अपरा एकादशी क्या है?
अपरा एकादशी ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को आने वाली भगवान विष्णु को समर्पित एकादशी है। पद्म पुराण, उत्तरखण्ड, अध्याय 50 में इसके व्रत-माहात्म्य का वर्णन मिलता है।
अपरा एकादशी का अर्थ
“अपरा” का अर्थ असीम या जिसका कोई पार न हो जैसे भावों से जोड़ा जाता है। धार्मिक परंपरा में इस एकादशी को पुण्य और आध्यात्मिक साधना से संबंधित माना गया है।
किसकी पूजा की जाती है?
अपरा एकादशी पर मुख्य रूप से भगवान विष्णु की पूजा और नाम-स्मरण किया जाता है।
भक्त अपनी परंपरा के अनुसार व्रत रखते हैं और भगवान विष्णु को तुलसी, पुष्प, चंदन, धूप और दीप अर्पित करते हैं।
शास्त्रीय आधार
पद्म पुराण, उत्तरखण्ड, अध्याय 50 में युधिष्ठिर भगवान श्रीकृष्ण से ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम और माहात्म्य पूछते हैं। भगवान श्रीकृष्ण इस एकादशी को अपरा नाम से बताते हैं और इसके धार्मिक फल का वर्णन करते हैं।
अपरा एकादशी का मुख्य भाव
अपरा एकादशी का धार्मिक संदेश भक्ति, आत्मसंयम, सदाचार और भगवान विष्णु की शरण से जुड़ा है।
इस दिन व्रत के साथ अपने विचारों और व्यवहार में भी संयम रखने तथा अपनी क्षमता के अनुसार दान-सेवा करने का प्रयास किया जा सकता है।
संक्षेप में
अपरा एकादशी = ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की एकादशी + भगवान विष्णु की उपासना + व्रत और आत्मसंयम।
इसका माहात्म्य पद्म पुराण, उत्तरखण्ड, अध्याय 50 में वर्णित है।
अपरा एकादशी का नाम कैसे पड़ा?
अपरा एकादशी का नाम ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी के रूप में पद्म पुराण, उत्तरखण्ड, अध्याय 50 में मिलता है। भगवान श्रीकृष्ण इसे “अपरा” नाम से बताते हैं।
“अपरा” शब्द का अर्थ
“अपरा” का अर्थ अपार, असीम या जिसकी सीमा न हो के भाव में लिया जाता है। इसी कारण धार्मिक परंपरा में इसे अपार पुण्य देने वाली एकादशी के रूप में समझाया गया है।
अपरा एकादशी का धार्मिक भाव
पद्म पुराण में भगवान श्रीकृष्ण अपरा एकादशी के व्रत को अत्यंत पुण्यदायक बताते हैं और इसके प्रभाव की तुलना अनेक धार्मिक कर्मों से करते हैं।
इसी कारण भक्त इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, व्रत, मंत्र-जाप और आत्मसंयम को महत्व देते हैं।
आध्यात्मिक संदेश
“अपार” शब्द से एक सुंदर आध्यात्मिक भाव लिया जा सकता है—मनुष्य को केवल बाहरी उपलब्धियों के पीछे न भागकर भक्ति, सदाचार और अच्छे कर्मों को भी जीवन में बढ़ाना चाहिए।
संक्षेप में
अपरा एकादशी का नाम “अपारा/असीम” फल और पुण्य के धार्मिक भाव से जुड़ा है। पद्म पुराण में इसे ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की एकादशी बताया गया है और भगवान विष्णु की भक्ति के साथ इसके व्रत का माहात्म्य वर्णित है।
अपरा एकादशी कब आती है?
अपरा एकादशी ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को आती है। पद्म पुराण, उत्तरखण्ड, अध्याय 50 में भी ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की एकादशी को अपरा एकादशी बताया गया है।
हर वर्ष इसकी अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख बदलती है, क्योंकि एकादशी की गणना चंद्र तिथि और स्थानीय पंचांग के आधार पर होती है।
2027 में अपरा एकादशी
2027 में अपरा एकादशी 1 जून, मंगलवार को है। पंचांग गणना के अनुसार एकादशी तिथि 31 मई को सुबह 10:02 बजे शुरू होकर 1 जून को सुबह 9:39 बजे समाप्त होगी।
- मास: ज्येष्ठ
- पक्ष: कृष्ण पक्ष
- तिथि: एकादशी
- व्रत की तारीख: 1 जून 2027
- पारण: 2 जून 2027, द्वादशी के निर्धारित समय में
पारण का समय
पारण का सटीक समय स्थान के अनुसार बदलता है। उदाहरण के लिए इंदौर के लिए 2 जून 2027 को पारण समय सुबह 5:41 से 8:23 बजे दिया गया है।
इसलिए वेबसाइट पर सभी जगह के लिए एक ही समय लिखने के बजाय यह रखना बेहतर है:
“अपरा एकादशी के पारण का सही समय अपने शहर के स्थानीय पंचांग के अनुसार देखें।”
एक नजर में
अपरा एकादशी — ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की एकादशी
2027 में — 1 जून, मंगलवार
पारण — 2 जून, बुधवार
नोट: एकादशी और पारण का अंतिम समय अपने शहर के स्थानीय पंचांग के अनुसार ही देखें।
अपरा एकादशी की पौराणिक कथा
अपरा एकादशी का माहात्म्य पद्म पुराण, उत्तरखण्ड, अध्याय 50 में भगवान श्रीकृष्ण और राजा युधिष्ठिर के संवाद के रूप में मिलता है। इसमें ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की एकादशी को अपरा एकादशी कहा गया है।
भगवान श्रीकृष्ण ने बताया महत्व
राजा युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम और महत्व पूछा। भगवान श्रीकृष्ण ने इसे अपरा एकादशी बताया और इसके व्रत को अत्यंत पुण्यदायक कहा।
पद्म पुराण में इस व्रत के प्रभाव की तुलना कई तीर्थ-स्नान, दान और धार्मिक कर्मों से की गई है। ये वर्णन पुराणिक धार्मिक मान्यता के रूप में समझे जाने चाहिए।
राजा महीध्वज की प्रचलित कथा
अपरा एकादशी से जुड़ी प्रचलित व्रत-कथा परंपरा में राजा महीध्वज का प्रसंग मिलता है। उनके छोटे भाई वज्रध्वज ने उनसे द्वेष के कारण उनकी हत्या कर दी और शव को एक पीपल के पेड़ के नीचे छिपा दिया। कथा के अनुसार अकाल मृत्यु के कारण राजा की आत्मा प्रेत-योनि में भटकने लगी।
महर्षि धौम्य से भेंट
एक दिन महर्षि धौम्य उस स्थान से गुजरे। उन्होंने अपने तपोबल से राजा की स्थिति को जाना और प्रेत-योनि से मुक्ति का उपाय बताया।
प्रचलित कथा के अनुसार महर्षि धौम्य ने अपरा एकादशी का व्रत किया और उसका पुण्य राजा महीध्वज को समर्पित किया। इसके प्रभाव से राजा को प्रेत-योनि से मुक्ति मिली और उन्हें दिव्य गति प्राप्त हुई।
कथा से मिलने वाली सीख
इस कथा का मुख्य संदेश है:
- द्वेष और हिंसा से बचना चाहिए।
- अच्छे कर्मों का महत्व समझना चाहिए।
- जरूरतमंद और दुखी व्यक्ति की सहायता करनी चाहिए।
- धार्मिक साधना के साथ करुणा और सेवा को जीवन में अपनाना चाहिए।
शास्त्रीय संदर्भ की जरूरी बात
भाई, वेबसाइट पर इसे सही तरीके से लिखना जरूरी है: पद्म पुराण अध्याय 50 में अपरा एकादशी का माहात्म्य स्पष्ट रूप से मिलता है, जबकि राजा महीध्वज और धौम्य ऋषि वाली कथा अलग व्रत-कथा परंपराओं में अपरा/अचला एकादशी से जोड़ी जाती है। इसलिए इसे सीधे पद्म पुराण अध्याय 50 की कथा बताना उचित नहीं होगा।
निष्कर्ष
अपरा एकादशी की धार्मिक परंपरा भक्ति, प्रायश्चित, सदाचार और भगवान विष्णु की उपासना से जुड़ी है। इसकी कथाएं यह संदेश देती हैं कि गलत कर्मों से बचना चाहिए और जीवन में धर्म, सेवा तथा अच्छे आचरण को स्थान देना चाहिए।
अपरा एकादशी का धार्मिक महत्व
अपरा एकादशी ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की एकादशी है। पद्म पुराण, उत्तरखण्ड, अध्याय 50 में भगवान श्रीकृष्ण ने राजा युधिष्ठिर को इसके माहात्म्य का वर्णन किया है।
भगवान विष्णु की भक्ति
इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, व्रत, नाम-स्मरण और मंत्र-जाप करने की परंपरा है।
पापों से मुक्ति की धार्मिक मान्यता
पद्म पुराण में अपरा एकादशी के व्रत को पापों के निवारण का साधन बताया गया है। यह पुराणिक धार्मिक मान्यता है।
वामन स्वरूप की पूजा
पद्म पुराण के इस अध्याय में अपरा एकादशी के दिन उपवास करके भगवान वामन की पूजा का भी उल्लेख मिलता है।
तीर्थ और दान के समान पुण्य
शास्त्रीय वर्णन में अपरा एकादशी के व्रत के पुण्य की तुलना प्रयाग, काशी, गया, बदरी आदि तीर्थों में किए गए धार्मिक कर्मों और दान से की गई है। इसे पुराणिक धार्मिक फल के रूप में समझना चाहिए।
आत्मसंयम और सदाचार
एकादशी का व्रत व्यक्ति को अपनी इच्छाओं और आचरण पर संयम रखने की प्रेरणा देता है। इस दिन सत्य, सदाचार, भक्ति और सेवा पर ध्यान देना सार्थक माना जा सकता है।
निष्कर्ष
अपरा एकादशी का धार्मिक महत्व भगवान विष्णु की भक्ति, व्रत, आत्मसंयम और पापों के निवारण की पुराणिक मान्यता से जुड़ा है।
इस दिन श्रद्धा से भगवान विष्णु या वामन स्वरूप का स्मरण करते हुए पूजा, मंत्र-जाप और अपनी क्षमता के अनुसार दान-सेवा करना इस एकादशी की धार्मिक भावना के अनुरूप है।
अपरा एकादशी की पूजा विधि
अपरा एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा श्रद्धा और सरल विधि से की जा सकती है। पद्म पुराण में इस एकादशी के संदर्भ में भगवान वामन की पूजा का भी उल्लेख मिलता है।
पूजा की तैयारी
सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। पूजा स्थान साफ करें और भगवान विष्णु या वामन भगवान की प्रतिमा/चित्र के सामने व्रत का संकल्प लें।
पूजा सामग्री
- भगवान विष्णु/वामन की प्रतिमा या चित्र
- जल
- तुलसी दल
- पुष्प
- चंदन
- धूप
- दीप
- फल
- व्रत-अनुकूल नैवेद्य
पूजा क्रम
1. भगवान विष्णु का ध्यान करके व्रत का संकल्प लें।
2. जल, तुलसी और पुष्प अर्पित करें।
3. चंदन, धूप और दीप अर्पित करें।
4. फल या व्रत-अनुकूल नैवेद्य चढ़ाएं।
5. “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥” मंत्र का जाप करें।
6. अपरा एकादशी की कथा पढ़ें या सुनें।
7. भगवान की आरती करें।
8. परिवार के सुख-शांति और सद्बुद्धि के लिए प्रार्थना करें।
दिनभर क्या करें?
अपनी क्षमता के अनुसार व्रत रखें। विष्णु नाम-स्मरण, मंत्र-जाप, भजन और धार्मिक पाठ किया जा सकता है।
इस दिन क्रोध, झूठ, कटु वाणी और अनावश्यक विवाद से बचने का प्रयास करें।
दान और सेवा
अपनी क्षमता के अनुसार भोजन, फल, वस्त्र या उपयोगी वस्तु जरूरतमंद को दान कर सकते हैं।
द्वादशी में पारण
अगले दिन द्वादशी के निर्धारित पारण काल में भगवान विष्णु का स्मरण करके व्रत खोलें। सही समय अपने शहर के स्थानीय पंचांग से देखें।
संक्षेप में
स्नान → संकल्प → विष्णु/वामन पूजा → तुलसी व पुष्प → धूप-दीप → मंत्र-जाप → कथा → आरती → प्रार्थना → दान/सेवा → द्वादशी में पारण।
मुख्य बात: अपरा एकादशी की पूजा में सामग्री से अधिक श्रद्धा, भक्ति और आत्मसंयम का महत्व है।
अपरा एकादशी का व्रत कैसे रखें?
अपरा एकादशी ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है। इस दिन भगवान विष्णु की भक्ति के साथ अपनी क्षमता और परंपरा के अनुसार व्रत रखा जाता है।
व्रत की तैयारी
व्रत की तैयारी दशमी तिथि से की जा सकती है। दशमी के दिन सात्त्विक भोजन करें और अगले दिन के व्रत के लिए मन को तैयार करें।
एकादशी की सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और भगवान विष्णु के सामने व्रत का संकल्प लें।
अपनी क्षमता के अनुसार व्रत
व्रत के अलग-अलग रूप हो सकते हैं:
- निर्जल व्रत
- जल के साथ व्रत
- फलाहार
- अपनी परंपरा के अनुसार व्रत-अनुकूल भोजन
निर्जल व्रत सभी के लिए आवश्यक नहीं है। कमजोरी या स्वास्थ्य संबंधी परेशानी होने पर पानी और आवश्यक भोजन लेना उचित है।
एकादशी के दिन पूजा
भगवान विष्णु या वामन भगवान की पूजा करें।
तुलसी, पुष्प, चंदन, धूप और दीप अर्पित करके:
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥”
मंत्र का जाप करें।
कथा और नाम-स्मरण
अपरा एकादशी की कथा पढ़ें या सुनें। दिनभर भगवान विष्णु का नाम-स्मरण, मंत्र-जाप और भजन कर सकते हैं।
किन चीजों से बचें?
प्रचलित एकादशी परंपरा के अनुसार:
- चावल
- गेहूं
- जौ
- अन्य अनाज
- दालें
का सेवन नहीं किया जाता।
इसके साथ मांसाहार, मदिरा, क्रोध, झूठ और अनावश्यक विवाद से बचने का प्रयास करें।
दान और सेवा
अपनी क्षमता के अनुसार जरूरतमंद को भोजन, फल, वस्त्र या उपयोगी वस्तु दान करें।
द्वादशी में पारण
अगले दिन द्वादशी के निर्धारित पारण काल में भगवान विष्णु का स्मरण करके व्रत खोलें।
सही पारण समय अपने शहर के स्थानीय पंचांग से देखें।
निष्कर्ष
अपरा एकादशी का व्रत केवल भोजन का त्याग नहीं है। यह भक्ति, आत्मसंयम, सदाचार और भगवान विष्णु के स्मरण का अवसर है।
व्रत अपनी क्षमता के अनुसार रखें और स्वास्थ्य को अनावश्यक जोखिम में न डालें।
अपरा एकादशी में क्या खाना चाहिए और क्या नहीं?
अपरा एकादशी में भोजन के नियम व्रत की विधि और पारिवारिक परंपरा के अनुसार अलग हो सकते हैं। जो भक्त फलाहार करते हैं, वे अपनी परंपरा के अनुसार व्रत-अनुकूल भोजन ले सकते हैं।
क्या खा सकते हैं?
फलाहार में सामान्यतः:
- फल
- दूध और दही
- मखाना
- साबूदाना
- शकरकंद
- कुट्टू का आटा
- सिंघाड़े का आटा
- सूखे मेवे
जैसे पदार्थ लिए जाते हैं।
भोजन को हल्का और सात्त्विक रखना बेहतर है।
क्या नहीं खाना चाहिए?
प्रचलित एकादशी परंपरा के अनुसार:
- चावल
- गेहूं
- जौ
- अन्य अनाज
- दालें
का सेवन नहीं किया जाता।
नमक का क्या नियम है?
कई परिवारों में फलाहार के दौरान सेंधा नमक का उपयोग किया जाता है।
कुछ परंपराओं में नमक से भी परहेज किया जाता है। इसलिए अपने पारिवारिक व्रत-नियम के अनुसार निर्णय लें।
दूध और दही
यदि आपकी व्रत-परंपरा में अनुमति है तो दूध और दही फलाहार में लिए जा सकते हैं।
साबूदाना और मखाना
साबूदाना और मखाना कई परिवारों में एकादशी के फलाहार का हिस्सा होते हैं। इन्हें व्रत-अनुकूल तरीके से बनाया जा सकता है।
मांसाहार और मदिरा
एकादशी के दिन मांसाहार और मदिरा से बचना चाहिए। भोजन को सात्त्विक और संयमित रखना धार्मिक भावना के अनुरूप है।
क्या निर्जल व्रत जरूरी है?
नहीं। निर्जल व्रत सभी के लिए आवश्यक नहीं है।
कमजोरी या स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने पर पानी और आवश्यक भोजन लेना उचित है।
संक्षेप में
खा सकते हैं: फल, दूध, दही, मखाना, साबूदाना, शकरकंद, कुट्टू/सिंघाड़े का आटा और अपनी परंपरा में मान्य व्रत-अनुकूल पदार्थ।
बचें: चावल, गेहूं, जौ, अन्य अनाज, दालें, मांसाहार और मदिरा।
मुख्य बात: अपरा एकादशी में भोजन से अधिक महत्वपूर्ण भक्ति, संयम और अपनी क्षमता के अनुसार व्रत का पालन है।
अपरा एकादशी में भगवान विष्णु को क्या अर्पित करें?
अपरा एकादशी पर भगवान विष्णु या वामन भगवान की पूजा श्रद्धा से की जाती है। पूजा में बहुत अधिक सामग्री की आवश्यकता नहीं होती।
पूजा में क्या चढ़ाएं?
- तुलसी दल
- पुष्प
- चंदन
- धूप
- दीप
- फल
- नारियल
- व्रत-अनुकूल नैवेद्य
तुलसी का महत्व
भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी दल का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है।
यदि तुलसी उपलब्ध हो तो श्रद्धापूर्वक अर्पित करें। उपलब्ध न होने पर केवल इसी कारण पूजा रोकना आवश्यक नहीं है।
नैवेद्य में क्या रखें?
फलाहार करने वाले भक्त अपनी व्रत-परंपरा के अनुसार फल, दूध, मखाना या अन्य व्रत-अनुकूल सात्त्विक पदार्थ भगवान को अर्पित कर सकते हैं।
नैवेद्य का थोड़ा भाग भगवान को अर्पित करके बाद में उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जा सकता है।
सरल पूजा क्रम
जल → तुलसी → पुष्प → चंदन → धूप → दीप → नैवेद्य → मंत्र-जाप → आरती
पूजा के समय:
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥”
मंत्र का जाप किया जा सकता है।
क्या महंगी सामग्री जरूरी है?
नहीं। भगवान विष्णु की पूजा में महंगी सामग्री या बड़े आयोजन की आवश्यकता नहीं है।
स्वच्छता, श्रद्धा और भक्ति के साथ की गई सरल पूजा भी पर्याप्त हो सकती है।
संक्षेप में
अपरा एकादशी पर भगवान विष्णु को तुलसी, पुष्प, चंदन, धूप, दीप, फल और व्रत-अनुकूल नैवेद्य अर्पित किया जा सकता है।
मुख्य बात: पूजा में दिखावे से अधिक श्रद्धा, भक्ति और अच्छे भाव को महत्व दें।
अपरा एकादशी के प्रमुख मंत्र
अपरा एकादशी पर भगवान विष्णु और वामन भगवान का स्मरण करते हुए मंत्र-जाप किया जा सकता है। मंत्र-जाप श्रद्धा और अपनी साधना की परंपरा के अनुसार करें।
1. ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥”
यह भगवान विष्णु का प्रसिद्ध द्वादशाक्षरी मंत्र है। एकादशी के दिन इसका जाप किया जा सकता है।
2. ॐ नमो नारायणाय
“ॐ नमो नारायणाय॥”
यह भगवान नारायण को समर्पित सरल मंत्र है। पूजा और नाम-स्मरण के समय इसका जाप किया जा सकता है।
3. ॐ विष्णवे नमः
“ॐ विष्णवे नमः॥”
यह भगवान विष्णु को नमन करने वाला सरल मंत्र है।
4. ॐ वामनाय नमः
“ॐ वामनाय नमः॥”
अपरा एकादशी के संदर्भ में भगवान वामन की पूजा का उल्लेख मिलता है। इसलिए वामन भगवान का स्मरण करते हुए इस मंत्र का जाप किया जा सकता है।
मंत्र-जाप कैसे करें?
सुबह स्नान और पूजा के बाद किसी एक मंत्र को चुनकर जाप करें।
तुलसी की माला से जाप करना चाहें तो कर सकते हैं। माला से जाप करना अनिवार्य नहीं है।
कितनी बार जाप करें?
मंत्र-जाप की कोई एक संख्या सभी भक्तों के लिए अनिवार्य नहीं है।
सरल साधना के लिए 108 बार “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥” का जाप किया जा सकता है।
मुख्य बात
मंत्र की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण श्रद्धा, एकाग्रता और भगवान विष्णु का स्मरण है।
संक्षेप में: अपरा एकादशी पर “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥”, “ॐ नमो नारायणाय॥”, “ॐ विष्णवे नमः॥” और “ॐ वामनाय नमः॥” जैसे मंत्रों का जाप किया जा सकता है।
अपरा एकादशी में दान और सेवा का महत्व
अपरा एकादशी पर दान और सेवा को भक्ति, करुणा और सदाचार से जोड़कर देखा जाता है। अपनी क्षमता के अनुसार जरूरतमंद की सहायता करना इस दिन की सकारात्मक भावना के अनुरूप है।
क्या दान कर सकते हैं?
अपनी सामर्थ्य के अनुसार:
- भोजन या फल
- वस्त्र
- जल
- जरूरत की उपयोगी वस्तुएं
- आर्थिक सहायता
दान कर सकते हैं।
जल और भोजन का दान
ज्येष्ठ मास में गर्मी अधिक होने के कारण जल पिलाना और जरूरतमंद को भोजन कराना विशेष रूप से उपयोगी सेवा है।
किसी राहगीर, श्रमिक या जरूरतमंद व्यक्ति को स्वच्छ पानी उपलब्ध कराना भी सरल सेवा हो सकती है।
दान का सही भाव
दान करते समय अहंकार और दिखावे से बचना चाहिए।
दान की मात्रा से अधिक महत्वपूर्ण है कि सहायता निःस्वार्थ भाव और सम्मान के साथ की जाए।
सेवा भी दान है
यदि आर्थिक दान संभव न हो तो किसी बुजुर्ग की मदद करना, जरूरतमंद को भोजन कराना या किसी की आवश्यक वस्तु उपलब्ध कराने में सहयोग करना भी सेवा का अच्छा माध्यम है।
शास्त्रीय भाव
पद्म पुराण में अपरा एकादशी के व्रत के धार्मिक फल की तुलना अनेक दान और तीर्थ-संबंधी पुण्य कर्मों से की गई है। इसे पुराणिक धार्मिक मान्यता के रूप में समझना चाहिए।
निष्कर्ष
अपरा एकादशी में दान का उद्देश्य केवल पुण्य प्राप्त करना नहीं, बल्कि करुणा, सेवा और परोपकार की भावना को जीवन में बढ़ाना भी है।
अपनी क्षमता के अनुसार किया गया छोटा-सा निःस्वार्थ सहयोग भी सार्थक सेवा हो सकता है।
अपरा एकादशी का पारण कब और कैसे करें?
अपरा एकादशी के व्रत का पारण सामान्यतः अगले दिन द्वादशी तिथि के निर्धारित पारण काल में किया जाता है।
पारण कैसे करें?
द्वादशी के दिन स्नान करके भगवान विष्णु का स्मरण करें। दीप जलाकर संक्षिप्त पूजा करें और अपनी श्रद्धा के अनुसार तुलसी, पुष्प और नैवेद्य अर्पित करें।
इसके बाद स्थानीय पंचांग में दिए गए पारण काल में व्रत खोलें।
पारण का सही समय
पारण का समय शहर, सूर्योदय और स्थानीय पंचांग के अनुसार बदल सकता है।
इसलिए वेबसाइट पर सभी शहरों के लिए एक ही समय लिखने के बजाय:
“अपरा एकादशी के पारण का सही समय अपने शहर के स्थानीय पंचांग के अनुसार देखें।”
पारण में क्या खाएं?
लंबे उपवास के बाद अचानक बहुत भारी भोजन करने से बचें। अपनी परंपरा और शरीर की स्थिति के अनुसार हल्के और सात्त्विक भोजन से शुरुआत करना बेहतर है।
यदि निर्जल व्रत रखा है, तो पहले पानी या उपयुक्त तरल लेकर धीरे-धीरे भोजन करना उचित है।
पारण के दिन दान
अपनी क्षमता के अनुसार जल, भोजन, फल, वस्त्र या उपयोगी वस्तु का दान किया जा सकता है।
विशेष रूप से गर्मी के मौसम में जरूरतमंदों को स्वच्छ पानी उपलब्ध कराना सरल सेवा है।
ध्यान रखें
व्रत को अपनी सुविधा से किसी भी समय खोलने के बजाय द्वादशी के निर्धारित पारण काल का ध्यान रखना चाहिए।
संक्षेप में
एकादशी का व्रत → अगले दिन द्वादशी → भगवान विष्णु का स्मरण → निर्धारित पारण काल → हल्का सात्त्विक भोजन।
मुख्य बात: अपरा एकादशी के पारण का सही समय हमेशा अपने शहर के स्थानीय पंचांग के अनुसार देखें।
अपरा एकादशी में क्या करना चाहिए और क्या नहीं?
अपरा एकादशी पर भगवान विष्णु की भक्ति, व्रत और आत्मसंयम पर ध्यान देना चाहिए।
क्या करना चाहिए?
- सुबह स्नान करके भगवान विष्णु या वामन भगवान की पूजा करें।
- तुलसी, पुष्प, चंदन, धूप और दीप अर्पित करें।
- अपनी क्षमता के अनुसार व्रत रखें।
- “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥” मंत्र का जाप करें।
- अपरा एकादशी की कथा पढ़ें या सुनें।
- भगवान विष्णु का नाम-स्मरण और भजन करें।
- जरूरतमंद व्यक्ति की सेवा और सहायता करें।
- द्वादशी के निर्धारित समय पर व्रत का पारण करें।
क्या नहीं करना चाहिए?
प्रचलित एकादशी परंपरा के अनुसार:
- चावल और अनाज का सेवन न करें।
- दालों से बचें।
- मांसाहार और मदिरा से बचें।
- क्रोध और झगड़े से बचें।
- झूठ और कटु वाणी से बचें।
- किसी का अपमान न करें।
- अनावश्यक विवाद से दूर रहें।
- दान या पूजा में दिखावा न करें।
मन और व्यवहार में संयम
अपरा एकादशी का व्रत केवल भोजन से जुड़ा नहीं है। इस दिन मन, वाणी और व्यवहार में भी संयम रखने का प्रयास करें।
अपनी किसी गलत आदत को छोड़ने या सुधारने का संकल्प लेना भी इस दिन को सार्थक बना सकता है।
स्वास्थ्य का ध्यान रखें
निर्जल व्रत सभी के लिए जरूरी नहीं है। कमजोरी या स्वास्थ्य संबंधी परेशानी होने पर पानी और आवश्यक भोजन लेना उचित है।
निष्कर्ष
करें: विष्णु पूजा, मंत्र-जाप, कथा, व्रत, दान और सेवा।
बचें: अनाज-दाल, मांसाहार, मदिरा, क्रोध, झूठ, कटु वाणी और अनावश्यक विवाद से।
मुख्य संदेश: अपरा एकादशी में भोजन के साथ-साथ मन, वाणी और कर्मों में भी संयम रखने का प्रयास करें।
अपरा एकादशी का आध्यात्मिक संदेश और निष्कर्ष
अपरा एकादशी का आध्यात्मिक संदेश भक्ति, आत्मसंयम और अच्छे कर्मों से जुड़ा है। यह दिन अपने विचारों और व्यवहार को बेहतर बनाने की प्रेरणा देता है।
भगवान विष्णु की भक्ति
एकादशी पर भगवान विष्णु का स्मरण, मंत्र-जाप और पूजा करके मन को आध्यात्मिक दिशा देने का प्रयास किया जाता है।
आत्मसंयम
व्रत हमें अपनी इच्छाओं और आदतों पर नियंत्रण रखने की प्रेरणा देता है। केवल भोजन ही नहीं, बल्कि वाणी और व्यवहार में भी संयम रखना महत्वपूर्ण है।
सेवा और परोपकार
अपनी क्षमता के अनुसार जरूरतमंद की सहायता करना, भोजन या जल देना और दान करना करुणा एवं सेवा भाव को बढ़ाता है।
अच्छे कर्मों की प्रेरणा
अपरा एकादशी का धार्मिक भाव व्यक्ति को अपने गलत कर्मों पर विचार करने और आगे सदाचार एवं धर्म के मार्ग पर चलने का संकल्प लेने की प्रेरणा देता है।
निष्कर्ष
अपरा एकादशी हमें सिखाती है कि भक्ति के साथ हमारे कर्म और व्यवहार भी अच्छे होने चाहिए।
भगवान विष्णु की उपासना के साथ संयम, सत्य, सेवा और सदाचार को जीवन में अपनाना इस एकादशी के आध्यात्मिक संदेश को सार्थक बनाता है।
भक्ति केवल पूजा तक सीमित नहीं है; अच्छे विचार और अच्छे कर्म भी भक्ति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
अपरा एकादशी में व्रत टूट जाए तो क्या करें?
यदि अपरा एकादशी का व्रत अनजाने में टूट जाए, तो घबराने या अत्यधिक अपराधबोध रखने की आवश्यकता नहीं है। भगवान विष्णु का स्मरण करके अपनी भूल के लिए क्षमा-प्रार्थना करें।
यदि गलती से कुछ खा लिया हो
यदि भूल से व्रत में निषिद्ध कोई पदार्थ खा लिया है, तो:
- भगवान विष्णु का स्मरण करें।
- “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥” का जाप करें।
- अपनी भूल के लिए क्षमा-प्रार्थना करें।
- बाकी दिन श्रद्धा और संयम के साथ बिताएं।
स्वास्थ्य के कारण व्रत टूट जाए
यदि कमजोरी, चक्कर, अत्यधिक प्यास या किसी स्वास्थ्य समस्या के कारण व्रत जारी रखना मुश्किल हो जाए, तो स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें।
आवश्यकतानुसार पानी या भोजन लेना उचित है। व्रत के कारण अपने शरीर को नुकसान पहुंचाना आवश्यक नहीं है।
इसके बाद क्या करें?
भगवान विष्णु या वामन भगवान की पूजा करें। तुलसी, पुष्प और दीप अर्पित करके मंत्र-जाप कर सकते हैं।
अपनी क्षमता के अनुसार दान या सेवा भी कर सकते हैं।
सबसे जरूरी बात
व्रत का उद्देश्य केवल भोजन छोड़ना नहीं, बल्कि भक्ति, आत्मसंयम और अच्छे आचरण का अभ्यास भी है।
इसलिए गलती हो जाने पर निराश होने के बजाय आगे अधिक सावधानी और श्रद्धा के साथ व्रत रखने का संकल्प लें।
निष्कर्ष
व्रत टूट जाए → भगवान विष्णु का स्मरण → क्षमा-प्रार्थना → मंत्र-जाप → स्वास्थ्य का ध्यान → आगे सावधानी।
अनजाने में व्रत टूट जाने पर डरने या अत्यधिक अपराधबोध रखने की आवश्यकता नहीं है। श्रद्धा और अच्छे भाव के साथ भगवान का स्मरण करें।
अपरा एकादशी का सरल सार
अपरा एकादशी ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है। यह भगवान विष्णु की भक्ति, व्रत और आत्मसंयम से जुड़ी एकादशी मानी जाती है।
मुख्य बातें
- मास: ज्येष्ठ
- पक्ष: कृष्ण पक्ष
- तिथि: एकादशी
- आराध्य: भगवान विष्णु
- वामन स्वरूप: पूजा में विशेष उल्लेख
- मुख्य साधना: व्रत, पूजा, मंत्र-जाप और कथा
- मुख्य भाव: भक्ति, संयम और सदाचार
व्रत और पूजा
भक्त अपनी शारीरिक क्षमता और पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत रखते हैं।
भगवान विष्णु या वामन भगवान को तुलसी, पुष्प, चंदन, धूप और दीप अर्पित करके पूजा की जा सकती है।
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥” मंत्र का जाप किया जा सकता है।
क्या सीख मिलती है?
अपरा एकादशी हमें अच्छे कर्म, आत्मसंयम और भगवान की भक्ति की प्रेरणा देती है।
इस दिन क्रोध, झूठ, कटु वाणी और गलत आचरण से बचने का प्रयास करना चाहिए।
दान और सेवा
अपनी क्षमता के अनुसार जल, भोजन, फल, वस्त्र या उपयोगी वस्तुओं का दान किया जा सकता है।
ज्येष्ठ मास की गर्मी में किसी जरूरतमंद को स्वच्छ जल पिलाना भी सरल और उपयोगी सेवा है।
पारण
व्रत का पारण सामान्यतः अगले दिन द्वादशी के निर्धारित पारण काल में किया जाता है। सही समय अपने शहर के स्थानीय पंचांग के अनुसार देखें।
निष्कर्ष
अपरा एकादशी का सार है—भगवान विष्णु की भक्ति, आत्मसंयम, अच्छे कर्म और सेवा।
भक्ति के साथ अपने विचार, व्यवहार और कर्मों को बेहतर बनाना ही इस एकादशी की भावना को जीवन में उतारने का सुंदर तरीका है।
अपरा एकादशी में किन बातों का ध्यान रखें?
अपरा एकादशी का व्रत श्रद्धा और अपनी क्षमता के अनुसार रखना चाहिए। पूजा, भोजन और पारण से जुड़ी कुछ सामान्य बातों का ध्यान रखें।
सही तिथि और पारण देखें
एकादशी की तिथि और अगले दिन द्वादशी के पारण काल की जानकारी अपने शहर के स्थानीय पंचांग से लें।
अपनी क्षमता के अनुसार व्रत रखें
निर्जल व्रत सभी के लिए आवश्यक नहीं है। कमजोरी या स्वास्थ्य संबंधी परेशानी होने पर पानी और आवश्यक भोजन लेना उचित है।
भोजन का ध्यान रखें
प्रचलित एकादशी परंपरा के अनुसार चावल, गेहूं, जौ, अन्य अनाज और दालों से बचा जाता है।
फलाहार करने वाले अपनी परंपरा के अनुसार व्रत-अनुकूल भोजन ले सकते हैं।
पूजा सरल रखें
भगवान विष्णु या वामन भगवान को तुलसी, पुष्प, चंदन, धूप और दीप अर्पित करें।
महंगी पूजा सामग्री आवश्यक नहीं है।
मन और वाणी पर संयम रखें
इस दिन क्रोध, झूठ, कटु वाणी, अहंकार और अनावश्यक विवाद से बचने का प्रयास करें।
दान और सेवा करें
अपनी क्षमता के अनुसार जल, भोजन, फल, वस्त्र या उपयोगी वस्तु जरूरतमंद को दे सकते हैं।
दान करते समय दिखावे के बजाय सेवा और सम्मान का भाव रखें।
जागरण अपनी क्षमता से करें
भजन और मंत्र-जाप के लिए जागरण कर सकते हैं, लेकिन पूरी रात जागना अनिवार्य नहीं है।
मुख्य बात
अपरा एकादशी में व्रत की कठोरता से अधिक श्रद्धा, संयम और अच्छे आचरण को महत्व दें।
भगवान विष्णु की भक्ति के साथ अपने विचार, वाणी और कर्मों को बेहतर बनाने का प्रयास ही इस एकादशी की भावना को सार्थक बनाता है।
अपरा एकादशी का जीवन में क्या संदेश है?
अपरा एकादशी का संदेश केवल व्रत और पूजा तक सीमित नहीं है। यह हमें अपने जीवन में भक्ति, संयम और अच्छे कर्मों को महत्व देने की प्रेरणा देती है।
1. अच्छे कर्मों को महत्व दें
मनुष्य के जीवन में उसके कर्मों का विशेष महत्व माना जाता है। अपरा एकादशी हमें गलत कर्मों से बचने और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।
2. भगवान पर विश्वास रखें
कठिन परिस्थितियों में भगवान विष्णु का स्मरण मन को स्थिर रखने और सही दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा दे सकता है।
3. आत्मसंयम अपनाएं
एकादशी का व्रत अपनी इच्छाओं और आदतों पर नियंत्रण रखने का अवसर देता है।
भोजन के साथ क्रोध, अहंकार, कटु वाणी और नकारात्मक विचारों पर भी संयम रखने का प्रयास करें।
4. सेवा और दान करें
अपनी क्षमता के अनुसार किसी जरूरतमंद को जल, भोजन, फल या उपयोगी वस्तु देना सेवा का सरल रूप है।
5. जीवन में सुधार करें
अपरा एकादशी को अपनी किसी गलत आदत पर विचार करने और उसे सुधारने का नया संकल्प लेने का अवसर बनाया जा सकता है।
निष्कर्ष
अपरा एकादशी हमें सिखाती है कि भक्ति के साथ अच्छे कर्म, संयम और सेवा भी जीवन का हिस्सा होने चाहिए।
भगवान की पूजा के साथ अपने विचार, व्यवहार और कर्मों को बेहतर बनाना ही इस एकादशी के संदेश को जीवन में उतारने का सुंदर तरीका है।
अपरा एकादशी का आध्यात्मिक संदेश
अपरा एकादशी का आध्यात्मिक भाव भक्ति, आत्मसंयम, सदाचार और सेवा से जुड़ा है। यह दिन स्वयं के विचारों और कर्मों को बेहतर बनाने की प्रेरणा देता है।
भगवान विष्णु की भक्ति
एकादशी पर भगवान विष्णु का स्मरण, पूजा और मंत्र-जाप करके मन को आध्यात्मिक दिशा देने का प्रयास किया जाता है।
कर्मों की शुद्धता
अपरा एकादशी का धार्मिक संदेश हमें गलत कर्मों से बचने और अच्छे कर्मों को अपनाने की प्रेरणा देता है।
आत्मसंयम
व्रत के माध्यम से भोजन और इच्छाओं पर नियंत्रण रखने का अभ्यास किया जाता है। साथ ही क्रोध, अहंकार और कटु वाणी से बचने का प्रयास भी किया जा सकता है।
सेवा और दान
जरूरतमंद व्यक्ति को जल, भोजन, फल या उपयोगी वस्तु देना सेवा का सरल रूप है। दान अपनी क्षमता के अनुसार और बिना दिखावे के करना चाहिए।
आत्मचिंतन
यह दिन अपनी गलत आदतों और व्यवहार पर विचार करके सुधार का संकल्प लेने का अवसर भी हो सकता है।
निष्कर्ष
अपरा एकादशी हमें सिखाती है कि भक्ति केवल पूजा तक सीमित नहीं है। अच्छे कर्म, संयम, सेवा और सदाचार भी आध्यात्मिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
भगवान विष्णु की भक्ति के साथ अपने कर्मों और व्यवहार को बेहतर बनाना ही इस एकादशी के संदेश को जीवन में उतारने का सुंदर तरीका है।
अपरा एकादशी में व्रत और पूजा से जुड़ी सावधानियां
अपरा एकादशी का व्रत श्रद्धा और अपनी क्षमता के अनुसार रखें। पूजा और उपवास के दौरान इन बातों का ध्यान रखना अच्छा रहता है।
सही तिथि देखें
एकादशी की तिथि और अगले दिन द्वादशी के पारण काल की जानकारी अपने शहर के स्थानीय पंचांग से लें।
अपनी क्षमता के अनुसार व्रत रखें
निर्जल व्रत सभी के लिए आवश्यक नहीं है। कमजोरी या स्वास्थ्य संबंधी परेशानी होने पर पानी और आवश्यक भोजन लेना उचित है।
भोजन में सावधानी रखें
प्रचलित एकादशी परंपरा में चावल, गेहूं, जौ, अन्य अनाज और दालों से बचा जाता है।
फलाहार करने वाले अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत-अनुकूल भोजन लें।
पूजा सरल रखें
भगवान विष्णु या वामन भगवान को तुलसी, पुष्प, चंदन, धूप और दीप अर्पित किए जा सकते हैं।
महंगी सामग्री या बड़े आयोजन की आवश्यकता नहीं है।
मन और वाणी पर संयम रखें
क्रोध, झूठ, कटु वाणी, अहंकार और अनावश्यक विवाद से बचने का प्रयास करें।
दान में दिखावा न करें
अपनी क्षमता के अनुसार जल, भोजन, फल, वस्त्र या उपयोगी वस्तु जरूरतमंद को दें। दान करते समय सम्मान और निःस्वार्थ भाव रखें।
जागरण अपनी क्षमता से करें
भजन और मंत्र-जाप के लिए जागरण कर सकते हैं, लेकिन पूरी रात जागना अनिवार्य नहीं है।
पारण का ध्यान रखें
अगले दिन द्वादशी में निर्धारित पारण काल के अनुसार व्रत खोलें। सही समय अपने स्थानीय पंचांग से देखें।
निष्कर्ष
अपरा एकादशी में सबसे महत्वपूर्ण है श्रद्धा, संयम और स्वस्थ तरीके से व्रत का पालन।
व्रत की कठोरता से अधिक महत्वपूर्ण भगवान विष्णु की भक्ति, अच्छे कर्म और अपने व्यवहार में सकारात्मक बदलाव लाना है।
अपरा एकादशी की सरल पूजा और पालन विधि
अपरा एकादशी पर भगवान विष्णु या वामन भगवान की पूजा श्रद्धा के साथ की जाती है। पूजा को सरल रखते हुए भी विधिपूर्वक किया जा सकता है।
पूजा विधि
1. स्नान और संकल्प
सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। पूजा स्थान साफ करके भगवान के सामने व्रत का संकल्प लें।
2. दीप जलाएं
भगवान विष्णु या वामन भगवान के सामने दीप जलाएं।
3. पूजा सामग्री अर्पित करें
- तुलसी दल
- पुष्प
- चंदन
- धूप
- दीप
- फल
- व्रत-अनुकूल नैवेद्य
4. मंत्र-जाप करें
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥”
का श्रद्धापूर्वक जाप करें।
5. कथा पढ़ें या सुनें
अपरा एकादशी की कथा पढ़ें या सुनें और भगवान विष्णु से सद्बुद्धि तथा कल्याण की प्रार्थना करें।
6. व्रत रखें
अपनी शारीरिक क्षमता और पारिवारिक परंपरा के अनुसार निर्जल, जलाहार या फलाहार व्रत रखें।
7. दिनभर भगवान का स्मरण करें
विष्णु नाम-स्मरण, मंत्र-जाप और भजन करें। क्रोध, झूठ और अनावश्यक विवाद से बचें।
8. दान और सेवा करें
अपनी क्षमता के अनुसार जल, भोजन, फल, वस्त्र या उपयोगी वस्तु जरूरतमंद को दें।
9. द्वादशी में पारण करें
अगले दिन द्वादशी के स्थानीय पंचांग में दिए गए पारण काल में व्रत खोलें।
सरल पूजा क्रम
स्नान → संकल्प → विष्णु/वामन पूजा → तुलसी व पुष्प → धूप-दीप → मंत्र-जाप → कथा → आरती → प्रार्थना → दान/सेवा → द्वादशी में पारण।
निष्कर्ष
अपरा एकादशी की पूजा में महंगी सामग्री या कठिन विधि आवश्यक नहीं है। श्रद्धा, भक्ति, आत्मसंयम और अच्छे आचरण के साथ की गई सरल पूजा ही इस दिन की भावना के अनुरूप है।
भगवान विष्णु से सद्बुद्धि, शांति और अच्छे कर्मों की शक्ति के लिए प्रार्थना करें।
अपरा एकादशी से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न — FAQ
अपरा एकादशी कब आती है?
अपरा एकादशी ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को आती है।
अपरा एकादशी किस भगवान को समर्पित है?
यह मुख्य रूप से भगवान विष्णु की उपासना से जुड़ी है। पद्म पुराण में भगवान वामन की पूजा का भी उल्लेख मिलता है।
अपरा एकादशी का नाम क्यों पड़ा?
“अपरा” शब्द को अपार या असीम के भाव से जोड़ा जाता है। धार्मिक परंपरा में इसे विशेष पुण्य प्रदान करने वाली एकादशी माना गया है।
अपरा एकादशी में कौन-सा मंत्र जपें?
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥” का जाप किया जा सकता है। वामन भगवान के लिए “ॐ वामनाय नमः॥” का भी जाप किया जा सकता है।
अपरा एकादशी में क्या खा सकते हैं?
फलाहार करने वाले भक्त अपनी परंपरा के अनुसार फल, दूध, दही, मखाना, साबूदाना, शकरकंद और व्रत-अनुकूल आहार ले सकते हैं।
क्या अपरा एकादशी में चावल खा सकते हैं?
प्रचलित एकादशी परंपरा के अनुसार चावल, गेहूं, जौ, अन्य अनाज और दालों का सेवन नहीं किया जाता।
क्या निर्जल व्रत जरूरी है?
नहीं। निर्जल व्रत सभी के लिए आवश्यक नहीं है। अपनी शारीरिक क्षमता और पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत रखना चाहिए।
भगवान विष्णु को क्या चढ़ाएं?
तुलसी, पुष्प, चंदन, धूप, दीप, फल और व्रत-अनुकूल नैवेद्य अर्पित किए जा सकते हैं।
अपरा एकादशी में क्या दान करें?
अपनी क्षमता के अनुसार जल, भोजन, फल, वस्त्र या उपयोगी वस्तुएं जरूरतमंदों को दी जा सकती हैं।
क्या रात्रि-जागरण जरूरी है?
नहीं। जो भक्त सक्षम हों, वे भजन और मंत्र-जाप कर सकते हैं। पूरी रात जागना अनिवार्य नहीं है।
अपरा एकादशी का पारण कब करें?
व्रत का पारण सामान्यतः अगले दिन द्वादशी के निर्धारित पारण काल में किया जाता है। सही समय स्थानीय पंचांग के अनुसार देखें।
व्रत टूट जाए तो क्या करें?
भगवान विष्णु का स्मरण करके क्षमा-प्रार्थना करें और आगे सावधानी रखने का संकल्प लें। स्वास्थ्य कारणों से व्रत टूटे तो स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें।
अपरा एकादशी का मुख्य संदेश क्या है?
इसका मुख्य संदेश भक्ति, आत्मसंयम, सदाचार और भगवान विष्णु के प्रति श्रद्धा से जुड़ा है।
संक्षेप में
अपरा एकादशी पर विष्णु पूजा, व्रत, मंत्र-जाप, कथा, दान और सेवा की जा सकती है। व्रत अपनी क्षमता के अनुसार रखें और द्वादशी में स्थानीय पंचांग के अनुसार पारण करें।

