप के रूप में तथा चंद्रघंटा को विवाहित पार्वती के रूप में पूजा जाता है। इस तरह मां चंद्रघंटा को माता पार्वती से अलग कोई स्वतंत्र जन्म लेने वाली देवी मानने के बजाय उनकी शक्ति के एक विशेष स्वरूप के रूप में समझना अधिक उपयुक्त है।

भगवान शिव से विवाह के बाद माता पार्वती के स्वरूप में जो परिवर्तन धार्मिक परंपरा में बताया जाता है, उसमें मस्तक पर अर्धचंद्र धारण करना प्रमुख है। यह अर्धचंद्र आकार में घंटे जैसा दिखाई देता है और इसी कारण माता का नाम चंद्रघंटा प्रसिद्ध हुआ। उनके इस स्वरूप में एक ओर माता पार्वती का सौम्य और कल्याणकारी रूप दिखाई देता है, वहीं दूसरी ओर दस भुजाओं में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाली देवी का शक्तिशाली स्वरूप भी मिलता है। इस प्रकार चंद्रघंटा रूप माता पार्वती के वैवाहिक जीवन के साथ-साथ उनकी रक्षक और वीर शक्ति को भी व्यक्त करता है।

मां चंद्रघंटा के स्वरूप में शांति और शक्ति का संतुलन माता पार्वती के व्यापक स्वरूप को समझने में विशेष महत्व रखता है। द्रिक पंचांग में उनका वर्णन शांत और भक्तों के कल्याणकारी रूप के रूप में किया गया है, जबकि उसी स्वरूप में वे सभी अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर युद्ध के लिए तैयार दिखाई देती हैं। धार्मिक दृष्टि से यह भाव बताता है कि माता पार्वती का मातृ और करुणामय रूप आवश्यकता पड़ने पर रक्षक और पराक्रमी शक्ति के रूप में भी प्रकट हो सकता है।

इस प्रकार मां चंद्रघंटा का जन्म किसी अलग देवी के रूप में होने की कथा से अधिक माता पार्वती के विवाहित स्वरूप की परंपरा से जुड़ा हुआ है। भगवान शिव से विवाह के बाद अर्धचंद्र धारण करने वाली माता पार्वती को चंद्रघंटा के नाम से पूजा गया और नवरात्रि के तीसरे दिन इसी स्वरूप की आराधना की जाती है। उनके स्वरूप में माता पार्वती की करुणा, वैवाहिक शक्ति, साहस और रक्षक भाव एक साथ दिखाई देते हैं। इसलिए मां चंद्रघंटा को माता पार्वती की शक्ति का ऐसा स्वरूप माना जाता है, जिसमें सौम्यता के साथ वीरता और शांति के साथ शक्ति का सुंदर संतुलन दिखाई देता है।

मां चंद्रघंटा और भगवान शिव का संबंध

मां चंद्रघंटा का भगवान शिव से संबंध माता पार्वती के विवाहित स्वरूप के कारण माना जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार मां चंद्रघंटा कोई अलग देवी नहीं, बल्कि माता पार्वती का वही रूप हैं जो भगवान शिव से विवाह के बाद प्रकट हुआ। द्रिक पंचांग में भी चंद्रघंटा को देवी पार्वती का विवाहित स्वरूप बताया गया है और मान्यता है कि भगवान शिव से विवाह के बाद माता पार्वती ने अपने मस्तक पर अर्धचंद्र धारण किया, जिसके कारण उन्हें चंद्रघंटा के नाम से जाना गया।

भगवान शिव और माता पार्वती का संबंध हिंदू धार्मिक परंपरा में शिव और शक्ति के मिलन के रूप में विशेष महत्व रखता है। शिव को चेतना और शक्ति को सृजनात्मक ऊर्जा के रूप में समझने वाली धार्मिक-दर्शन परंपरा में दोनों को एक-दूसरे के पूरक माना जाता है। मां चंद्रघंटा का स्वरूप इसी शिव-शक्ति संबंध के एक विशेष चरण को दर्शाता है, जहां माता पार्वती तपस्विनी रूप से आगे बढ़कर भगवान शिव की अर्धांगिनी के रूप में प्रतिष्ठित होती हैं। इसलिए चंद्रघंटा के स्वरूप में वैवाहिक शक्ति, मातृत्व, करुणा और रक्षक शक्ति के भाव एक साथ दिखाई देते हैं।

मां चंद्रघंटा के मस्तक पर सुशोभित अर्धचंद्र भी भगवान शिव से उनके संबंध को समझने में महत्वपूर्ण है। शिव के स्वरूप में चंद्रमा का विशेष स्थान माना जाता है और माता पार्वती के चंद्रघंटा रूप में भी अर्धचंद्र उनके मस्तक की प्रमुख पहचान बन जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यही अर्धचंद्र घंटे के समान दिखाई देता है, इसलिए देवी को चंद्रघंटा कहा गया। इस प्रकार देवी के नाम और स्वरूप में चंद्र तथा शिव-शक्ति संबंध दोनों का भाव जुड़ा हुआ दिखाई देता है।

मां चंद्रघंटा का स्वरूप यह भी बताता है कि माता पार्वती की शक्ति भगवान शिव के साथ मिलकर केवल सौम्यता तक सीमित नहीं रहती, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर रक्षक और योद्धा शक्ति के रूप में भी प्रकट होती है। देवी को दस भुजाओं और विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों के साथ दर्शाया जाता है तथा उनका वाहन बाघिन बताया गया है। इसके बावजूद उनका मुख शांत और भक्तों के कल्याणकारी रूप में वर्णित है। इस विरोधाभास में धार्मिक रूप से यह संदेश देखा जाता है कि शक्ति के साथ शांति, साहस के साथ विवेक और पराक्रम के साथ करुणा का संतुलन आवश्यक है।

इस प्रकार मां चंद्रघंटा और भगवान शिव का संबंध केवल पति-पत्नी के पौराणिक संबंध तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शिव और शक्ति के आध्यात्मिक मिलन का भी प्रतीक माना जाता है। माता पार्वती का चंद्रघंटा स्वरूप भक्तों को यह संदेश देता है कि जीवन में प्रेम और करुणा के साथ साहस तथा आत्मरक्षा की शक्ति भी आवश्यक है। नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा करते समय भक्त इसी शिव-शक्ति भाव का स्मरण करते हुए देवी से शांति, साहस, संतुलन और धर्म के मार्ग पर दृढ़ रहने की प्रार्थना करते हैं।

मां चंद्रघंटा का स्वरूप और महत्व

मां चंद्रघंटा का स्वरूप शांति, साहस, शक्ति और रक्षक भाव का अद्भुत संतुलन माना जाता है। नवदुर्गा में उनका स्थान तीसरा है और उन्हें माता पार्वती के विवाहित एवं वीर स्वरूप के रूप में पूजा जाता है। धार्मिक परंपरा में उनका वर्णन दस भुजाओं वाली देवी के रूप में मिलता है। उनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित रहता है और उनके हाथों में त्रिशूल, गदा, तलवार, कमंडल, कमल, धनुष, बाण और जपमाला जैसे विभिन्न अस्त्र एवं प्रतीक बताए गए हैं। उनके एक हाथ को अभय मुद्रा और दूसरे को वरद मुद्रा में माना जाता है, जो भक्तों को निर्भयता और आशीर्वाद देने के भाव को दर्शाते हैं।

मां चंद्रघंटा का शांत मुख और अस्त्र-शस्त्रों से युक्त स्वरूप उनके महत्व को विशेष बनाता है। उनका स्वरूप यह भाव प्रकट करता है कि शक्ति का अर्थ केवल आक्रामकता नहीं है, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर धर्म और अपने प्रियजनों की रक्षा करने की क्षमता भी शक्ति का हिस्सा है। धार्मिक मान्यता में देवी को भक्तों के कल्याण के लिए शांत और सौम्य माना गया है, जबकि उनके हाथों में मौजूद अस्त्र उन्हें अन्याय और नकारात्मक शक्तियों के विरुद्ध तैयार रक्षक स्वरूप प्रदान करते हैं। इसीलिए उन्हें साहस और करुणा के संतुलित रूप के रूप में देखा जाता है।

मां चंद्रघंटा के दस हाथ भी उनके स्वरूप का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। अलग-अलग परंपराओं और चित्रणों में उनके हाथों में धारण की जाने वाली वस्तुओं में कुछ अंतर मिल सकता है, लेकिन त्रिशूल, गदा, तलवार, धनुष-बाण, कमल, जपमाला और कमंडल जैसे प्रतीक प्रमुख रूप से मिलते हैं। इन अस्त्रों को धार्मिक प्रतीक के रूप में शक्ति, रक्षा, विवेक और कठिन परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता से जोड़ा जाता है। अभय मुद्रा निर्भयता और वरद मुद्रा कृपा तथा आशीर्वाद का भाव व्यक्त करती है। इस प्रकार देवी का पूरा स्वरूप केवल युद्ध शक्ति नहीं, बल्कि रक्षा और कल्याण की शक्ति का भी प्रतिनिधित्व करता है।

उनका वाहन परंपरागत रूप से बाघिन बताया जाता है, हालांकि कुछ चित्रणों और परंपराओं में सिंह का भी उल्लेख या चित्रण मिलता है। बाघिन को साहस, शक्ति और निर्भयता का प्रतीक माना जाता है। मां चंद्रघंटा का उस पर आरूढ़ होना उनके वीर और रक्षक स्वरूप को और स्पष्ट करता है। इसी तरह उनके मस्तक पर स्थित घंटे के आकार का अर्धचंद्र उनके नाम की मुख्य पहचान है और धार्मिक मान्यता में उसके नाद को भय तथा नकारात्मकता को दूर करने वाले भाव से जोड़ा जाता है।

इस प्रकार मां चंद्रघंटा का स्वरूप सौम्यता के साथ शक्ति, शांति के साथ साहस और करुणा के साथ रक्षक भाव का संदेश देता है। नवरात्रि के तीसरे दिन उनकी पूजा करते समय भक्त उनके स्वरूप से यह प्रेरणा लेते हैं कि जीवन में मन को शांत रखते हुए कठिन परिस्थितियों का सामना निर्भयता और विवेक के साथ करना चाहिए। मां चंद्रघंटा का यही संतुलित स्वरूप उन्हें नवदुर्गा की साधना में विशेष महत्व प्रदान करता है।

मां चंद्रघंटा के मस्तक पर अर्धचंद्र और घंटे का महत्व

मां चंद्रघंटा के स्वरूप की सबसे प्रमुख पहचान उनके मस्तक पर सुशोभित अर्धचंद्र है। धार्मिक परंपरा के अनुसार उनके मस्तक पर स्थित अर्धचंद्र का आकार घंटे के समान दिखाई देता है, इसी कारण माता को चंद्रघंटा नाम प्राप्त हुआ। इस स्वरूप में ‘चंद्र’ और ‘घंटा’ दोनों का अपना प्रतीकात्मक महत्व माना जाता है। चंद्रमा को शीतलता, शांति और मन के संतुलन से जोड़ा जाता है, जबकि घंटा जागृति और चेतना का प्रतीक माना जाता है। इस प्रकार देवी के नाम और स्वरूप में शांति तथा जागरूकता दोनों का भाव एक साथ दिखाई देता है।

मां चंद्रघंटा के मस्तक पर स्थित चंद्रमा को धार्मिक दृष्टि से मन की शांति और भावनात्मक संतुलन से जोड़ा जाता है। हिंदू परंपरा में चंद्रमा का संबंध मन से माना गया है और देवी के मस्तक पर अर्धचंद्र का होना उनके शांत तथा सौम्य पक्ष को दर्शाने वाला माना जाता है। मां का स्वरूप अस्त्र-शस्त्रों से युक्त होने के बावजूद उनके चेहरे पर शांति और करुणा का भाव दिखाता है। इसलिए अर्धचंद्र यह संदेश देता है कि बाहरी परिस्थितियां कितनी भी चुनौतीपूर्ण हों, व्यक्ति को अपने भीतर मानसिक संतुलन और शांति बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए।

घंटा मां चंद्रघंटा के नाम का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा है। धार्मिक परंपरा में मंदिरों और पूजा-अनुष्ठानों में घंटा बजाने की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है। घंटा-ध्वनि को पूजा के वातावरण को पवित्र बनाने, मन को एकाग्र करने और जागृति उत्पन्न करने के भाव से जोड़ा जाता है। मां चंद्रघंटा के मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र इसी प्रतीकात्मक अर्थ को और विशेष बना देता है। देवी के इस स्वरूप का ध्यान करते हुए भक्त अपने भीतर भय, आलस्य और नकारात्मक विचारों को छोड़कर जागरूकता और सकारात्मकता का भाव विकसित करने की प्रेरणा लेते हैं।

अर्धचंद्र और घंटा मिलकर मां चंद्रघंटा के संतुलित स्वरूप को व्यक्त करते हैं। अर्धचंद्र शीतलता और शांति का भाव देता है, जबकि घंटा साहस, जागृति और सक्रिय चेतना से जुड़ा माना जाता है। देवी स्वयं भी शांत मुख के साथ अस्त्र-शस्त्र धारण किए हुए दिखाई देती हैं। इसलिए उनके मस्तक का यह प्रतीकात्मक स्वरूप यह संदेश देता है कि जीवन में केवल शांत रहना पर्याप्त नहीं है और केवल शक्ति का प्रदर्शन भी आवश्यक नहीं है; सही समय पर शांत मन से निर्णय लेना और आवश्यकता पड़ने पर साहस के साथ कार्य करना अधिक महत्वपूर्ण है।

इस प्रकार मां चंद्रघंटा के मस्तक पर अर्धचंद्र और घंटे का महत्व उनके पूरे स्वरूप को समझने की कुंजी माना जा सकता है। अर्धचंद्र शांति और संतुलन का तथा घंटा जागृति और चेतना का प्रतीक माना जाता है। नवरात्रि के तीसरे दिन देवी की पूजा करते समय इस स्वरूप का ध्यान भक्तों को यह आध्यात्मिक संदेश देता है कि मन को शांत रखते हुए जीवन की चुनौतियों के प्रति सजग और साहसी रहना चाहिए। यही मां चंद्रघंटा के अर्धचंद्र और घंटे से जुड़ा प्रमुख धार्मिक भाव है।

मां चंद्रघंटा की पूजा का महत्व

मां चंद्रघंटा की पूजा का मुख्य संबंध साहस, शक्ति, निर्भयता, शांति और आत्मबल से माना जाता है। नवरात्रि के तीसरे दिन नवदुर्गा के इस स्वरूप की आराधना करने की परंपरा है। मां चंद्रघंटा का स्वरूप माता पार्वती के ऐसे रूप के रूप में वर्णित किया जाता है, जिसमें सौम्यता और रक्षक शक्ति दोनों एक साथ दिखाई देते हैं।

उनके मस्तक पर अर्धचंद्र, दस भुजाओं में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र और बाघिन पर आरूढ़ स्वरूप देवी की शक्ति और पराक्रम का प्रतीक माना जाता है, जबकि उनका शांत मुख करुणा और संतुलन का भाव व्यक्त करता है। इसलिए उनकी पूजा में भक्त अपने जीवन के भय और कठिन परिस्थितियों का सामना करने के लिए साहस और मानसिक स्थिरता की प्रार्थना करते हैं।

मां चंद्रघंटा की आराधना का एक महत्वपूर्ण भाव निर्भयता से जुड़ा हुआ है। धार्मिक मान्यता के अनुसार देवी का स्वरूप भक्तों की रक्षा करने वाला और नकारात्मक शक्तियों का सामना करने में समर्थ माना जाता है। उनके हाथों में धारण किए गए अस्त्र-शस्त्र इसी रक्षक शक्ति के प्रतीक हैं। इसलिए नवरात्रि के तीसरे दिन उनकी पूजा करते समय भक्त अपने भीतर मौजूद भय, असुरक्षा और कमजोरी को दूर करने तथा कठिन परिस्थितियों में आत्मविश्वास बनाए रखने की प्रार्थना करते हैं। इसे देवी की धार्मिक मान्यता और आध्यात्मिक प्रतीकात्मकता के रूप में समझना चाहिए, न कि किसी निश्चित भौतिक परिणाम की गारंटी के रूप में।

मां चंद्रघंटा की पूजा का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष शांति और शक्ति का संतुलन है। देवी का चेहरा शांत है, लेकिन उनका पूरा स्वरूप युद्ध के लिए तैयार दिखाई देता है। यह धार्मिक रूप से यह संदेश देता है कि शक्ति के साथ विवेक और साहस के साथ संयम होना आवश्यक है। जीवन में कई परिस्थितियां ऐसी होती हैं जहां तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय शांत मन से निर्णय लेना अधिक उचित होता है, जबकि अन्य परिस्थितियों में अन्याय या कठिनाई के सामने दृढ़ता से खड़ा होना आवश्यक हो सकता है। मां चंद्रघंटा का स्वरूप इन दोनों गुणों के संतुलन की प्रेरणा देता है।

देवी के मस्तक पर स्थित अर्धचंद्र और घंटे को भी उनकी पूजा के महत्व से जोड़ा जाता है। अर्धचंद्र को शीतलता और मन की शांति का प्रतीक माना जाता है, जबकि घंटा जागृति और चेतना से जुड़ा हुआ माना जाता है। इसलिए मां चंद्रघंटा की पूजा को अपने मन को शांत रखते हुए परिस्थितियों के प्रति सजग रहने की साधना के रूप में देखा जा सकता है। पूजा के दौरान घंटी बजाना, मंत्र-जाप करना, दीप और धूप अर्पित करना तथा देवी का ध्यान करना भक्त के लिए श्रद्धा और एकाग्रता का माध्यम बनता है।

इस प्रकार मां चंद्रघंटा की पूजा का महत्व केवल नवरात्रि के तीसरे दिन एक देवी की आराधना करने तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके स्वरूप में निहित साहस, निर्भयता, आत्मबल, शांति और संतुलन को अपने जीवन में अपनाने की प्रेरणा से भी जुड़ा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार देवी की आराधना भक्त को कठिन परिस्थितियों का सामना करने का मनोबल प्रदान करने वाली मानी जाती है। नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा का ध्यान इसलिए विशेष माना जाता है क्योंकि उनका स्वरूप यह संदेश देता है कि मन शांत हो, निर्णयों में विवेक हो और आवश्यकता पड़ने पर धर्म तथा सत्य के पक्ष में खड़े होने का साहस भी बना रहे।

मां चंद्रघंटा की पूजा विधि

मां चंद्रघंटा की पूजा नवरात्रि के तीसरे दिन प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करने के बाद श्रद्धा और एकाग्रता के साथ की जाती है। सबसे पहले पूजा स्थान की अच्छी तरह सफाई करके मां चंद्रघंटा की तस्वीर या प्रतिमा को चौकी पर स्थापित करें और यदि पहले दिन घटस्थापना की गई है तो उसी स्थान पर स्थापित कलश, जौ और अखंड ज्योत की भी पूजा जारी रखें।

इसके बाद दीपक और धूप जलाकर भगवान गणेश तथा अपने इष्ट देव का स्मरण करें और मां चंद्रघंटा का ध्यान करते हुए पूजा का संकल्प लें। देवी के शांत और शक्तिशाली स्वरूप का ध्यान करते हुए मन में श्रद्धा, शांति और निर्भयता का भाव रखना पूजा की शुरुआत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

इसके बाद मां चंद्रघंटा को चंदन, रोली या कुमकुम, अक्षत और पुष्प अर्पित करें। देवी के मस्तक पर स्थित अर्धचंद्र और उनके हाथों में धारण किए गए अस्त्र-शस्त्रों का ध्यान करते हुए उनसे साहस, आत्मबल और विवेक की प्रार्थना करें। इसके बाद धूप और दीप अर्पित करके देवी को अपनी परंपरा के अनुसार नैवेद्य या भोग चढ़ाएं। मां चंद्रघंटा के प्रचलित मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप करें और यदि परिवार में नवरात्रि के दौरान दुर्गा सप्तशती, देवी कवच या अन्य पाठ की परंपरा है तो उसे भी पूजा में शामिल किया जा सकता है।

मंत्र-जाप और भोग अर्पित करने के बाद मां चंद्रघंटा की आरती करें। आरती के समय देवी के मस्तक पर सुशोभित अर्धचंद्र, उनके शक्तिशाली स्वरूप और भक्तों की रक्षा करने वाली देवी के रूप का ध्यान किया जा सकता है। आरती के बाद देवी को प्रणाम करके अपनी प्रार्थना रखें और प्रसाद ग्रहण करें। यदि भक्त नवरात्रि का व्रत रख रहा है तो पूजा के बाद अपनी व्रत-परंपरा के अनुसार फलाहार या सात्त्विक आहार लिया जा सकता है। घर में स्थापित अखंड ज्योत हो तो उसकी नियमित देखभाल भी उसी पारिवारिक परंपरा के अनुसार करते रहें।

मां चंद्रघंटा की पूजा में घंटी बजाने का भी विशेष धार्मिक भाव माना जाता है, क्योंकि उनके नाम में घंटा प्रमुख प्रतीक है। पूजा के दौरान घंटी बजाते समय देवी का स्मरण करते हुए मन को एकाग्र रखने और नकारात्मक विचारों से दूर रहने का भाव रखा जा सकता है। हालांकि पूजा की हर सामग्री या हर प्रक्रिया सभी परिवारों में समान नहीं होती, इसलिए अपनी कुल-परंपरा, स्थानीय रीति और गुरु या परिवार में चली आ रही पूजा-पद्धति के अनुसार आवश्यक परिवर्तन किए जा सकते हैं।

इस प्रकार मां चंद्रघंटा की पूजा विधि में स्नान और शुद्धता, संकल्प, देवी का ध्यान, दीप-धूप, पुष्प एवं पूजन सामग्री अर्पण, मंत्र-जाप, भोग और आरती मुख्य चरण माने जा सकते हैं। पूजा का वास्तविक भाव केवल विधि पूरी करना नहीं, बल्कि देवी के स्वरूप से जुड़े साहस, शांति, आत्मबल और संतुलन को अपने जीवन में अपनाने का प्रयास करना है। नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की आराधना करते हुए भक्त उनसे निर्भयता, सद्बुद्धि और कठिन परिस्थितियों में सही निर्णय लेने की शक्ति के लिए प्रार्थना कर सकते हैं।

मां चंद्रघंटा की पूजा सामग्री

मां चंद्रघंटा की पूजा के लिए सामान्य नवरात्रि पूजन सामग्री का उपयोग किया जाता है और इसमें बहुत अधिक जटिल सामग्री की आवश्यकता नहीं होती। पूजा के लिए मां चंद्रघंटा की तस्वीर या प्रतिमा, पूजा की चौकी, स्वच्छ वस्त्र, कलश, जल, गंगाजल, नारियल, आम या अन्य शुभ पत्ते, रोली या कुमकुम, चंदन, अक्षत, पुष्प, पुष्पमाला, धूप, दीपक, घी या तेल, कपूर, नैवेद्य और प्रसाद रखे जा सकते हैं।

यदि नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना की गई है तो उसी कलश, जौ और अखंड ज्योत को तीसरे दिन की पूजा में भी शामिल किया जाता है। पूजा सामग्री का मुख्य उद्देश्य देवी के प्रति श्रद्धा और विधिपूर्वक पूजन करना है, इसलिए उपलब्ध सामग्री के अनुसार पूजा की जा सकती है।

मां चंद्रघंटा को लाल और पीले रंग के पुष्प अर्पित करने की परंपरा कई स्थानों पर मिलती है और पूजा में ताजे तथा स्वच्छ फूलों का प्रयोग किया जा सकता है। देवी के स्वरूप में अर्धचंद्र, घंटा, अस्त्र-शस्त्र और बाघिन जैसे प्रतीकों का विशेष महत्व है, इसलिए पूजा करते समय इनका ध्यान करते हुए पुष्प अर्पित करना देवी के स्वरूप के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का माध्यम माना जाता है। यदि किसी विशेष फूल की उपलब्धता न हो तो केवल उसी फूल को अनिवार्य मानने के बजाय स्वच्छ और श्रद्धापूर्वक उपलब्ध पुष्प अर्पित करना उचित है।

पूजा के लिए घी का दीपक, धूप और कपूर भी रखे जा सकते हैं। मां चंद्रघंटा की आराधना में घंटी का विशेष प्रतीकात्मक महत्व है, इसलिए पूजा स्थान पर घंटी उपलब्ध हो तो आरती और पूजा के समय उसका उपयोग किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त देवी के मंत्र-जाप के लिए जपमाला रखी जा सकती है। पूजा के अंत में अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार फल, मिठाई या अन्य सात्त्विक नैवेद्य अर्पित करके आरती की जाती है और प्रसाद परिवार के सदस्यों में श्रद्धापूर्वक वितरित किया जाता है।

मां चंद्रघंटा पूजा सामग्री की संक्षिप्त सूची: मां चंद्रघंटा की तस्वीर या प्रतिमा, पूजा चौकी, स्वच्छ कपड़ा, कलश और जल, नारियल, पत्ते, रोली या कुमकुम, चंदन, अक्षत, ताजे पुष्प, पुष्पमाला, धूप, दीपक, घी या तेल, कपूर, घंटी, जपमाला, नैवेद्य और प्रसाद सामग्री रखी जा सकती है।

यदि घर में पहले से घटस्थापना की गई है तो कलश, जौ और अखंड ज्योत की पूजा के लिए आवश्यक सामग्री भी साथ रखें। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में पूजा की सामग्री तथा भोग की परंपरा अलग हो सकती है, इसलिए अपनी कुल-परंपरा और स्थानीय पूजा-पद्धति को प्राथमिकता देना उचित माना जाता है।

मां चंद्रघंटा का भोग और प्रिय फूल

मां चंद्रघंटा को नवरात्रि के तीसरे दिन खीर का भोग अर्पित करने की परंपरा मिलती है। द्रिक पंचांग के अनुसार नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा को खीर प्रसाद के रूप में अर्पित की जाती है और इसे देवी की आराधना से जुड़ी पारंपरिक भोग-परंपरा माना जाता है। खीर दूध और चावल से बनाई जा सकती है तथा इसमें अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार चीनी, इलायची या अन्य सात्त्विक सामग्री का प्रयोग किया जाता है। पूजा के बाद खीर को प्रसाद के रूप में परिवार के सदस्यों में श्रद्धापूर्वक वितरित किया जा सकता है।

मां चंद्रघंटा का प्रिय फूल चमेली माना जाता है। द्रिक पंचांग में देवी चंद्रघंटा के प्रिय पुष्प के रूप में चमेली का उल्लेख मिलता है। इसलिए नवरात्रि के तीसरे दिन मां की पूजा करते समय ताजे और स्वच्छ चमेली के फूल अर्पित किए जा सकते हैं। फूल अर्पित करते समय देवी के शांत और शक्तिशाली स्वरूप का ध्यान करना तथा उनसे साहस, शांति और आत्मबल की प्रार्थना करना पूजा के धार्मिक भाव को और गहरा करता है।

मां चंद्रघंटा को खीर और चमेली अर्पित करने का मुख्य उद्देश्य श्रद्धा और भक्ति के साथ देवी का पूजन करना है। अलग-अलग क्षेत्रों, परिवारों और पूजा-पद्धतियों में भोग तथा पुष्प की परंपरा में कुछ अंतर हो सकता है, इसलिए केवल एक सामग्री को अनिवार्य मानना उचित नहीं है।

यदि चमेली उपलब्ध न हो तो स्वच्छ और श्रद्धापूर्वक कोई अन्य पुष्प अर्पित किया जा सकता है और यदि किसी कारण से खीर बनाना संभव न हो तो अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार अन्य सात्त्विक नैवेद्य अर्पित किया जा सकता है।

इस प्रकार नवरात्रि के तीसरे दिन खीर का भोग और चमेली का पुष्प मां चंद्रघंटा की पूजा से जुड़ी प्रमुख पारंपरिक सामग्री माने जाते हैं। खीर को देवी के प्रति प्रेम और श्रद्धा से अर्पित किया जाता है, जबकि चमेली उनके प्रिय पुष्प के रूप में पूजा में स्थान पाती है। भोग और पुष्प अर्पित करते समय मां चंद्रघंटा के अर्धचंद्र, घंटे और रक्षक स्वरूप का ध्यान करते हुए जीवन में शांति, साहस, विवेक और सकारात्मकता बनाए रखने की प्रार्थना करना इस पूजा के आध्यात्मिक भाव के अनुरूप माना जाता है।

मां चंद्रघंटा का मंत्र और आरती

मां चंद्रघंटा की पूजा में उनके मूल मंत्र का जाप विशेष रूप से किया जाता है। द्रिक पंचांग के अनुसार मां चंद्रघंटा का प्रचलित मंत्र “ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः॥” है। नवरात्रि के तीसरे दिन देवी की पूजा करते समय इस मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप किया जा सकता है। मंत्र-जाप का उद्देश्य देवी के स्वरूप का ध्यान करते हुए मन को एकाग्र करना और उनके शांत, शक्तिशाली तथा रक्षक रूप के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना माना जाता है।

मां चंद्रघंटा का मुख्य मंत्र:
ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः॥

पूजा के दौरान इस मंत्र का जाप अपनी श्रद्धा और पारिवारिक परंपरा के अनुसार किया जा सकता है। यदि साधक जपमाला से जाप करना चाहता है तो ऐसा कर सकता है। मंत्र का जाप करते समय मां चंद्रघंटा के मस्तक पर सुशोभित अर्धचंद्र, उनके दस भुजाओं वाले स्वरूप और बाघिन पर आरूढ़ देवी का ध्यान किया जा सकता है। द्रिक पंचांग में इस मंत्र के साथ मां चंद्रघंटा की प्रार्थना और स्तुति का भी उल्लेख मिलता है।

मां चंद्रघंटा की प्रार्थना:
पिण्डज प्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यम् चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥

इस प्रार्थना के माध्यम से देवी के शक्तिशाली और रक्षक स्वरूप का स्मरण किया जाता है। इसके अतिरिक्त “या देवी सर्वभूतेषु माँ चन्द्रघण्टा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥” स्तुति का पाठ भी देवी की आराधना में किया जा सकता है।

पूजा के अंत में मां चंद्रघंटा की आरती श्रद्धापूर्वक की जाती है। आरती के दौरान दीप या कपूर जलाकर देवी के समक्ष घुमाया जाता है और परिवार की परंपरा के अनुसार मां चंद्रघंटा की आरती गाई जाती है। आरती में देवी को सुख प्रदान करने वाली, भक्तों की रक्षा करने वाली और संकटों से बचाने वाली शक्ति के रूप में स्मरण किया जाता है। द्रिक पंचांग पर मां चंद्रघंटा की एक प्रचलित आरती भी दी गई है, जिसका उपयोग पूजा में किया जा सकता है।

मां चंद्रघंटा की पूजा में मंत्र, प्रार्थना, स्तुति और आरती का मुख्य भाव देवी के प्रति श्रद्धा और समर्पण है। मंत्र-जाप मन को एकाग्र करने, प्रार्थना देवी से कृपा मांगने और आरती भक्ति तथा कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम मानी जाती है।

इसलिए नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा का मंत्र-जाप और आरती करते समय उनसे केवल मनोकामना की पूर्ति ही नहीं, बल्कि शांति, साहस, विवेक, आत्मबल और कठिन परिस्थितियों में सही मार्ग पर चलने की शक्ति के लिए भी प्रार्थना करना उनके स्वरूप के धार्मिक भाव के अनुरूप माना जाता है।

मां चंद्रघंटा की पूजा के नियम

मां चंद्रघंटा की पूजा में शुद्धता, श्रद्धा, संयम और सात्त्विक आचरण को विशेष महत्व दिया जाता है। नवरात्रि के तीसरे दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थान को साफ करके मां चंद्रघंटा की पूजा आरंभ करें। यदि नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना की गई है तो स्थापित कलश, जौ और अखंड ज्योत की पूजा भी नियमित रूप से जारी रखें।

पूजा के दौरान मन को शांत और एकाग्र रखना चाहिए तथा अनावश्यक क्रोध, विवाद और नकारात्मक विचारों से दूर रहने का प्रयास करना चाहिए। देवी का स्वरूप शक्ति और साहस से जुड़ा होने के बावजूद उनका मुख शांत बताया जाता है, इसलिए पूजा में साहस के साथ शांति और विवेक का भाव रखना महत्वपूर्ण माना जाता है।

मां चंद्रघंटा की पूजा में देवी को स्वच्छ और सात्त्विक पूजा सामग्री अर्पित करनी चाहिए। पुष्प, चंदन, रोली या कुमकुम, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य अपनी परंपरा के अनुसार अर्पित किए जा सकते हैं। पूजा के दौरान देवी के मुख्य मंत्र “ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः॥” का श्रद्धापूर्वक जाप किया जा सकता है।

देवी के नाम में घंटा होने के कारण पूजा और आरती के समय घंटी बजाने की परंपरा भी विशेष भाव रखती है। हालांकि पूजा की सभी सामग्री या मंत्र-जाप की संख्या को हर व्यक्ति के लिए अनिवार्य नहीं माना जाना चाहिए; अपनी पारिवारिक परंपरा और श्रद्धा के अनुसार पूजा करना उचित है।

यदि भक्त नवरात्रि का व्रत रख रहा है तो उसे अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत के नियमों का पालन करना चाहिए। सामान्यतः नवरात्रि में मांसाहार, शराब और तामसिक भोजन से दूर रहने की परंपरा है तथा फलाहार या सात्त्विक आहार ग्रहण किया जाता है। अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में व्रत के नियम अलग हो सकते हैं, इसलिए किसी एक नियम को सभी के लिए अनिवार्य मानना उचित नहीं है। स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने पर कठोर उपवास करने के बजाय पर्याप्त और उचित भोजन लेना अधिक महत्वपूर्ण है।

मां चंद्रघंटा की पूजा करते समय देवी के रक्षक और कल्याणकारी स्वरूप का ध्यान करना चाहिए। उनकी दस भुजाओं में धारण किए गए अस्त्र-शस्त्र को धर्म की रक्षा और नकारात्मक शक्तियों के विरुद्ध शक्ति के प्रतीक के रूप में माना जाता है। इसलिए पूजा के दौरान किसी के प्रति द्वेष या हिंसक भावना रखने के बजाय अपने भीतर साहस, आत्मसंयम और सही कार्य के लिए खड़े होने की भावना विकसित करना देवी की आराधना के अनुरूप माना जाता है। पूजा के बाद देवी को भोग अर्पित करके आरती करें और प्रसाद श्रद्धापूर्वक ग्रहण करें।

इस प्रकार मां चंद्रघंटा की पूजा के नियम किसी कठिन या अत्यधिक जटिल प्रक्रिया पर आधारित नहीं हैं, बल्कि उनका मूल भाव स्वच्छता, सात्त्विकता, श्रद्धा, संयम, एकाग्रता और सदाचार है। नवरात्रि के तीसरे दिन देवी की आराधना करते समय उनके शांत और शक्तिशाली स्वरूप को ध्यान में रखकर जीवन में भी शांति के साथ साहस, शक्ति के साथ विवेक और कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने का प्रयास करना मां चंद्रघंटा की पूजा के धार्मिक भाव को सार्थक बनाता है।

मां चंद्रघंटा की पूजा के लाभ

धार्मिक मान्यता के अनुसार मां चंद्रघंटा की पूजा साहस, आत्मबल, निर्भयता, मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा से जुड़ी मानी जाती है। नवरात्रि के तीसरे दिन देवी के इस स्वरूप की आराधना करते समय भक्त उनसे जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना करने के लिए धैर्य और शक्ति की प्रार्थना करते हैं।

मां चंद्रघंटा का स्वरूप एक ओर शांत और करुणामय है, वहीं दूसरी ओर वह अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित रक्षक शक्ति के रूप में वर्णित है। इसी कारण उनकी पूजा से जुड़े आध्यात्मिक लाभों को मुख्य रूप से व्यक्ति के भीतर साहस और संतुलन विकसित करने की प्रेरणा के रूप में समझा जाता है।

मां चंद्रघंटा की आराधना का एक प्रमुख लाभ भय और अस्थिरता से ऊपर उठने की प्रेरणा माना जाता है। धार्मिक परंपरा में देवी को भक्तों की रक्षा करने वाली शक्ति के रूप में देखा जाता है और उनके हाथों में मौजूद अस्त्र-शस्त्र नकारात्मक शक्तियों के विरुद्ध सामर्थ्य का प्रतीक माने जाते हैं।

इसलिए भक्त देवी की पूजा करते समय अपने भीतर मौजूद डर, असुरक्षा और कमजोरियों का सामना करने तथा कठिन परिस्थितियों में आत्मविश्वास बनाए रखने की प्रार्थना करते हैं। यह देवी के स्वरूप से जुड़ी धार्मिक मान्यता है, इसे किसी निश्चित भौतिक या चिकित्सीय परिणाम की गारंटी के रूप में नहीं समझना चाहिए।

मां चंद्रघंटा की पूजा से मन की शांति और संतुलन का भाव भी जुड़ा हुआ है। उनके मस्तक पर स्थित अर्धचंद्र को धार्मिक परंपरा में शीतलता और मानसिक संतुलन का प्रतीक माना जाता है, जबकि घंटे को जागृति और चेतना से जोड़ा जाता है। इस प्रकार देवी का स्वरूप भक्त को यह प्रेरणा देता है कि कठिन परिस्थितियों में घबराने के बजाय शांत मन से विचार करना और आवश्यकता पड़ने पर साहसपूर्वक निर्णय लेना चाहिए। उनकी पूजा, मंत्र-जाप और ध्यान इसी प्रकार मन को एकाग्र करने तथा सकारात्मक भाव विकसित करने का माध्यम माने जा सकते हैं।

देवी की आराधना का एक अन्य महत्वपूर्ण लाभ आत्मविश्वास और दृढ़ता की प्रेरणा है। मां चंद्रघंटा का बाघिन पर आरूढ़ और अस्त्र-शस्त्रों से युक्त स्वरूप शक्ति तथा निर्भयता का प्रतीक माना जाता है। भक्त उनके इस स्वरूप का ध्यान करते हुए अपने जीवन की चुनौतियों से भागने के बजाय उनका सामना करने का संकल्प ले सकते हैं। साथ ही देवी का शांत मुख यह सिखाता है कि साहस का अर्थ केवल आक्रामक होना नहीं है, बल्कि सही समय पर शांत रहकर विवेकपूर्ण निर्णय लेना भी साहस का ही हिस्सा है।

इस प्रकार मां चंद्रघंटा की पूजा के प्रमुख लाभों को निर्भयता, आत्मबल, मानसिक शांति, साहस, विवेक और सकारात्मक दृष्टिकोण की प्रेरणा के रूप में समझा जाता है। नवरात्रि के तीसरे दिन उनकी आराधना करते समय भक्त देवी से केवल किसी विशेष मनोकामना की पूर्ति की प्रार्थना न करके अपने भीतर उन गुणों को विकसित करने का संकल्प भी ले सकते हैं, जिनका मां चंद्रघंटा का स्वरूप प्रतीक माना जाता है। यही उनकी पूजा का सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक लाभ और संदेश है।

मां चंद्रघंटा और नवग्रह शांति

मां चंद्रघंटा का संबंध शुक्र ग्रह से जोड़े जाने की परंपरा मिलती है। द्रिक पंचांग के अनुसार मान्यता है कि मां चंद्रघंटा शुक्र ग्रह की अधिष्ठात्री देवी हैं। हालांकि इसे धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यता के रूप में ही समझना चाहिए, इसे वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित प्रभाव नहीं माना जा सकता।

मां चंद्रघंटा का मूल स्वरूप शांति, सौम्यता, शक्ति, साहस और संतुलन से जुड़ा है, जबकि वैदिक ज्योतिष में शुक्र को प्रेम, संबंध, सौंदर्य, कला, सुख-सुविधा और भौतिक समृद्धि जैसे विषयों से जोड़ा जाता है। इसलिए इस परंपरा में देवी की उपासना को शुक्र से संबंधित सकारात्मक गुणों के लिए आध्यात्मिक साधना के रूप में देखा जाता है।

ज्योतिषीय परंपरा में शुक्र ग्रह को विवाह, दांपत्य संबंध, प्रेम, कला, सौंदर्य, आकर्षण, विलासिता, भौतिक सुख और रचनात्मकता का कारक माना जाता है। मां चंद्रघंटा के स्वरूप में भी शांति, सौम्यता और शक्ति का संतुलन दिखाई देता है।

इसलिए धार्मिक-ज्योतिषीय दृष्टि से उनकी आराधना को व्यक्ति के जीवन में संबंधों में सामंजस्य, व्यवहार में सौम्यता और सुख-सुविधाओं के प्रति संतुलित दृष्टिकोण विकसित करने की प्रेरणा से जोड़ा जा सकता है। यह किसी कुंडली में शुक्र के फल का निश्चित परिवर्तन नहीं, बल्कि देवी के स्वरूप और शुक्र से जुड़ी ज्योतिषीय अवधारणाओं के बीच स्थापित पारंपरिक संबंध है।

यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में शुक्र को कमजोर, पीड़ित या प्रतिकूल स्थिति में माना जाता है, तो नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा को पारंपरिक आध्यात्मिक उपाय के रूप में किया जा सकता है। देवी का मंत्र “ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः॥” श्रद्धापूर्वक जपना, दीप-धूप अर्पित करना और देवी का ध्यान करना इस साधना का हिस्सा हो सकता है। लेकिन केवल शुक्र की स्थिति देखकर सभी व्यक्तियों के लिए एक जैसा उपाय निर्धारित करना उचित नहीं है; कुंडली में शुक्र की राशि, भाव, दृष्टि, युति, बल और दशा आदि को देखकर व्यक्तिगत ज्योतिषीय निष्कर्ष निकाला जाता है।

मां चंद्रघंटा की उपासना को केवल शुक्र शांति तक सीमित करना भी उचित नहीं होगा, क्योंकि देवी का मुख्य धार्मिक महत्व साहस, निर्भयता, शांति और रक्षक शक्ति से जुड़ा है। इसलिए ग्रह संबंध को देवी की पूजा का एक पारंपरिक ज्योतिषीय पक्ष माना जाना चाहिए, जबकि उनकी आराधना का व्यापक आध्यात्मिक भाव अपने भीतर शांति और शक्ति का संतुलन विकसित करना है। इस दृष्टि से मां चंद्रघंटा की पूजा व्यक्ति को संबंधों में मधुरता के साथ आत्मसम्मान, सुख के साथ संयम और शक्ति के साथ विवेक बनाए रखने की प्रेरणा देती है।

इस प्रकार मां चंद्रघंटा और शुक्र ग्रह का संबंध नवदुर्गा से जुड़ी पारंपरिक ज्योतिषीय मान्यता है। देवी की आराधना को शुक्र से संबंधित विषयों में सकारात्मक भाव और संतुलन के लिए आध्यात्मिक साधना के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन इसे कुंडली के हर शुक्र दोष का निश्चित समाधान नहीं कहना चाहिए।

नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा का ध्यान, मंत्र-जाप और पूजा करते हुए शांति, प्रेम, सौम्यता, आत्मबल और संतुलित जीवन के लिए प्रार्थना करना उनके स्वरूप और इस पारंपरिक ग्रह-संबंध दोनों के अनुरूप माना जा सकता है।

मां चंद्रघंटा का संदेश और निष्कर्ष

मां चंद्रघंटा नवदुर्गा का तीसरा स्वरूप हैं, जिन्हें धार्मिक परंपरा में शांति, साहस, शक्ति, निर्भयता और संतुलन का प्रतीक माना जाता है। उनके मस्तक पर सुशोभित अर्धचंद्र, घंटे के आकार की उनकी पहचान, दस भुजाओं में धारण किए गए अस्त्र-शस्त्र और बाघिन पर आरूढ़ स्वरूप उनके शक्तिशाली तथा रक्षक रूप को दर्शाते हैं,

जबकि उनका शांत मुख करुणा और मानसिक संतुलन का भाव प्रकट करता है। इसी कारण उनका स्वरूप यह संदेश देता है कि जीवन में केवल शक्ति होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस शक्ति के साथ शांति, विवेक और संयम होना भी आवश्यक है।

मां चंद्रघंटा का सबसे महत्वपूर्ण संदेश भय के सामने साहस के साथ खड़े होने का है। जीवन में कठिन परिस्थितियां, चुनौतियां और अनिश्चितताएं आती रहती हैं, लेकिन हर परिस्थिति में घबराने के बजाय शांत मन से उसका सामना करना आवश्यक है। देवी के हाथों में मौजूद अस्त्र-शस्त्र धार्मिक रूप से इसी रक्षक शक्ति और आत्मबल के प्रतीक माने जाते हैं।

वहीं उनके मस्तक का अर्धचंद्र यह प्रेरणा देता है कि कठिन समय में भी मन को संतुलित और शांत रखने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार मां चंद्रघंटा का स्वरूप बाहरी शक्ति और आंतरिक शांति के बीच संतुलन स्थापित करने की प्रेरणा देता है।

नवरात्रि की साधना के क्रम में मां चंद्रघंटा का स्थान भी विशेष अर्थ रखता है। पहले दिन मां शैलपुत्री के माध्यम से स्थिरता और आधार, दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी के माध्यम से तपस्या और दृढ़ संकल्प तथा तीसरे दिन मां चंद्रघंटा के माध्यम से साहस और शक्ति का भाव सामने आता है।

इस क्रम को आध्यात्मिक यात्रा के रूप में देखा जाए तो व्यक्ति पहले अपने भीतर आधार और संकल्प को मजबूत करता है और फिर जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना करने के लिए साहस विकसित करता है। इसलिए तीसरे दिन की पूजा केवल देवी की आराधना ही नहीं, बल्कि अपने भीतर निर्भयता और आत्मविश्वास के भाव को मजबूत करने का अवसर भी मानी जाती है।

मां चंद्रघंटा से जुड़े पारंपरिक ज्योतिषीय संबंध में शुक्र ग्रह का उल्लेख मिलता है, लेकिन इसे धार्मिक-ज्योतिषीय मान्यता के रूप में ही समझना चाहिए। देवी की पूजा को किसी कुंडली में शुक्र के निश्चित दोष को समाप्त करने का वैज्ञानिक प्रमाणित उपाय नहीं माना जा सकता। मां चंद्रघंटा की आराधना का व्यापक संदेश इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है—जीवन में प्रेम और संबंधों के साथ आत्मसम्मान, सुख-सुविधाओं के साथ संयम और शक्ति के साथ विवेक बनाए रखना।

इस प्रकार शारदीय नवरात्रि 2026 के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा भक्तों को शांति और शक्ति के संतुलन का संदेश देती है। देवी का स्वरूप हमें सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों से भागने के बजाय उनका सामना साहस से करना चाहिए, लेकिन साहस के साथ विवेक और मन में शांति बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।

नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा का ध्यान, मंत्र-जाप और पूजा करते हुए भक्त उनसे निर्भयता, आत्मबल, सद्बुद्धि, मानसिक शांति और सही मार्ग पर दृढ़ रहने की शक्ति के लिए प्रार्थना कर सकते हैं। यही मां चंद्रघंटा के स्वरूप का मुख्य संदेश और इस पूरे लेख का सार है।

Disclaimer (अस्वीकरण): इस लेख में दी गई धार्मिक जानकारी, पौराणिक कथाएं, पूजा-विधि और मान्यताएं हिंदू धार्मिक परंपराओं पर आधारित हैं। नवरात्रि की तिथि, व्रत, पूजा-मुहूर्त, सूर्योदय और अन्य पंचांग संबंधी विवरण प्रचलित पंचांग की गणनाओं पर आधारित हो सकते हैं। स्थान, स्थानीय सूर्योदय और पंचांग की पद्धति के अनुसार तिथि तथा मुहूर्त में अंतर संभव है। इसलिए पूजा या व्रत करने से पहले अपने शहर के स्थानीय पंचांग से समय की पुष्टि अवश्य करें। अलग-अलग क्षेत्रों, धार्मिक ग्रंथों और पारिवारिक परंपराओं में कुछ मान्यताएं एवं पूजा-विधियां भिन्न हो सकती हैं।

मां ब्रह्मचारिणी: कथा, पूजा विधि, मंत्र, भोग और महत्व

Sanātana Dharma

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